भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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१०० मार्क्सवाद और रामराज्य अविभाज्य होती है। राज्योके शक्ति-विभाजनके कारण राज्यके कार्य विभक्त होते हैं; परंतु इससे राजसत्ताका विभाजन नहीं होता।' रूसोके अनुसार 'शक्तिका विभाजन हो सकता है, राज्यकी इच्छाका नहीं।' १९ वीं शतीमें भी औद्योगिक क्रान्तिके फलस्वरूप सामाजिक जीवनमें स्पर्धा एव संघर्षका महत्त्वपूर्ण स्थान है । उस स्थितिमे राजसत्ता एक राशि न होकर अनेक प्रकारकी हो गयी । कई राष्ट्रोमे वैधानिक राजसत्ता मान्य होती है, जैसे ब्रिटेनका सम्राट्, भारतका राष्ट्रपति । उसकी स्वीकृति बिना कोई कार्य नही चल सकता । परंतु उत्तरदायी मन्त्रिमण्डलकी स्वीकृति बिना ऐसे सत्ताधारी श्रेष्ठ जन कुछ भी नही कर सकते । ब्रिटेनमें सम्राट् और संसद् राजसत्ताधारी है । वे सभी प्रकारका नियम बना सकते हैं। कुछ परिस्थितियोंके कारण संसद् राजसत्ताधारी नहीं होती । आधुनिक समाजसेवक राज्यमें संसद् नियम निर्माणमें स्वतन्त्र नहीं होती । वस्तुतः कार्यपालिका ही सत्ताधारी होती है । सयुक्त राष्ट्र अमेरिकामें कांग्रेस ही नियम निर्माण करती है । परंतु कुछ नयी परिस्थितियोंके कारण राष्ट्राध्यक्षका भी परोक्षरूपसे नियम-निर्माणमे महत्त्वपूर्ण स्थान होता है । इसीलिये विश्वके वैधानिक अध्यक्षोमे अमेरिकाका राष्ट्रपति सबसे अधिक अधिकारसम्पन्न होता है । जनवादी राजसत्ता आधुनिक जनवादी नागरिक जनता निर्वाचनद्वारा ही नहीं, किंतु प्रचारद्वारा भी राज्यकी नीतिपर प्रभाव डालती है । भाषण, लेखन- आन्दोलनद्वारा जनमत बनता है। सरकारोको भी तदनुसार अपनी नीति बनानी पड़ती है। कहा जाता है कि 'समाजके वास्तविक शासक ढूँढे नही जा सकते । कभी एक सङ्घ, कभी दूसरा, कभी कोई आन्दोलन, कभी कोई प्रचार सफल होता है। अतः सर्वोच्च शासनसत्ता जनतामें ही निहित होती है। नियमविधायिनी संस्थाके सङ्घटनकी दृष्टिसे निर्वाचक- गण सत्ताधारी होते हैं। राजनीतिके सम्बन्धमें समस्त जनताके मतका योग ही सत्ताधारी है।' उपर्युक्त अधिकांश बाते केवल विभिन्न राष्ट्रोकी घटनाओ, इतिवृत्तोकी आलोचना-प्रत्यालोचनाओंके आधारपर ही निर्णीत होती हैं। यहाँ औचित्य-अनौचित्यकी कसौटी उत्तरोत्तरकी घटनाएँ तथा मान्यताएँ ही हैं। परंतु भारतीय विवेचक इसे अपर्याप्त मानते हैं। 'मानवका इतिहास प्रगतिका इतिहास है', केवल इसी आधारपर पूर्व-पूर्वके विचार और घटनाएँ हेय हैं, उत्तरोत्तरके विचार एव घटनाएँ उपादेय हैं, यह कहना नितान्त अज्ञता है । इससे तो पूर्व-पूर्वके बुद्धिमानोका भी महत्त्व घटता है, उत्तरोत्तरके मूर्खोका भी महत्त्व बढ़ता है । कहा