मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 118, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाश्चात्त्य राजनीति १०५ आया कि सब लोग दूध डालेंगे ही यदि मैं दूधके बदले पानी डाल दूँगा तो भी क्या पता लगेगा ? दैवात् डालनेके समयतक सबके ही मस्तिष्कमें यही विचार आ गया । फलस्वरूप सबने कुण्डमें पानी ही डाला, दूध किसीने भी नहीं । कुण्डमें शुद्ध जल-ही-जल पड़ा । ठीक इसी तरह व्यक्तियोंकी बुराईसे समष्टि-समाजमें बुराई और व्यष्टिकी अच्छाईसे समष्टिमें अच्छाई आ सकती है । अतः व्यष्टि-समष्टिका परस्पर अविरोधेन समन्वय ही दोनोंके कल्याणका कारण होता है । भारतीय राजनीति शास्त्रोंके अनुसार यद्यपि व्यष्टि शासक समष्टि शासक ईश्वरका ही प्रतीक होता है, इसीलिये उसमे तदनुसार आंशिक ही सही ईश्वरके गुणों एवं शक्तियोंका सन्निवेश अनिवार्यरूपसे होना चाहिये, तथापि मात्स्य न्यायसे पीड़ित जनताने शान्ति- सुव्यवस्थाके लिये राजाका वरण किया । इस तरह वह जनताके ऊपर बलात् लादा नहीं गया । इसीलिये उसके कार्योंमें विवेकका प्राधान्य होते हुए भी जन-सम्मति एवं जनसमर्थनकी उपेक्षा कभी न होनी चाहिये । अयोग्य अविवेकी शौर्यवीर्यविहीनके