भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पाश्चात्य राजनीति [९९]

नागरिकोको विभिन्न मतभेदोंके होते हुए भी एक सामान्य हित एव सामाजिक हितकी इच्छा होती है। यह भावना ही सामान्येच्छा तथा सुव्यवस्थाकी धात्री है। ऐसी भावना- को ग्रीन 'सामान्य स्वार्थ' कहता है। रूसोके मतसे 'सामान्येच्छानुसार जीवन- यापनमें ही व्यक्तिकी नैतिक, नागरिक तथा वास्तविक स्वतन्त्रता सम्भव है। इसके विपरीत व्यक्तिकी वास्तविक स्वतन्त्रता नहीं होती । ऐसे व्यक्तिके हितके लिये उसे सामान्येच्छाके अनुसार जीवनयापन करनेके लिये बाध्य किया जा सकता है। एक नटखट विद्यार्थीको कक्षामें चुप रहनेके लिये बाध्य करनेकी क्रियाका अर्थ है, उसे स्वतन्त्र होनेके लिये बाध्य करना ।' रूसोके अनुसार "स्वतन्त्र राज्यमें स्वतन्त्र नागरिक' यह आदर्श व्यवस्था है। इसमें स्वतन्त्रता और नियम एक दूसरेके विरोधी नहीं होते।" लाकके अनुसार भी राज्यकी अनुपस्थितिमें 'मनुष्य स्वतन्त्र और नैतिक जीवन व्यतीत करता था।' रूसोने इसका खण्डन कर बताया कि 'नैतिकता और अधिकार केवल राज्यमें ही सम्भव हो सकते हैं।' एक सत्ताधारियोंने राजसत्ताधारीका क्षेत्र कुछ सीमित अवश्य कर दिया । बोदोंने राजसत्ताधारीको नैसर्गिक मौलिक नियमोंके अधीन माना था। हाब्सने कहा था कि 'राजसत्ताधारी कोई अन्याय नहीं कर सकता, न किसी नागरिकको प्राणत्यागके लिये बाध्य कर सकता है।' रूसो सामान्येच्छाके क्षेत्रको सामान्य विषयोंतक ही सीमित मानता है । वेन्थम इसे उपयोगितावादसे सीमित मानता है । वेन्थमवादी उपयोगिताके विपरीत नियम-निर्माण नहीं कर सकता, फिर भी वैधानिक दृष्टिसे एक सत्तावादियोंका राज्य 'सर्वे सर्वा है', वह कोई भूल नहीं कर सकता । अपनी प्रादेशिक सीमामें राज्य सर्वाधिकारी प्रभु है । कोई भी सङ्घ, भले वह ईसाई धर्मकी तरह अन्ताराष्ट्रिय ही हो, राज्यके नियमोंसे परे नहीं हो सकता । हाँ, राजदूतावास एव उसके निवासी राज्यविधियोंके अधीन नहीं होते । इस तरह परदेशी नागरिको एवं दूतावासोंसे ही राज्यकी व्यापकता सीमित है । उन-उन राजदूतावासोंमें उन-उन राज्योंके ही नियम चलते हैं। अन्य सभी विषयोंमें राज्यका एकाधिकार ही होता है। इस अर्थमें राजसत्ताकी व्यापकता मान्य होती है। इसी तरह राजसत्ता अदेय मानी जाती है । राजसत्ताको राज्यसे हटानेका अर्थ है 'राज्यका अन्त करना ।' राजसत्ताके विना राज्य प्राणहीन होता है। अतएव अस्थायीरूपसे राज्य अपने राजसत्ताधारी अधिकार किसी संस्थाको दे सकता है । इस कार्यसे उसके राजसत्ताधारी रूपका अन्त नहीं होता । वह उन अधिकारोंको वापस ले सकता है। यदि एक राजसत्ताधारी राजा या संस्था पदत्याग करे तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि राजसत्ताका अन्त हो गया । इससे केवल राजसत्ताका स्थान परिवर्तित होता है । राज्यके समान ही राजसत्ता स्थायी है । सरकारमें परिवर्तन होनेसे राज्य या राजसत्तामें परिवर्तन नहीं होता । राज्यसत्ता