भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पाश्चात्त्य राजनीति १०३ साधन तथा उसका कार्यक्षेत्र सीमित है । उसमें स्वतन्त्रताका अर्थ है स्वेच्छाम जीवन-निर्वाह करना । ठीक इसके विपरीत आदर्शवादके अनुसार आदर्श राज्य साध्य, निःसीम एवं निरपेक्ष है उसके हस्तक्षेपपर कोई प्रतिबन्ध नहीं । इसके अनुसार स्वतन्त्रताका अर्थ है 'राज्यके नियमानुसार जीवन-सञ्चालन करना ।' मान्टेस्क्यू शक्ति-विभाजन स्वतन्त्रताके लिये अनिवार्य मानता था । आदर्शवादी शक्ति-विभाजनके पक्षमें नहीं थे। उदारवादमें जनस्वीकृति मुख्य है । कान्ट ( १७२४-१८०४ ) आधुनिक आदर्शवादका जन्मदाता माना जाता है । वह कनिग्सवर्ग विश्वविद्यालयका अध्यापक था । वह दर्शन एवं राजनीति शास्त्रका विद्वान् और अध्यात्मवादी था । उसके मता- नुसार एक वस्तुका ज्ञान उसकी बनावटसे नहीं, किंतु मस्तिष्कमें पड़े हुए उस वस्तुके प्रतिबिम्बसे होता है । एक वस्तुको हम पुस्तक इसीलिये कहते हैं कि वह हमारे मस्तिष्कके अनुसार पुस्तककी भाँति है । विशुद्ध विवेकका जीवनमें अनुभवसे अधिक महत्त्व है, लाककी परम्परानुसार केवल अनुभव और प्रयोगसे नहीं । राजनीतिके सम्बन्धमें उसने कहा कि 'नियममें व्यापकता आवश्यक है; परंतु उसका आधार विवेक होना चाहिये ।' उसने जनवादका समर्थन करते हुए कहा कि 'राजतन्त्र आदर्श व्यवस्था नहीं है, क्योकि उसमें नियम विवेकके अनुसार नहीं होते ।' जनवादमें भी विवेकका अभाव ही है । निष्पक्ष दूरदर्शी ऋषियोंके राजनीतिक शास्त्रों एवं धार्मिक आध्यात्मिक दर्शनोंके बिना विवेक न तो भौतिक जनतन्त्रमे है न निरपेक्ष राजतन्त्रमे ही । अध्यात्मवादपर आधारित धर्मनियन्त्रित शासनतन्त्रमें ही विवेकका महत्त्व है । वस्तुतस्तु इस पक्षमें संविधान एवं नियम भी सनातन ही है । उनका निर्माण नहीं करना है, किंतु निर्णय किया जाता है । इसलिये विधान-निर्मात्री परिषद् न बनाकर विधान-निर्णेत्री परिषद् ही बनाना है । कान्ट सर्वव्यापक नैतिक नियमोंको व्यक्तिका प्रेरक मानता है । वह इसीके द्वारा इच्छाओका सञ्चालन और नियमन मानता है । अन्यथा मनुष्य निकृष्ट नियमोंका शिकार होकर नष्ट हो जाता है । अतः ऐसे नियमोंद्वारा ही नागरिक जीवनका संचालन होना चाहिये । उसका कहना है कि यदि नागरिक अपने कर्तव्योंका पालन करता है तो अधिकारी अपने आप ही उसका अनुगमन करते हैं । व्यक्तिवादियोंके अनुसार अधिकारकी प्रधानता है; परंतु कान्टके मतानुसार कर्तव्यकी । व्यक्तिवादी स्वेच्छानुसार कार्यको ही स्वतन्त्रता कहते हैं; परंतु कान्ट नैतिक नियमानुसार जीवनयापनसे ही स्वतन्त्रता सम्भव मानता है । मद्यपान, द्यूत आदि नैतिकताके विरुद्ध आचरणको स्वतन्त्रता नहीं कहा जा सकता । व्यक्तिवादी मिलके अनुसार