मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकभी-कभी एक व्यक्तिके पापका फल समुदायको भी भोगना पड़ता है । जैसे एक व्यक्तिने मधुमक्खीके छत्तेको छेड़ दिया । उसका दुष्परिणाम आस पासके सभी लोगोंको भोगना पड़ता है । भोक्ता लोग तात्कालिक फल भोगकर मुक्त हो जाते हैं, परंतु कर्ता ही दोषसे लिप्त होता है । परलोकमें अपना शुभाशुभ कर्म ही व्यक्तिके साथ जाता है । व्यक्तिका समुदाय ही समाज होता है । अतः व्यक्तिकी उत्पत्ति पहले हुई, फिर आवश्यकतानुसार समाजका निर्माण संगत है । रूसो कहता था—'प्राणी स्वतन्त्र जन्मा है; परंतु सभ्यताके जन्मसे वह विविध बन्धनोंसे जकड़ गया।' वह इस परतन्त्रताकी बेड़ीसे मनुष्यको मुक्त करना चाहता था । उसका कहना था कि 'अति प्राचीन नैसर्गिक स्वतन्त्रताका पुनर्जन्म तो नहीं हो सकता; परंतु एक नागरिक उच्च नैतिक वास्तविक स्वतन्त्रताकी स्थापना हो सकती है।' प्रत्यक्ष जनवादी राज्य रूसोका आदर्श राज्य था । 'प्रत्येक नागरिक व्यवस्था- पिकाका सदस्य होता था । राज्य-नियम स्वीकृतिसे ही बनते थे । वे नियम जनताकी सामाजिक इच्छाका प्रतिनिधित्व करते थे । प्रत्यक्ष जनवादी राज्यकी इच्छा ही रूसोकी 'सामान्येच्छा' थी । वही सत्ताधारी थी। सबकी इच्छामें एकताकी भावना नहीं होती । वह सुधारद्वारा ही सामान्येच्छा बन सकती है । सामान्येच्छामें सावयव या अवयवीकी-सी एकता होती है । सबकी इच्छामें इसका अभाव होता है । व्यक्तिकी शान्तिकी इच्छा सावयवकी एकतासे विदित होती है । जिस नियममें क्षेत्र, ध्येय, उद्गम, सामान्य होते हैं, वही सामान्येच्छाका प्रतीक होता है। अर्थात् जो नियम सभीके लिये हितकर हो, जो व्यक्ति या समुदायविशेषसे सम्बन्धित न होकर सम्पूर्ण राज्यसे सम्बन्धित हों तथा जो निःस्वार्थ सामाजिक इच्छाका प्रतिनिधित्व करे और उनके मतदानसे निर्धारित हो, वे ही नियम सामान्येच्छाके प्रतिनिधि हैं । "इच्छा दो प्रकारकी होती है। एक सामाजिक, दूसरी व्यक्तिगत । नागरिकोकी सामाजिक इच्छाका ही प्रतिनिधित्व सामान्येच्छा करती है। प्रगति एव शान्तिकी इच्छा सामान्येच्छा है । राष्ट्रोके वैमनस्यमूलक युद्ध आदिकी स्वार्थमूलक इच्छा सबकी इच्छा हो सकती है, सामान्येच्छा नही ।' रूसोके अनुसार सबकी इच्छा नागरिकोकी स्वार्थसम्बन्धी इच्छाका योग है । परंतु सामान्येच्छा तो नागरिकोकी सामान्येच्छाका प्रतिबिम्ब होती है । सबकी इच्छा अस्थायी हित और स्वार्थी ध्येयोंसे सम्बद्ध होती है। सामान्येच्छामें स्थायी हित एवं सार्वजनिक भलाई निहित है । सावयवकी इच्छाकी भाँति राज्यकी सामान्येच्छा स्थायी है और सदा सत्य एवं सामान्य हितका प्रदर्शन करती है। ऐसी इच्छाकी अनुपस्थितिमें न राज्य सम्भव है न नागरिकता । जोन्सके अनुसार 'जैसे एक खेलके खिलाड़ी विभिन्न इच्छा रखते हुए भी खेलके साधारण एवं नैतिक नियमोंका पालन करना चाहते हैं, वैसे ही