भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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१०२ मार्क्सवाद और रामराज्य व्यक्तिस्वातन्त्र्य एवं प्रकाशन, भाषण-विस्तारका साधन न होनेसे तो वह और भी दुर्ज्ञेय हो जायगी । रूसोने नियमसे नागरिकताकी भावनाका जन्म माना और कहींपर नागरिक भावनासे नियमका जन्म माना । यह परस्पर विरुद्ध है। उसने यह भी माना है कि 'राज्यमें एक व्यवस्थापकद्वारा नागरिक भावनाके जन्म और प्रसारका प्रयत्न होगा।' इस तरह भावना-निर्माण और उसके अनुसार नियम-निर्माण होगा । अन्य किसी व्यक्ति या समुदायको भावना-निर्माणका अधिकार न होगा । फिर तो जिसके हाथमें शासन होगा वही जो चाहे करेगा। इस तरह रूसोके मतानुसार जनवाद, अधिनायकवाद—दोनो ही साथ-साथ रहते हैं । अधिनायकवाद मानवताका विरोधी ही समझा जाता है । 'नागरिकको स्वतन्त्र होनेके लिये बाध्य किया जायगा' यह एक विचित्र बात है। जनकल्याण- कल्पना स्वतन्त्र करनेके नामपर परतन्त्र बनानेका व्यामोहक मायाजाल है। बोसॉके कहता है कि 'प्रत्येक राज्यकी इच्छा चाहे वह तानाशाहकी इच्छा ही क्यो न हो सामान्येच्छा है।' उसके अनुसार 'नागरिकको जीवनयापन करनेके लिये बाध्य किया जाना चाहिये, अर्थात् स्वतन्त्र होनेके लिये बाध्य किया जाना चाहिये।' यद्यपि यह ठीक ही है कि कितने ही कार्योंमें जनहितके लिये उसकी इच्छाके विरुद्ध कुछ करनेके लिये बाध्य किया जा सकता है । जैसे किसी अदीर्घदर्शी अबोध शिशुकी कुपथ्य-परिवर्जन, पथ्य-परिपालन तथा चिरायता आदि जैसी कटु औषधोके सेवनमें प्रवृत्ति नहीं होती तो वहाँ उसे हितैषिणी माताके द्वारा वैसा करनेके लिये बाध्य किया जा सकता है— जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर । ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर ॥ एक हितैषी डाक्टर भी आपरेशन करते हुए चीरफाड़ करता है और एक दुर्भावनावाला कूटनीतिज्ञ दुश्मन भी चीरफाड करता है । आजकल विभिन्न शासनारूढ दल ऐसी स्थिति उत्पन्न करके नागरिको एवं दूमरे दलोकी प्रचार- सुविधा रोककर केवल अपना ही प्रचार करते हैं। यह सदाके लिये अपने दलका शासन कायम रखनेका षड्यन्त्र ही है। स्वास्थ्यवर्धक ओषधि खानेके लिये बाध्य करना एक बात है और जहर खानेके लिये बाध्य करना अन्य बात । अठारहवी शतीके मध्यसे उन्नीसवी शतीतक ब्रिटेन एवं फासमें आधुनिक आदर्शवादका प्रभाव बढ़ा । स्वतन्त्रता, भ्रातृता, समानता फ्रांसीसी राज्यक्रान्तिका नारा था । वह समस्त यूरोपमें गूँजा और गरीब, किसान तथा मजदूरलोगोंने उसे अपनाया । जर्मनी, प्रशा आदि मध्य यूरोपके देशोंमें राष्ट्रियताका प्रसार हो रहा था । उसके अनुकूल आदर्शवादका जन्म हुआ । उदारवादके अनुसार राज्य-