मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजा चुका है कि घटनाएँ भली, बुरी सब तरहकी होती हैं। विचारसरणि भी सदा ही अच्छी-बुरी होती हैं। प्रत्यक्ष, अनुमान, आप्त एवं आप्तसमर्थित विचार तथा घटनाएँ आदरणीय हैं। तद्विपरीत हेय हैं। तत्त्वनिर्णयरूप परिस्थिति, घटनाओं एवं तात्कालिक परिस्थितियोंसे प्रभावित विचारोंका कोई महत्त्व नहीं होता। लुटेरोंका राज्य हो जाय, तो 'हो गया इसलिये उचित मान लिया जाय' यह नहीं कहा जा सकता; किंतु सदा ही उसे मिटानेका प्रयत्न होना चाहिये। उचित योग्य व्यवस्था अति प्राचीन हो या अभूतपूर्व अनागत हो, उसका आदर होना चाहिये। धर्मनियन्त्रित धर्मसापेक्ष पक्षपातविहीन समष्टिव्यष्टि-अविरोधेन सर्वहितकारी राज्य ही रामराज्य, धर्मराज्य एवं ईश्वरराज्य है। उसीका सदा आदर हुआ है, आगे भी होगा। वर्तमान कालमें भी उसीके लिये प्रयत्नशील होना आवश्यक है। इस दृष्टिसे एक सत्तावादीकी निरङ्कुश राजसत्ताका समर्थन नहीं किया जा सकता। कहा जाता है कि 'जहाँ पहले सरकार स्वामी तथा जनता दास थी, वहाँ रूसोकी व्यवस्थामें सरकार दास एवं जनता स्वामी है। उसके मतानुसार जनवाणी देववाणी है। रूसोके जनवादके आधारपर ही मत-संग्रह आदिकी प्रथा है। रूसो भी एक सत्तावादी था, उसके दर्शनमें अन्य संस्था या समुदायका कोई स्थान न था। नागरिक एवं राज्यमें वह सीधा सम्बन्ध रखना चाहता था। उसके शासनतन्त्रमें समाचारपत्रों, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक या सांस्कृतिक सङ्घका स्थान नहीं। उसके अनुसार व्यक्ति प्रकृतिसे ही पवित्र है। सङ्घहीन समाजमें व्यक्ति स्वयं ही सामाजिक इच्छा या राज्यकी सामान्येच्छाके अनुसार सोचेगा। सर्वो—प्रचारयन्त्रोंसे नैसर्गिक पवित्रताका ह्रास होता है।' यद्यपि उसका यह कथन अंशतः सत्य है, वर्तमान सभ्यता एवं प्रचार- प्रपञ्चोंसे जाल-फौरेबका ही विस्तार हुआ है। तथापि सदिच्छासे सद्बुद्धि, सद्बुद्धिसे सदिच्छा और उससे सत्प्रयत्न एवं सत्फल होता है। सदिच्छाका निर्धारण होना आवश्यक है। यदि दुर्भाग्यवश किसी उत्पथगामी समुदायके हाथमें राजसत्ता आ गयी और समाचारपत्रों तथा प्रचारोंपर भी प्रतिबन्ध रहा तब तो सदा ही जनसमूहको शासनके अत्याचारोंको सिर झुकाकर सहते रहना पड़ेगा। शासन बदलनेका भी उसे कभी अवसर नहीं मिलेगा। इस तरह आदर्श राज्यके नामपर तानाशाहीकी स्थापना होगी। रूसो राज्यद्वारा एक नागरिक धर्मनिर्माण भी चाहता था। उस तरह सभी क्षेत्रोंमें राज्य हावी हो जायगा। व्यक्ति-विकासका अवकाश सर्वथा समाप्त हो जाता है। आजके समय सामान्येच्छाका बोध कितना दुर्गम है। विशेषतः