भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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'मद्यपान आदि भी व्यक्ति-स्वातन्त्र्यमें ग्राह्य हैं।' कान्ट कहता है—'व्यक्ति ही समाजकी जड़ है, जब उसमें भी खराबी हो तब पत्तों, शाखाओंकी खराबी रोकी नहीं जा सकती । अतएव व्यक्तिके अनैतिक कार्य सर्वथा वर्ज्य हैं । राज्यके द्वारा मनुष्य नैतिक नियमोंका अनुगामी बन सकता है।' शक्ति-विभाजनको अङ्गीकार करता हुआ भी कान्ट व्यवस्थापिका सभाको राज्यमें प्रधान मानता था । सामन्तों एवं मठोंके भूमिसम्बन्धी एकाधिकारका भी वह विरोधी था । उसके मतानुसार 'मनुष्यके विवेक एवं नैतिकताका पूर्ण विकास केवल राष्ट्रसङ्घद्वारा ही हो सकता है । स्थिर शान्ति एवं मानव-प्रगतिके लिये यह अत्यन्त आवश्यक है ।' फिर भी कान्टके अनुसार 'राज्यको शासितोंकी स्वीकृतिपर निर्भर नहीं रहना चाहिये । उसके मतानुसार शक्तिद्वारा राज्यका जन्म हुआ है, कण्ट्राक्ट (सामाजिक समझौता) द्वारा नहीं। वह रूसोके समान ही 'सामान्येच्छा' का समर्थक था। पर उसके लिये प्रत्यक्ष जनवादका आश्रयण अनिवार्य नहीं। एक व्यक्ति भी उसका प्रतिनिधित्व कर सकता है। कान्टका सर्वमनस्तत्त्व वेदान्तियोंके विशुद्ध अखण्डबोध ब्रह्मके तुल्य है। बाह्यार्थवादी बौद्धोंके समान ही उसके मतमें बाह्यार्थ भले ही हो; किंतु वह स्वतः प्रत्यक्ष नहीं, अपितु अनुमेय-सा है। आन्तरिक ज्ञानमें होनेवाले प्रतिबिम्बों- द्वारा ही उसकी ज्ञप्ति हो सकती है। आन्तर होनेसे ज्ञान ही स्वप्रकाश एवं प्रत्यक्ष है। विभिन्न आकारवाली वस्तुएँ ज्ञाननिष्ठ प्रतिबिम्बके द्वारा विदित होती हैं। वेदान्तीके मतानुसार भले ही बाह्यार्थ अनिर्वचनीय व्यावहारिक ही हो तथापि घटादिका प्रत्यक्ष सर्वानुभवसिद्ध है। अतिसूक्ष्म वस्तुओंमें अनुभव एवं प्रयोग असम्भव है। अतः विवेक ही तत्त्वनिर्णयका मूलाधार है। कान्टकी यह बात अवश्य बहुमूल्य है । विवेकके लिये परम्परा एवं अपौरुषेय या ईश्वरीय तथा आर्ष शास्त्रोंका समाश्रयण अपेक्षित है । विवेकसामग्री बिना विवेक असफल ही रहता है । सामान्य विषयोंमें जनवादद्वारा विवेकका प्रयोग हो सकता है; परंतु तत्तद्विशिष्ट विषयोंमें उन-उन विषयोंके विशेषज्ञों- द्वारा ही विवेकका सफल प्रयोग हो सकता है । ऐसे विवेक-निर्धारित नियमोंद्वारा इच्छाओंका नियन्त्रण एवं सञ्चालन अवश्य ही व्यष्टि-समष्टि सर्वकल्याणका कारण है। यह नियन्त्रण स्वतन्त्रताका साधक ही है, बाधक नहीं । माता-पिता गुरुजनो- द्वारा उचित नियन्त्रण एवं शिक्षणसे ही मनुष्य विद्वान्, बलवान्, धनवान् होकर स्वातन्त्र्यसुखका भोक्ता हो सकता है । अनियन्त्रित, उच्छृङ्खल बालक प्रायेण मूर्ख रहकर परतन्त्रताके बन्धनोंमें जकड़ा ही रहता है । व्यक्तिका समुदाय ही समष्टि है। सुतरां व्यक्तिका पतन समष्टिके पतनका कारण बन सकता है। प्रसिद्ध है कि एक ग्रामके नेताने ग्रामीणोंको कहा कि आज रात्रिमें सभी लोग एक कुण्डमें दूध डालें । ग्रामीणोंने स्वीकार कर लिया, परंतु डालते समय एक व्यक्तिके मनमे