मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
४. चतुर्थ खण्ड: वैदिक वर्णाश्रम-धर्म, सर्वकल्याण, सनातन रामराज्य दर्शन एवं उपसंहार
३४८ मार्क्सवाद और रामराज्य जब कोई व्यापार न कर अपना धन बैंकमें जमा करता है तो वहाँ भी सूदके रूपमें कुछ-न-कुछ आमदनी होती है। फिर श्रमपूर्वक व्यापार तो कुछ अधिक लाभके लिये किया ही जाता है। देश-विशेष तथा काल-विशेषमें माँग बढ़ जानेसे दाम बढ़ जाता है। इसमें श्रमका सन्निवेश नहीं होता। पूर्वोक्त कथामें मृतमृत्तिकाके व्यापारमें श्रमकी कोई बात नहीं आयी, पर अवसर-विशेष- पर ऐसी वस्तुओंका भी दाम मिल जाता है। इसी तरह खेतीसे तथा अन्य उपयोगी वस्तुओंको बनाकर बेचनेसे भी लाभ होता है। यहाँ सौदेका दाम कम देने अथवा उचितसे ज्यादा दाममें बेचनेका कोई प्रश्न ही नहीं उठता। क्योंकि देश तथा कालकी महिमासे दाममें चढ़ाव-उतार होता ही रहता है। इसी तरह 'प्रत्येक वस्तुका दाम वस्तुकी तैयारीमें खर्च किये गये परिश्रमके समयसे निश्चित होता है', यह कथन भी असंगत है। क्योंकि आम्रादि फलोंका दाम उनकी मधुरता, हृद्यता आदि गुणोंपर तथा दुर्लभता, सुलभता आदि एवं माँगके आधारपर ही निश्चित होता है। परिश्रम समान होनेपर भी घटिया आमोंका उतना दाम नहीं होता। अतः उपकारकता तथा दुर्लभताके तारतम्यका ज्ञान ही वस्तुके मूल्यमें कारण होता है। हीरा-जैसी वस्तुमें भी उपकारकत्व दुर्लभत्वका ज्ञान न होनेसे अल्पमूल्यता या हेयताका व्यवहार हो सकता है। वकरी एवं गर्दभ, उष्ट्रके पालनमें श्रम एक-सा होनेपर भी वस्तुओंकी विशेषतासे ही दाममें विशेषता कहनी पड़ती है। इसी तरह परिश्रमके समयके आधारपर भी दामका निर्णय असंगत है। एक मजदूर अधिक समयतक कठोर-से-कठोर काम करता है, तब भी उसे थोड़ा ही पैसा मिलता है। परंतु एक इंजीनियर, डाक्टर, वकील मिनटोंमें हजारों रुपया प्राप्त कर लेता है। अतः यहाँ भी परिश्रमकी विशेषता तथा दुर्लभताके आधारपर ही दाममें विशेषता मान्य होनी चाहिये। वस्तुतः सफल कर्म ही श्रम है। देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहङ्कारकी हलचल ही कर्म है। तथा च फलोत्पादनानुकूल उपयोगी हलचल ही श्रम है। यह स्वयं ही अनेक प्रकारकी होती है, एक रूप नहीं है। एक विशिष्ट वकीलकी वाणीकी हलचल बहुत लाभदायक होती है, अतः उसका दाम बहुत ज्यादा होता है। एक साधारण वकील या वक्ताकी वाणीसे उतना लाभ नहीं होता, अतः उसका साधारण ही दाम मिलता है। इसी तरह इंजीनियर, डाक्टर आदिके सम्बन्धमें भी कहा जा सकता है। विशिष्ट बुद्धि, विशिष्टवाणी, विशिष्ट हस्तपादादि क्रियाओने होनेवाले फलोंके आधारपर उनके दामोंमें भी कमी-वेशी होती रहती है। दुर्लभता एवं माँगकी विशेषता ही सर्वत्र दामका कारण हुआ करती है। जैसे विशिष्टबुद्धियुक्त शारीरिक हलचल अधिक लाभदायक होती है उसी तरह
मशीन कच्चा माल तथा विशिष्टबुद्धियुक्त शारीरिक हलचल (श्रम) और लाभ- दायक होती है। जिसके पास उपर्युक्त साधनोंमें जितनी कमी है उतना ही उसे कम लाभ होता है। जैसे इस जन्म या जन्मान्तरके शुभकर्मसे जिसके पास उत्तम बुद्धि एवं कायिक, वाचिक उत्तम कर्म होते हैं, उसको केवल कायिक कर्मवालोंकी अपेक्षा अधिक फल मिलता है। इस तरह इस जन्म या जन्मान्तरके शुभकर्मसे भूमि, मशीन, कच्चा माल आदि जिसके पास हैं, उसे और भी बड़ा फल प्राप्त होता है। किसीके पास बुद्धि नहीं है, केवल स्थूल श्रम है, उसे थोड़ा ही फल मिलता है। किसी वकील, डाक्टर, इंजीनियर आदिमें बाह्य श्रम अत्यल्प है, केवल बुद्धिके ही बलपर उन्हें पर्याप्त धन मिलता है। किसीके पास मशीन, भूमि आदि बाह्य साधनोंकी प्रधानता है, वे उसके सहारे साधारण बुद्धि, वाणी एवं शरीरके कर्मसे ही बड़ा फल पा लेते हैं। इसमें भी अवसरका महत्त्व होता है। किसी अवसर- पर कोई वाणी, कोई औषध कोई क्रिया लाभदायक होती है। किसी अवसर- पर वही हानिकारक भी हो जाती है। शास्त्रीय कर्मोंमें भी अवसर तथा जानकारी- का विशेष महत्त्व है। डाक्टर, इंजीनियर, गणक, वकील आदिके भी जानकारी तथा कर्मोंकी विलक्षणताके समान ही वैदिक, तान्त्रिक, ज्योतिष्टोम, अश्वमेध, षडध्वशोधनादि कर्मोंमें भी ज्ञानक्रिया आदिकी विलक्षणता होती है। पाठ, जपमें श्रम समान होनेपर भी किसी मन्त्र-स्तोत्रके जप, पाठसे सामान्य फल होता है, किसी मन्त्र-स्तोत्रके जप, पाठसे विशिष्ट फल होता है। यहाँ श्रमकी विशेषता न होकर वस्तुकी विशेषतासे ही फलमें विशेषता मान्य होती है। परिश्रम, शक्ति एवं परिश्रमका भेद भी अवास्तविक तथा अनुपयुक्त है। वस्तुतः खरीदार फलके आधारपर ही दाम देता है। फलोत्पादक शक्तिका कुछ भी दाम नहीं होता। काम न करनेवाले या अन्यका काम करनेवाले श्रमिकके पास भी शक्ति है, परन्तु जिसके लिये उसका फल नहीं है उसके लिये वह व्यर्थ है। अतः उसका कुछ भी दाम नहीं देता। अतः परिश्रमशक्ति एवं परिश्रमके पृथक् फलकी कल्पना निराधार है। जितनेसे परिश्रमशक्ति बनी रहे, उतना दाम परिश्रमशक्तिका दाम है, यह नियम भी व्यभिचरित है। क्योंकि वकीलों, डॉक्टरों आदिके श्रमशक्ति बनाये रखनेसे कहीं बहुत अधिक दाम मिलता है, अतः उस दामको परिश्रमशक्तिका दाम नहीं कहा जा सकता। ऐसे स्थानोंमें परिश्रमका दाम दूसरा क्या हो सकता है? क्योंकि यहाँ तो कोई वस्तु बाजारमें जानेवाली नहीं है, जिससे लागत खर्च निकालकर सौदेके दामको परिश्रमका फल कहा जा सके। वकीलके परिश्रमका परिणाम न्याय-प्राप्ति कहा जा सकता है, उसके फलस्वरूप प्राप्त होनेवाले भूमि, हिरण्य आदिमें भले वकीलके परिश्रमको भी हेतु कहा जाय, परन्तु वह वादी आदिकी निजी वस्तु ही है। उसे प्राप्त होनी ही चाहिये। तभी
उसके पक्षमे न्याय हुआ है । 'अतः वह सब वकीलके श्रमका फल है, उसे ही मिलना चाहिये', यह नहीं कहा जा सकता । बहुत-सी ऐसी भी मजदूरी होती है जिसके द्वारा बाजारमे जानेवाला कोई सौदा नहीं बनता । उदाहरणार्थ अपने ही कुटुम्बके काम चलानेके लिये लोहार, दर्जी, बढ़ई, मकान बनानेवाले कारीगरसे उपयोगके लिये काम कराये जाते हैं, वहाँ धोबी, नाई, भंगीके श्रमोंका क्या दाम होगा ? यहाँ कोई बाजारमें बिकनेका सौदा नहीं बनता । अतः वहाँ बाजार भावके आधारपर श्रमका दाम निश्चित करना पड़ेगा । अवश्य ही वह दाम कामके अनुरूप तथा राष्ट्रीय नागरिकोंके जीवनस्तरके अनुरूप होना चाहिये । इसके विपरीत जहाँ कथञ्चित् मजदूरोंका जीवन चलानेके लिये नितान्त आवश्यक जो कम-से-कम मजदूरी देते हैं, वे अन्याय करते हैं । उनपर नियन्त्रण आवश्यक है । फिर भी सौदा बनानेवाले मजदूरोंकी उचित मजदूरी या नौकरीसे अतिरिक्त लागत खर्च निकालकर सौदेके सब दाममे भी मजदूरोंका अधिकार है, यह नहीं सिद्ध हो सकता । कोई कारण नहीं कि उपयोगार्थ काम करनेवाले मजदूरोंके परिश्रमका दूसरा दाम हो और सौदा बनानेवाले मजदूरोंके परिश्रमका दूसरा । बाजारमे गेहूँ खानेके लिये खरीदे या दानके लिये खरीदे अथवा बेचनेके लिये खरीदे, पर दाममे कोई अन्तर नहीं आता ।
कच्चा माल, मशीन और पूँजी तथा पूँजीपतिकी बुद्धि, साहस, चेष्टा आदि सब मिलकर लाभमे हेतु हैं। यदि मजदूरोंके परिश्रमका भेद मानकर परिश्रमका दाम भी पृथक्-पृथक् माना जाय तो मशीनोंके सम्बन्धमे भी कहा जा सकता है कि जितनेसे मशीन कामलायक बनी रहे, वह उनकी कार्यक्षमताका दाम होगा । मजदूरकी नौकरी आदि लागत खर्च निकालकर अवशिष्ट सौदेका दाम मशीनकी क्रियाका परिणाम है । लाखो मजदूरोंका काम करनेवाली मशीनके सम्बन्धमें वे सभी न्याय लागू होने चाहिये, जो मजदूरके सम्बन्धमें लागू होते हैं। अतः लाखो मजदूरोंकी श्रमशक्ति एव श्रमका जो भी फल है, वह सब मशीनके मालिकको मिलना चाहिये । कच्चा माल तो सौदेका उपादान-कारण ही होता है । रूई ही सूत बनती है, सूत ही कपड़ा बनता है, अतः रूई तथा सूतके मालिकको जो दाम दिया गया है, उसे भी अपूर्ण ही कहा जा सकता है । रुपया निश्चल पड़ा रहे तो उसका कुछ भी फल नहीं होता । परंतु बैंकमें जाता है तो व्याजरूपसे उससे कुछ आमदनी होती है । व्यापार-उद्योगमें लगानेसे उससे और बड़ी आमदनी होती है । इसलिये व्यापारमे पूँजी लगायी जाती है । यदि लागत खर्चके अतिरिक्त सौदेका दाम मजदूरके परिश्रमका ही फल है और वह सब मजदूरको ही मिलना चाहिये, तब तो कच्चे माल खरीदने, मकान, मशीन बनाने, मजदूरोंको बटोरकर काम कराने, मजदूरी देनेमे पूँजी लगाकर उसे खतरेमे डालना व्यर्थ ही होगा । उसकी अपेक्षा तो
बिना खतरा उठाये ही बैंकमें रुपया रखकर लाभ उठाया जा सकता है । अतः जैसे श्रमिकको श्रम लगानेका फल मजदूरी मिलती है, वैसे ही पूँजीपतिके पूँजी लगानेका फल मुनाफा मिलना चाहिये । हाँ, वह सीमित होना चाहिये । समाज तथा मजदूरोंको नुकसान पहुँचानेवाला न होना चाहिये ।
पूँजी और श्रम
अतिरिक्त श्रमके दरके सम्बन्धमें मार्क्सवादी कहते हैं कि "पूँजी या पैदावारके साधनोंको हम इस प्रकार बाँट सकते हैं । एक वे साधन, जो एक हदतक स्थायी हैं, उदाहरणतः इमारतें और मशीने, दूसरा कच्चा माल, तीसरे मजदूरको मजदूरी देनेके लिये पूँजी । पूँजीका जो भाग पैदावारके स्थायी साधनोंपर खर्च होता है, वह एक निश्चित समयमें पन्द्रह या बीस वर्षमें वसूल हो सकता है । इन साधनो- के दामपर सूद और घिसाई पूँजीपति आमदनीमेसे लगातार निकालता जाता है । कच्चे मालपर जो पूँजी खर्च होती है, वह भी तैयार किये गये सौदेके बिकते ही वसूल हो जाती है । पैदावारके इन साधनोंपर जो रुपया लगता है, पूँजीपति उसे सौदेके मूल्यसे वसूल कर लेता है, परन्तु उसपर मुनाफा वसूल नहीं किया जा सकता, वह घटता-बढ़ता नहीं । परिश्रमकी शक्ति इन साधनोंपर लगाये बिना कुछ लाभ नहीं हो सकता । पैदावारमे लगाये गये पूँजीपतिके धनका तीसरा भाग परिश्रमके शक्तिके खरीदनेमे लगता है । पूँजीपतिका मुनाफा उसकी पूँजीके इस भागसे आता है। "परिश्रम करनेकी शक्ति-जिस दामपर खरीदी जाती है, परिश्रमके फलका दाम उससे अधिक होता है । सौदेके दाममेंसे परिश्रमकी शक्ति या दाम निकाल देनेपर 'अतिरिक्त दाम' बच जाता है । अतिरिक्त दाम बढानेका सीधा तरीका यह है कि परिश्रमकी शक्तिके दाम मजदूरीको घटाया जाय, उदाहरणतः यदि मजदूर द्वारा कराये गये दस घंटे परिश्रमका दाम एक रुपया है और उसमेंसे मजदूरको उसकी परिश्रमकी शक्तिका मूल्य आठ आने दे दिया जाता है तो अतिरिक्त मूल्य आठ आने प्रति मजदूर बच जाता है । परिश्रमके मूल्य एक रुपयेमेसे यदि मजदूरी घटा दी जाय तो अतिरिक्त मूल्यका मुनाफा बढ़ जायगा । दूसरा उपाय मशीनोंका प्रयोग बढाकर पैदावार बढाना है । जिसमें परिश्रमके शक्तिके कम खर्च होनेसे उसके लिये कम दाम देना पड़े और मालिकके पास अतिरिक्त दाम या मुनाफा अधिक बच जाय । अतिरिक्त श्रमको बढानेका तीसरा उपाय यह है कि परिश्रमकी शक्तिका मूल्य तो न बढे, परन्तु परिश्रम अधिक दामका अधिक समयतक कराया जाय ताकि अतिरिक्त मूल्यका भाग बढ जाय । इसके लिये मजदूरोंसे बजाय दस घंटेके बारह घंटे काम कराया जाय । दस घंटे काम करानेसे पाँच घंटेमें तो मजदूर अपने परिश्रमकी शक्तिका दाम पैदा करता है, जो उसे मालिकसे मिलता है और पाँच घंटेमे मालिकके लिये अतिरिक्त दाम । अब काम बारह
३५२ मार्क्सवाद और रामराज्य घंटे कराये जानेपर और परिश्रमकी शक्तिका दाम मजदूरी न बढानेपर अतिरिक्त श्रम बजाय पाँच घंटेके सात घंटे होने लगेगा। इसीलिये जब मशीनोंद्वारा थोडे समयमें अधिक काम हो सकता है, तब भी मालिक लोग कामके घंटे घटानेके लिये तैयार नहीं होते। “इस प्रकार हम देखते हैं कि मुनाफा कमानेकी पूँजीवादी प्रणालीमें मशीनों- का प्रयोग बढ़ने, पैदावार बढ़ने आदि सभी प्रकारकी उन्नतिसे मजदूरोंको नुकसान और पूँजीपतियोंको लाभ होता है, क्योंकि इन सब वस्तुओंका व्यवहार समाजकी आवश्यकताओंको पूरा न कर मुनाफा कमानेके उद्देश्यसे किया जाता है। पैदावार- के सब साधनोंके मौजूद होते हुए भी पैदावार उस समयतक नहीं हो सकती जब- कि मेहनतकी शक्तिको व्यवहारमें न लाया जाय। पूँजीवादी समाजमें मजदूरोंसे मेहनतकी शक्ति आती है। मजदूरोंकी मेहनतकी शक्तिको मजदूरी या वेतन- द्वारा खरीदकर पैदावारके साधनोंको चलाया जाता है! मजदूरी पूँजीवादी समाजका विशेष महत्त्वपूर्ण अङ्ग है, क्योंकि मजदूरीद्वारा ही पूँजीपति मजदूर- की मेहनतसे मुनाफा उठाता है। “अपने लाभके विचारसे पूँजीपति मजदूरोंकी मजदूरी अर्थात् परिश्रम करनेकी शक्तिका दाम सदा ही घटानेकी कोशिश करते रहते हैं। परिश्रमकी शक्तिके मूल्य और परिश्रमके मूल्यपर विचार करते समय यह कहा गया है कि पूँजीपतिके व्यवसाय- में परिश्रम करनेवाले मजदूरके परिश्रमके दो भाग होते हैं। मजदूरके परिश्रमका एक वह भाग होता है, जो उसकी परिश्रमकी शक्तिके मूल्यमें उसे दे दिया जाता है और उसके परिश्रमका दूसरा भाग वह होता है, जिसका उसे कोई फल नहीं मिलता, अर्थात् अतिरिक्त श्रम। मजदूर इस रहस्यको नहीं जानता। उसे यही समझाया जाता है कि ‘जितने दामका परिश्रम उसने किया है, उतना दाम उसे मिल गया है’ मजदूरको कहा जाता है कि ‘तुम्हारे परिश्रमका जो दाम एक पूँजीपति तुम्हें देता है, उसे यदि तुम कम समझते हो तो दूसरी जगह मजदूरी तलाश कर सकते हो।’ मजदूरीका दर समाज भरमें एक ही रहता है, क्योंकि सभी पूँजीपति अतिरिक्त श्रम- से लाभ उठाना चाहते हैं। “यदि मजदूरकी मजदूरी उसी पदार्थके रूपमें दी जाय जिसे वह अपन परिश्रमसे तैयार करता है, तो उसे इस बातका अनुमान हो सकता है कि उसके परिश्रमके फलका कितना भाग उसे मिलता है, और कितना भाग मालिककी जेबमें चला जाता है। परंतु मजदूरी या वेतनका पर्दा मजदूरसे उसके शोषणकी वास्तविकताको छिपाये रहता है। पूँजीवादी समाजमें मेहनत करनेवाली साधनहीन श्रेणी पैदावार तो बहुत अधिक करती है, परंतु खर्च करनेके लिये बहुत कम पाती है। पैदावारकी शक्ति और साधन तो खूब बढ़ते जाते हैं, किंतु जनताकी
मार्क्स्रीय अर्थ-व्यवस्था ३५३
पैदावार, खर्च करनेकी शक्ति घटती जाती है । इन सबका कारण है, अतिरिक्त मूल्यके रहस्यमय मार्गद्वारा जनताके परिश्रमका मुनाफेके रूपमें पूँजीपति श्रेणीके खजानोमे जमा होते जाना । इस व्यवस्थासे मेहनत करनेवाली साधनहीन श्रेणी तो संकट भोगती ही है, परंतु पूँजीपति श्रेणीको भी कम उलझनका सामना नहीं करना पडता । समाजमें हो सकनेवाली पैदावारको जनता खपा नहीं सकती । पूँजीपतियोंके पैदावारके विशाल साधन निष्प्रयोजन खडे रहते हैं । उन साधनोमें लगी उनकी पूँजी उन्हे कोई लाभ नही पहुँचा सकती और वे भयंकर आर्थिक संकट अनुभव करने लगते हैं । 'यद्यपि पूँजीवादी व्यवस्थामे मेहनत करनेवाली श्रेणीका शोषण उन्हे दी जाने- वाली मजदूरीके पर्देमे छिपा रहता है, जिसके द्वारा उन्हे सदा यह विश्वास दिलाया जाता है कि उनकी मेहनतका पूरा फल मेहनत करनेवालोको मिल जाता है, परंतु मजदूरोको उनकी मेहनतसे मिलनेवाले फलमे नित्य कमी आते जानेसे उनका जीवन दिन प्रतिदिन संकटमय होता जाता है, इसलिये मजदूरश्रेणी अपनी मजदूरीको बढानेकी पुकार उठाये बिना नही रह सकती ।' मार्क्सने उसी बातको बार-बार दोहराया है । कहा जा चुका है कि मजदूरीकी दर उचित होना चाहिये, परंतु मार्क्सवादी तो किसी न्यायालय या पंचायतकी बात माननेको प्रस्तुत ही नही होते । समझौता उन्हे अभीष्ट नही होता । उनका उद्देश्य तो सम्पूर्ण पूँजीको हथियाना है। जो पहले बेकारीके कारण परेशान होकर नौकरी ढूँढता था उसे काम मिला । नौकरी मिलनेसे जब बैठनेको जगह मिल गयी तो अब वह मालिकको समाप्त करके स्वय मालिक बनना चाहता है। ऐसी दृष्टिवाला व्यक्ति या समाज समझौता भला कब चाहेगा ? शोषण, उत्पीडनका अतिरंजित बीभत्स वर्णन केवल उत्तेजना और विद्वेष फैलानेकी दृष्टिसे मार्क्सवादी करते हैं । उनके वर्णनमें तथ्यांश नगण्य ही होता है । मार्क्सका अतिरिक्त श्रम, अतिरिक्त मूल्य सर्वथा निराधार है । मजदूरीका मार्ग बिल्कुल स्पष्ट है । इसमे कोई भी रहस्य नही । जैसे आपसी समझौते या पंचायत अथवा निष्पक्ष सरकारद्वारा कच्चे मालकी दर निर्धारित होती है वैसे ही श्रमकी भी दर निर्धारित होती है और हो सकती है। यह प्रत्यक्ष ही ससारकी आँखमे धूलि-प्रक्षेप है कि 'व्यापार या उद्योगमे होनेवाले लाभका मूल कारण उस श्रमिकका श्रम ही है, जो वेतनसे काम करता है। पूँजीका लाभमें कोई हाथ नहीं है।' जब सूदपर रुपया लेने या बैंकमे जमा कर देनेसे भी रुपयोका सूद मिलता है, तो फिर यदि अधिक लाभका लोभ न हो तो कौन बुद्धिमान् उद्योगोमे रुपया लगायेगा और क्यो रुपयेको व्यर्थ खतरेमें डालेगा ? क्योकि उद्योग या व्यापारमें हानिकी भी तो सम्भावना रहती है और झझटमें ऊपरसे पडना । लाभमें रुपयेका कोई हाथ भी
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नहीं समझा जाता । यदि लाभ सब मजदूरका ही है पूँजीपतिका कुछ नही तब क्या पूँजीपति पागल है, जो निरर्थक अपना रुपया खतरेमे डालेगा ? और झंझट मोल लेगा ? हर्गिज नही, फिर तो अच्छा होता कि वह अपनी पूँजी बैठकर खाये और दूरसे तमाशा देखे कि साधनोके बिना मजदूर श्रममात्रसे क्या कमाता है ? पैदावारके साधनोको बढाना, औद्योगिक नगरोमे श्रमिकोको इकट्ठा करके उचित नौकरी देकर योग्य कामपर लगाकर उन्हे शिक्षित तथा अनुभवी बनाना अपराध नहीं है । वस्तुतः रामराज्यवादीके मतानुसार महायन्त्रका निर्माण अपराध है और उसपर प्रतिबन्ध लगाना चाहिये । मार्क्सवादमे तो पूँजीवाद, साम्यवादका उपकारक है, क्योकि मार्क्सवादका यन्त्रवाद ही प्राण है । मनुष्योको भूखा-नगा बनानेवाला पूँजीवाद अवश्य अपराधी है, उसका मिटना आवश्यक है। परतु विचारणीय बात यह है कि कही भूखा नगा बना देनेका लाञ्छन लगाकर उसके विनाशका बहानामात्र तो नही ढूँढा जा रहा है ? जैसे हिटलर, मुसोलिनी दूसरोको सभ्य बनानेके लिये उनपर हमला करनेके लिये अपनेको बाध्य समझते थे । एक भेड़िया नीचेकी ओर पानी पीनेवाली बकरीको अपराधिनी घोषित कर उसे खानेको अपनेको बाध्य मानता है। उसी तरह देशका सर्वस्व हरण करके अपना अधिनायकत्व स्थापित करनेके लिये पानी पी-पीकर मार्क्सवादी पूँजीवादको कोसते हैं। अतः न तो सब व्यवस्थाओसे दूसरी व्यवस्थाओका जन्म ही होता है न आवश्यक ही है । यह स्पष्ट है कि पूँजी, मशीन, कल, कारखाने, कच्चा माल और श्रमिको- का श्रम सब मिलकर उत्पादनके हेतु होते हैं । जैसे श्रमिक बिना सब चीजे व्यर्थ होती हैं, वैसे ही कच्चे माल आदि बिना श्रमिकोका श्रम भी व्यर्थ रहता हैं, तभी बेकारीका प्रश्न उठता है, बल्कि गन्ने आदि कई ढंगसे कच्चे माल, कारखानोमे बिना गये भी उपयोगी होनेसे कीमती होते हैं । पर श्रम इन वस्तुओके बिना सर्वथा व्यर्थ रहता है । पूँजीपति जैसे दामसे मशीन खरीदता है, मकान बनाता है, दामसे कच्चा माल खरीदता है, वैसे ही दामसे श्रमिकोका श्रम भी खरीदता है। जैसे श्रमिकोके श्रमके दाममे घटाव-बढाव होता रहता है, वैसे ही कच्चे माल और मशीनोके दाममें भी घटाव-बढाव होता रहता है । काम, कामके घंटे तथा वेतन पारस्परिक समझौतेसे ही तय होता है । यदि आपसी समझौतासे तय न हुआ हो तब धर्मशास्त्रद्वारा निर्धारित वेतन श्रमिकोको प्राप्त हो सकता है । राष्ट्र हितके लिये बेरोजगारी दूर करनेके लिये, कामके घंटे और वेतन- की दरका निर्धारण सरकार भी कर सकती है । सर्वथापि आयका जरिया केवल श्रम नहीं, किंतु श्रम मशीन, कच्चा माल सब मिलकर ही आयके हेतु हैं । कच्चा माल, मशीन, श्रम सबका दाम पूँजीपतिने चुकाया है, अतः न्यायतः आयका हिस्सेदार
मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३५५ पूँजीपति ही है, अतिरिक्त श्रम और अतिरिक्त मूल्यकी कल्पना सर्वथा निराधार है। धर्मशास्त्रोने स्पष्ट ही आयमें पूँजी लगानेवालोका हिस्सा बतलाया है। वेतनके सम्बन्धमें आपसी समझौते तथा न्यायालयके मतका उल्लेख वृहस्पति-स्मृतिमें इस प्रकार है— कुलीनदक्षानलसैः प्राज्ञैर्नाणकवेदिभिः । आयव्ययज्ञैः शुचिभिः शूरैः कुर्यात्सह क्रियाः ॥ समोऽतिरिक्तो हीनो वा यत्रांशो यस्य यादृशः । क्षयव्ययौ तथा वृद्धिस्तस्य तत्र तथाविधा ॥ प्रयोगं कुर्वते ये तु हेमधान्यरसादिना । समन्यूनाधिकैरंशैर्लाभस्तेषां तथाविधः ॥ (बृहस्प० स्मृति० गायक० १३ । १-२, ४) अर्थात् कुलीन, दक्ष, निरालस्य, विद्वान्, व्यापारविशेषज्ञ, आय-व्ययके ज्ञाता साहसी लोग मिलकर व्यापार करे। मूलधनमें जिनका जितना कम या अधिक अंश होता है, उसके अनुसार हीं उनका हानि-लाभमें भी भाग रहता है। सुवर्ण, अन्न, रसादिका व्यापार करनेवालोका मूलधनके भागके अनुसार ही लाभमें भी भाग होता है। यहाँ स्पष्ट ही व्यापारमें धन लगानेवालोका ही लाभमें हिस्सा कहा गया है। लाभको श्रममात्रका फल नही माना गया। समो न्यूनाधिको वांशो येन क्षिप्तस्तथैव सः । व्ययं दद्यात्कर्म कुर्याल्लाभं गृहीत चैव हि ॥ क्षयहानिर्यदा तत्र दैवराजकृताद् भवेत् । सर्वेषामेव सा प्रोक्ता कल्पनीया तथांशतः ॥ (बृहस्प० स्मृति० गायकवाड संस्कृ० १३ । ५, ८) बराबर या कम-अधिक मूल धनमें जिसका जैसा भाग होता है तदनुसार ही उसका वेतन आदि सम्बन्धसे व्यापारिक व्ययमें खर्च होगा, तदनुसार ही लाभमें हिस्सा मिलेगा। उसी तरह यदि राजकृत या दैवकृत हानि हो तो भी मूलधनके भागानुसार ही हानि भी सबको ही सहनी पड़ेगी। अनिर्दिष्टो वार्यमाणः प्रमादाद्यस्तु नाशयेत् । तेनैव तद्भवेद्देयं सर्वेषां समवायिनाम् ॥ राज्ञे दत्त्वा तु षड्भागं लभेरंस्ते यथांशत ॥ दैवराजभयाद्यस्तु स्वशक्त्या परिपालयेत् । तस्यांशं दशमं दत्त्वा गृह्णीयुत्तँऽशतः परम् ॥ (बृह० स्मृ० १३ । ९-११)
३५६ मार्क्सवाद और रामराज्य समुदायकी सम्मति बिना एवं मना करनेपर भी अगर किसीने प्रमादवश धन नष्ट किया है, तो उसे सबको धन देना पड़ेगा । राजाका षष्ठांश देकर शेष आय मूल-धनके भागानुसार सबको मिलना चाहिये । जिसने विशेषरूपसे दैवभय या राजभयसे धनको नाश होनेसे बचाया है उसे दशांश देकर शेषका अंशानुसार समुदायके लोग ग्रहण करे— बहूनां सम्मतो यस्तु दद्यादेको धनं नरः। करणं कारयेद्वापि सर्वैरेव कृतं भवेत् ॥ समवेतैस्तु यद्दत्तं प्रार्थनीयं तथैव तत्। न याचते च यः कश्चिल्लाभात्स परिहीयते ॥ श्रूयतां कर्षकादीनां विधानमिदमुच्यते । वाह्यवाहकबीजाद्यैः क्षेत्रोपकरणेन च। ये समाः स्युस्तु तैः सार्धं कृषिः कार्या विजानता ॥ ( वही २२; २५—२७) बहुतोंकी सम्मति किसी उद्योगके लिये, एक व्यक्ति जो धन देकर उद्योग प्रारम्भ करता है, वह सभीद्वारा दिया गया समझा जाना चाहिये । जिन संयुक्त लोगोंने जो धन दिया है सभीको मिलकर ही उसे माँगना चाहिये । जो उनसे नही माँगता उसे लाभमें वचित रहना पड़ेगा । संयुक्तरूपसे कृषिकर्म करनेवालोमें भी जिनका हल, बैल, मजदूर, बीज, खाद, खेत आदिका सामान या कम, अधिक जिनके जैसे हैं, तदनुसार ही उनको लाभमे हिस्सा मिलना चाहिये । वाह्यबीजात्ययाद्यच्च क्षेत्रहानिः प्रजायते । तेनैव सा प्रदातव्या सर्वेषां कृषिजीविनाम् ॥ हेमकारादयो यत्र शिल्पं सम्भूय कुर्वते । कर्मानुरूपं निर्वेशं लभेरंस्ते यथांशतः ॥ शिक्षकाभिज्ञकुशला आचार्याश्चेति शिल्पिनः । एकद्वित्रिचतुर्भागान् लभेयुस्ते यथोत्तरम् ॥ हर्म्यं देवगृहं वापि धार्मिंकोपस्कराणि च। सम्भूय कुर्वतां चैषां प्रमुखो द्व्यंशमर्हति ॥ नर्तकानामेष एव धर्मः सद्भीरुदाहृतः । तालज्ञो लभते ह्यर्धं गायनास्तु समांशिनः ॥ ( वही २८, ३४-३७) जिसके हल-बैल या बीजकी कमीसे जो खेतकी हानि हो उसीको वह हानि सहनी पड़ेगी । हेमकार आदि शिल्पी जहाँ मिलकर काम करते हों, वहाँ कर्मानुरूप प्रत्येकको वेतन मिलना चाहिये । शिक्षक, अभिज्ञ, कुशल आचार्यको एक, दो, तीन तथा चार भाग क्रमेण मिलना चाहिये । प्रासाद, देव, गृह धार्मिक उपस्करण
मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३५७ बनानेमें प्रमुखको दो अंश मिलना चाहिये । नर्तकोंमें यही विधि है । तालज्ञको आधा मिलने चाहिये और गायकोंको समान अंश मिलना चाहिये । इन प्रसंगोंसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि व्यापार, उद्योग तथा अन्य कृष्यादि कर्मोंमें होनेवाले लाभ एव हानिके भागी धनादि साधन लगानेवालोंको ही मिलता है । श्रमिकोंको उनके श्रमका फल वेतन होता है । अतिरिक्त आय और अन्तर्विरोध मार्क्सवादियोंका कहना है कि 'समाजकी कोई भी व्यवस्था जब पूर्ण विकासको प्राप्त हो चुकती है और उस व्यवस्थामें समाजके लिये आगे विकास करनेका अवसर नहीं रहता तो उस व्यवस्थाको तोड़नेके लिये स्वयं ही विरोधी शक्ति पैदा हो जाती है, जो उसे तोड़कर नयी व्यवस्थाका मार्ग तैयार कर देती है ।' मार्क्सवादके विचारसे 'पूँजीवाद ऐसी अवस्थामें पहुँच चुका है कि उसकी व्यवस्थाको बदले बिना समाजका विकास आगे नहीं हो सकता, समाजकी पैदावारकी शक्तियाँ आगे उन्नति नहीं कर सकतीं । ऐतिहासिक नियमके अनुसार पूँजीवादी समाजने अपनी व्यवस्थाका अन्त कर देनेके लिये शक्तिको जन्म दे दिया है । यह शक्ति है, पूँजीवादके शोषणद्वारा उत्पन्न साधनहीन श्रेणी ।' मार्क्सवादी कहते हैं कि 'साधनहीन श्रेणीकी संख्या समाजमें प्रति हजार ९९८ से भी अधिक है । पैदावारका केन्द्रीकरणकर पूँजीवादने इस साधनहीन श्रेणीको औद्योगिक नगरोंमें जमाकर संगठित होनेका अवसर दिया है । पूँजीवादने मशीनोंके विकासमें सहायता देकर और मशीनोंका उपयोग बढ़ाकर समाजद्वारा की जानेवाली पैदावारमें मेहनत करनेवाली श्रेणीका भाग घटाकर उसे भूखा और नंगा छोड़कर उन्हें अपने जीवनकी रक्षाके लिये लड़नेको विवश कर दिया है । इसकी जीवन-रक्षा तब हो सकेगी जब यह श्रेणी जीवन-रक्षाके साधनोंको प्राप्त करनेकी राहपर चलेगी । इस श्रेणीका पहला संगठित प्रयत्न इस बातके लिये है कि समाजमें यह जितनी पैदावार करती है, उसमेंसे कम-से-कम निर्वाहयोग्य पदार्थ तो उसे मजदूरीके रूपमें मिल जाय ।' मार्क्सका यह सिद्धान्त काकतालीय न्यायसे भले ही घट जाय, किंतु सत्य नहीं है । अन्तर्विरोध, पिछली व्यवस्थाका विनाश, दूसरी व्यवस्थाका जन्म होनेका सिद्धान्त व्यापक नहीं है, क्योंकि मार्क्सके अभिमत 'वर्गहीन समाज-व्यवस्थामें' ही यह नियम व्यभिचरित है । वह भी एक व्यवस्था है ही । परन्तु उन्हें उसका 'विनाश और उसमें अन्तर्विरोध नहीं मान्य' है । इस तरह रामराज्यवादी
३५८ मार्क्सवाद और रामराज्य रामराज्यको ही अन्तिम व्यवस्था मान सकता है। मार्क्सके गुरु हीगेलका आदर्श राज्य भी ऐसा ही है, जिसमें अन्तर्विरोध नही होता । चीनी गणतन्त्रमे भी पूँजीवादका विनाश आवश्यक नही समझा गया । रामराज्य-प्रणालीसे बेकारी, भूखमरी नहीं व्यापेंगी । आर्थिक सकट भी नही आयेगा । इसीलिये मालके खपतकी भी कमी नहीं होगी। जैसे पूँजीपति सरकार नये-नये कामोके लिये नयी- नयी मशीनोका आविष्कार तथा प्रयोग कर सकती है, उसी तरह पूँजीपति व्यक्ति भी । जब एक वस्तुका उत्पादन माँगसे अधिक होने लगेगा तो दूसरी वस्तुके उत्पादनमे लग जायगा। जब दूसरे बाजार हैं नही, मालका उत्पादन आवश्यकतासे अधिक होता है, तब काम ठप्प रखनेकी अपेक्षा दूसरे कामका आरम्भ लाभदायक भी होगा । समय-समयपर व्यापारो एव उद्योगोमे उद्योगपति रद्दोबदल करते ही हैं, यह कोई नयी बात नहीं है । सर्वहारा और क्रान्ति मार्क्सवादियोके अनुसार 'साधनहीन श्रेणी अपनी परिस्थितियोके कारण मुख्यतः तीन भागोमे बँटी हुई है, जिनमें किसान, मजदूर और निम्न, मध्यम श्रेणीके नौकरी पेशाके लोग हैं। साधनहीन श्रेणीके इन तीनो भागोमेसे औद्योगिक देशोमें मजदूर लोग संख्यामें सबसे अधिक हैं। संख्यामे सबसे अधिक होनेके अलावा उनका घरबार आदि कुछ भी शेष न रहनेसे समाजकी मौजूदा व्यवस्थासे उन्हे कुछ मोह नहीं। इनकी अवस्थामे परिवर्तन आनेसे इन्हे किसी प्रकारकी हानिका डर नही। औद्योगिक केन्द्रोंमें मजदूरोके बहुत बडी संख्यामे एकत्र हो जानेसे उनमें संगठितरूपसे एक साथ काम करनेका भाव भी पैदा हो जाता है और नगरोमे रहनेके कारण राजनैतिक परिस्थितियोको भी वे बहुत शीघ्र अनुभव करने लगते हैं। पूँजीवादके विरुद्ध आनेवाली साधनहीन श्रेणीकी क्रान्तिमे ये मजदूर लोग ही अगुआ होंगे। किसान भी यद्यपि मजदूरकी तरह ही साधनहीन हैं, परंतु उनकी परिस्थिति उनके सच्चे और सगठित होनेके मार्गमे रुकावट डालती है। किसान प्रायः भूमिके एक छोटेसे टुकड़ेसे बँधा रहता है, जिसपर मेहनत करके वह जो पैदा करता है उसका केवल वही भाग उसके पास रह जाता है, जिसके बिना किसानमे परिश्रमकी शक्ति कायम नहीं रह सकती । शेष चला जाता है भूमिको मालिक कहलानेवाली श्रेणीके लिये । किसानका शत्रु भी मजदूरकी भाँति होता है। और वह भी वास्तवमे मजदूर ही है, जो मिलोमे काम न कर भूमिके टुकड़ेपर मेहनत करता है और अपने आपको साधनहीन न समझकर एक प्रकारसे भूमिके छोटेसे टुकड़ेका मालिक समझता है । भूमिके इस टुकड़ेके मोहके कारण उसे क्रान्तिसे भय लगता है । किसानोका काम करनेका तरीका ऐसा है कि अलग-अलग काम करनेसे उनमें संगठनका भाव भी जल्दी पैदा नहीं हो पाता । नगरोंसे दूर रहनेके कारण वे
मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३५९ बदलती हुई परिस्थितियों को बहुत देरमें समझ पाते हैं। सामाजिक क्रान्तिद्वारा भूमिको समाजकी सम्पत्ति बनाये बिना उनका निर्वाह नहीं। उसे इसमे लाभ ही होगा, परन्तु वह इस क्रान्तिमें आगे न आकर क्रान्तिकारी मजदूरोंका सहायक ही , बन सकता है। बहुत सम्भव है अपने अज्ञानके कारण वह क्रान्तिका विरोध भी करने लगे, परन्तु उसके हितको ध्यानमें रखकर सामाजिक क्रान्तिके मार्गपर उसे चलाना मजदूरश्रेणीका काम है। निम्नश्रेणीके साधनहीन, नौकरी-पेशावाले लोगोंका इस आन्दोलनमें विशेष महत्त्व है। ये लोग यद्यपि शिक्षाकी दृष्टिसे साधनहीन श्रेणीके नेता होने लायक हैं, परंतु अपने संस्कारोंके कारण यह अपने-आपको मजदूरश्रेणीसे ऊँचा तथा पृथक् समझते हैं। ये लोग अपने शक्तिको श्रेणीके रूपमें संगठित करनेमें न लगाकर अपनी वैयक्तिक उन्नतिद्वारा अपने-आपको ऊँचा उठानेका यत्न करते हैं। ये लोग पूँजीपतियोंद्वारा साधनहीन श्रेणी किसान, मजदूरोंके शोषणमें पूँजीपतियोंका शासन कायम रखनेमें ही अपना हित समझते हैं। क्रान्ति-विरोधी और प्रतिक्रिया- वादी होनेका कारण इस श्रेणीका विश्वास है कि साधनहीन श्रेणीका शासन हो जानेपर इन्हें भी मजदूर बन जाना पड़ेगा। इनके जीवन-निर्वाहका दर्जा गिर जायगा। ये लोग समझते हैं कि समाजवादमें सभी लोग गरीब हो जायेंगे, परंतु मार्क्सवादका विचार इससे ठीक उलटा है । उनका कहना है कि पूँजीवादमें पूँजीपतियोंके मुनाफा कमा सकने और समाजको उपयोगके पदार्थ मिल सकनेके उद्देश्योंमें अन्तर्विरोध होनेके कारण समाजमें पैदावारके साधनोंपर रुकावट न रहेगी। समाजमें इतनी पैदावार हो सकेगी कि साधारण परिश्रमसे ही सब लोगोंकी अपनी आवश्यकताएँ पूर्ण करनेका अवसर रहेगा और ९९ प्रतिशत जनताकी अवस्था समाजवादमें पूँजीवादकी अपेक्षा बहुत बेहतर हो जायगी। निम्न, मध्यम श्रेणीके वे भाग जो सचेत होकर इस बातको समझ जाते हैं कि पूँजीवादी व्यवस्थामें अपने परिश्रमका फल उचितरूपसे न पा सकनेके कारण वे मजदूरश्रेणीमें मिलते जा रहे हैं और साधनहीन होनेके नाते उनके हित मजदूरों तथा दूसरे साधनहीनोंके ही समान हैं, वे साधनहीन श्रेणीके आन्दोलनमें आगे बढ़कर अगुआका काम करते हैं। साधनहीन श्रेणियोंके आन्दोलनोंकी गतिके बारेमें मार्क्सने लिखा है, ‘साधनहीन मजदूरश्रेणीको मजदूरी और वेतनकी गुलामीमें फँसाकर उसका भयंकर शोषण हो रहा है और वह जीवनके कुछ अधिकार पा सकनेके लिये छटपटा रही है। परंतु इस श्रेणीको इन छोटे-मोटे सुधारोंके मोहमें नहीं फँसना चाहिये । उन्हें याद रखना चाहिये कि इस आन्दोलनद्वारा वे केवल पूँजीवादके परिणामोंको ही दूर करनेका यत्न कर रहे हैं। वे पूँजीवादको जो उनकी मुसीबतोंका कारण है, दूर
३६० मार्क्सवाद और रामराज्य
करनेका यत्न नहीं कर रहे हैं। वे अपनी गिरती हुई अवस्थामें केवल रोक लगानेका यत्न कर रहे हैं। वे समाजकी इमारतको नये सिरेसे बनानेका यत्न न कर गिरती हुई इमारतमें टेक देनेका यत्न कर रहे हैं .... 'मुनासिब कामके लिये मुनासिब मजदूरीकी जगह अब उन्हे अपना यह नारा बुलंद करना चाहिये ...... 'मजदूरी और पूँजीवादी व्यवस्थाका खात्मा हो।' मार्क्सवाद इतिहासके जिस क्रम और विचारधारा मे विश्वास करता है उसके अनुसार पूँजीवादी प्रणालीमे सुधार और लीपापोतीकी गुंजाइश बाकी नहीं। वह अपना उद्देश्य समझता है एक नवीन समाजका निर्माण। असलमे चीनके अनुभवोसे ही मार्क्सवादियोको मजदूरोसे भिन्न किसान और निम्न मध्यम- श्रेणीको भी साधनहीन श्रेणीमे मिलाना पड़ा। चीनकी क्रान्तिसे पहले मार्क्सवादी कहते थे—'सर्वहाराके ही अधिनायकत्वमे क्रान्ति होगी। उसीसे समाजवादकी स्थापना होगी। भले ही किसानोकी सख्या बडी है तथापि वह उदीयमान नही है। मजदूरदल ही उदीयमान है।' पर चीनमें कृषकोद्वारा ही क्रान्ति हुई। सम्भवतः आगे चलकर परिस्थितियोके थपेड़ेसे मार्क्सवादियोको अन्य आस्तिकोके भी सिद्धान्त मानने पड़ जायँ। क्रुश्चेव तथा बुल्गानिनने भारत आकर बहुत-से भारतीय परम्पराओका अनुगमन किया ही। यह कहा जा चुका है कि विशेषतः भारत-जैसे सास्कृतिक देशोमे उच्च खानदानके लोग ही परिस्थितिवश मजदूर बनकर मजदूरी करते हैं। उनमे धर्म, सभ्यता, सस्कृति तथा अपनी मर्यादाकी रक्षाका भाव रहता है। वे मजदूरी करके कुछ पैसा पाकर अपने धर्म, संस्कृति तथा माता, पिता, पुत्र, पत्नी आदि कुटुम्ब एवं कुलपरम्पराका रक्षण चाहते हैं। वे क्रमागत ( बपौती ) सभ्यता, संस्कृति अपनी सम्पत्ति एव मिल्कियतमें अपना जन्म-सिद्ध अधिकार मानते है। भारतमें मिताक्षराके अनुसार पूर्वजोकी सम्पत्तिमे पुत्र-पौत्रोका स्वत्व मान्य है। गर्भस्थ बालककी ओरसे भी न्यायालयमे उठायी जानेवाली स्वत्वरक्षणकी माँग मान्य होती है। तभी लोकमान्य कह सके थे कि स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। मजदूर भी चाहता है कि मेरी कमाई मेरे पुत्र-पौत्रोको प्राप्त हो। मै अपनी कमाईसे दान-पुण्य कर अपना लोक-परलोक बना सकूँ। केवल फॉकेमस्तीकी बात करना, होटलमे खाना तथा अस्पतालमें मरना उसे पसद नहीं है। किसान तथा मध्यम श्रेणीके लोग भी अपनी भूमि, सम्पत्ति, सस्कृति छोडकर कम्यूनिज्मका परतन्त्रतापूर्ण जीवन व्यतीत करना नहीं चाहते। यह उनकी समझदारी है, बेसमझी नहीं। वे कहते हैं कि यह घरफूँककी समझदारी कम्युनिस्टोको ही मुबारक हो। व्यक्तिगत भूमि-सम्पत्ति आदिका राष्ट्रीयकरण हो जानेसे सभीको सदाके लिये परतन्त्रताके बन्धनमे जकड जाना पड़ेगा। अपनी संस्कृति, सभ्यता एव धर्मके विकास तथा रक्षणके लिये कोई कुछ
मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३६१ भी न कर सकेगा । मुट्ठीभर तानाशाह कम्युनिस्टोंका निर्णय ही उनकी धर्म, सभ्यताका निर्णय समझा जायगा । मध्यम श्रेणीको यह समझानेकी आवश्यकता नहीं है कि मजदूर लोग गरीब नहीं रहेगे । यह तो कोई भी समझ सकता है कि जिसका शासन रहता है वह गरीब नहीं रहता । 'मजदूरों, गरीबोंका राज्य', होगा यह नारा तो बहुसंख्यक गरीबोंके आकर्षणके लिये ही है। और इसीके द्वारा मनुष्यकी स्वाभाविक दुर्बलताओंका लाभ उठाकर ईर्ष्या-द्वेषकी वृत्ति उभारकर विध्वंस तथा अपहरणमे गरीबोंको प्रवृत्त करनेके लिये चेष्टा की जाती है । फिर भी समझदार गरीब मजदूर सब समझते हैं कि छीना-झपटी तथा अपहरणादिके द्वारा किसीका स्थायी उपकार एवं कल्याण नहीं हो सकता । दूसरोंको बिना सताये धर्मको बिना उल्लङ्घन किये थोडा भी धन बरकत और शान्तिका कारण होता है । बेईमान, विधर्म लोगोंके बड़े ऊंचे- ऊंचे मनसूबे सुख-स्वप्नके मनोराज्य होते हैं । उनकी पूर्ति कभी नहीं होती । यदि धर्मनियन्त्रित रामराज्यकी नीतिके अनुसार ईमानदारीसे धार्मिक सामाजिक सगठन हो तो सभी उत्पादनकी असुविधाएँ दूर हो सकती हैं । बेकारी, बेरोजगारी, भूखमरीकी चर्चा स्वप्नमे भी न दीखेगी । रामराज्यमे ऐसा ही था । नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना । नहिं कोउ अबुध न लच्छनहीना ॥ समुचित प्रयत्न बिना कम्यूनिज्मरूपी जादूकी छडीसे समस्त समस्याओका समाधान नहीं हो सकता । जीवनमे रोटी ही सब कुछ नहीं है, धर्म तथा ईमानका भी मानव-जीवनमे महत्त्वपूर्ण स्थान है । ईमानदार व्यक्तिको मुनासिब कामके लिये मुनासिब मजदूरीकी बात तो समझमे आ सकती है, लेकिन मजदूरी भी खत्म हो, मजदूरी देनेवाला भी खत्म हो, मजदूरी ही नहीं, मजदूरी देनेवालेकी सारी सम्पत्तिके ही हम मालिक बन जायें, यह भावना दगावाज डाकूकी दानवी मनो- वृत्ति है, सद्विचार नहीं। एक खूँखार भेडिया या कुत्ता भी यह नहीं सोचता कि मुझे टुकडा देनेवाला खतम हो जाय, उसकी सारी रोटी मुझे मिल जाय । सब जगह इमारत तोडकर नयी इमारत ही नहीं बनायी जाती, किंतु बिना तोड़े हुए सुधारका प्रयत्न भी कर्तव्य है । कम्युनिष्टको अपने शरीर, दिल-दिमागमें फितूर है तो इसीलिये सबको खतम नहीं किया जा सकता । किंतु विविध चिकित्सा-प्रणालियोंके सहारे उनके सुधारका प्रयत्न ही उचित है । इसी तरह जो व्यवस्था अच्छी है, किंतु उसमे कुछ आगन्तुक दोषोका ससर्ग लग गया हो, वहाँ उस दोषको ही मिटानेका प्रयत्न किया जाता है । उस व्यवस्थाको ही मिटानेका प्रयत्न तो उस ढगका है, जैसे सिरमे दर्द होनेपर दर्द दूर करनेका प्रयत्न न कर सिर काट डालनेका प्रयत्न करना । ऐसे तो सभी श्रेणियाँ राज्याधिकार पानेको छटपटा सकती हैं, छटपटाती रहेगी, पर इसमे सिवा सघर्ष तथा अश्रान्तिके कुछ लाभ नहीं हो सकता । वस्तुतस्तु
३६२ मार्क्सवाद और रामराज्य अधिकार तथा मोहमे न फँसकर कर्त्तव्य-मार्गपर प्रवृत्त होनेसे अधिकार बिना बुलाये ही पीछे-पीछे दौड़ता है । यहाँ यह स्पष्ट समझना चाहिये कि धर्महीन वस्तुतः शोषक अन्यायी चाहे पूँजीवाद हो, चाहे सर्वहाराके नामसे कुछ कम्युनिष्टोंका अधिनायकत्व हो, रामराज्यवादी दोनोंके ही विरोधी हैं । परंतु इसीलिये किसी व्यक्ति या समूहको मिटा देना कथमपि उचित नहीं है । और कोयलेमे कालिमाके तुल्य बुराई या शोषण व्यक्ति या समूहका अनिवार्य स्वाभाविक धर्म नही है, तो कोई कारण नहीं कि बुराई या शोषण व्यक्ति या समूहके बिना मिटाये न मिट सकती हो । कोयलेसे तो मनो साबुन खर्च करनेपर भी कालिमा नही मिटती, परंतु जिस स्वच्छ वस्त्रमे कोयलेकी कालिमा लगी होती है, वह तो साबुन आदिसे धो लिया जा सकता है । प्राचीन वस्तु सब बुरी, नवीन अच्छी; पुराना समाज निकम्मा, नया अच्छा होगा, यह कोई नियम नहीं । कई बार नयी वस्तु पुरानीसे भी बुरी होती है । रामराज्यके विपरीत नयी व्यवस्था वैसे ही भीषण होगी जैसे स्वस्थताके विपरीत प्लेग और कालरा । यदि रामराज्यकी कल्पना अन्धविश्वास है, तो सम्पूर्ण संसारमे सर्वहाराके नामपर कम्युनिष्टोंका अधिनायकत्व भी उनका दिमागी फितूर ही है । विश्वभरमे वर्गराज्य या शासनहीन समाजकी कल्पना तथा इच्छानुसार काम करना, इच्छानुसार वस्तु लेना इत्यादि कल्पना तो अन्धविश्वाससे भी अधिक अन्धतम विश्वास है । जैसे रूसोकी सामान्येच्छा, फिक्टेकी आदर्श विश्व सरकार, हीगेलका आदर्श राज्य केवल दिमागी चीज ठहरती है, वैसे ही मार्क्सकी वर्गहीन स्वच्छन्द राज्यकी कल्पना भी दिमागी फितूर ही है । रामराज्यकी दृष्टिमे तो कर्मानुसार फलके सिद्धान्तमे राजमार्ग निर्विवाद है । जब व्यष्टि, समष्टि जगत्, दीनदार, ईमानदार विद्वान् सत्प्रयत्नशील होगा, तब कभी भी सुख- समृद्धिका रामराज्य हो ही सकेगा । पूँजीवाद और कृषि कृषिके सम्बन्धमे मार्क्सवादियोका कहना है कि उद्योग-धंधोमे पूँजीवादी ढंगपर संगठित हो जानेसे पहले भी खेती और खेतीसे सम्बन्ध रखनेवाले कारोबार पशुपालन, फलोको उत्पन्न करना, आदि जारी थे और आजतक वे सब काम कही उसी रूपमें और कहीं परिवर्तित रूपमे चले जा रहे हैं । "पूँजीवादका पहला प्रभाव खेतीपर यह पड़ा कि उद्योग-धंधोके कारखाने- के रूपमे जारी होनेके कारण उनका खेतीसे कोई सम्बन्ध न रह गया । पूँजीवादी व्यवस्थाका आरम्भ होनेसे पहले प्रायः उद्योग धंधो और खेतीका काम एक साथ ही होता था । किसान या तो खेतीके काममें बचे हुए समयसे कपड़ा, जूता
मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३६३
और उपयोगके दूसरे सामान तैयार कर लेता था या किसानके परिवारका कोई एक आदमी परिवारभरके लिये इन पदार्थोंको तैयार कर लेता था। परंतु कारखानोंमें यह पदार्थ अधिक सस्ते और अच्छे तैयार हो सकनेके कारण किसानोका इन पदार्थोंका स्वयं तैयार करना लाभदायक न रहा। उद्योग-धंधे सिमटकर शहरोंमें चले गये और गाँवोंमें केवल खेतीका ही काम रह गया। "समाजमे पूँजीवादी व्यवस्था आरम्भ हो जानेका प्रभाव खेतीपर भी काफी पडा। पूँजीवादने कला-कौशलकी उन्नति कर और मजदूरोकी माँग पैदा कर खेतीको पुरानी जागीरदारी व्यवस्थामें काफी परिवर्तन किया। पहले तो इसका प्रभाव यह हुआ कि जागीरोसे किसान लोग दौडकर औद्योगिक नगरोकी ओर आने लगे और जागीरें टूटने लगीं। परंतु जब पूँजीपतियोके पास पूँजीकी बडी मात्रा इकट्ठी हो गयी, तो इसका प्रभाव यह हुआ कि पूँजीपतियोंने जागीरें बनाना शुरू किया। खासकर बड़े-बड़े फार्मोंके रूपमे जागीरें, जिनमे खेती किसानोकी बडी संख्याद्वारा न होकर मशीनोंद्वारा होने लगी। "उद्योग-धंधोकी पैदावारमे पूँजीवादी व्यवस्थाके आरम्भ हो जानेसे उद्योग- धंधोके केन्द्र और खेतीकी जगह गाँवोकी अवस्थामे बहुत बड़ा अन्तर आ गया। विज्ञानके विकाससे औद्योगिक क्षेत्रमें आये दिन परिवर्तन होता रहता है। मनुष्योंका स्थान मशीने ले लेती हैं, रफ्तार और चालोमे उन्नति हो जाती है, परंतु खेतीकी अवस्थापर इन सब बातोका प्रभाव बहुत कम पडता है। समाजकी आवश्यकताको उद्योग-धंधे और खेती मिलाकर पूरा करते हैं। उनमेसे एकके बहुत आगे बढ जाने और दूसरेके बहुत पीछे रह जानेसे विषमता आ जाना स्वाभाविक हो जाता है। पूँजीवादद्वारा धनके केवल एक छोटी ही श्रेणीके हाथोमे एकत्र हो जानेका प्रभाव खेती करनेवालोपर भी बहुत गहरा पडता है। कृषिके क्षेत्रमें होनेवाला शोषण न केवल अधिक पुराना है, बल्कि मजदूरकी अपेक्षा किसानके अधिक असहाय होनेके कारण वह अधिक गहरा भी है। "खेतीद्वारा आवश्यक पदार्थोंकी पैदावार करनेके लिये सबसे पहले जरूरत पडती है भूमिकी। पूँजीवादी देशोमे भूमि कुछ बड़े-बडे जमीदारोकी सम्पत्ति होती है। ये जमीदार स्वयं भूमिसे कुछ पैदावार नही करते। किसानोको खेती करनेके लिये भूमि देकर ये उनसे लगान वसूल लेते हैं। खेतीके लिये कुछ परिश्रम न करके ये खेतीके उपजका भाग इसलिये ले सकते है, क्योकि ये लोग भूमिके मालिक समझे जाते हैं। भूमि जागीरदारोके अधिकारमे प्रायः तीन तरह जाती है। मध्यकालमे जब सामन्तशाही और सरदारशाहीका जोर था, भूमिको राजा लोग दूसरे राजाओसे जीत करके अपने सरदारोमे उसे बाँट देते थे। जिस सरदार- की जितनी शक्ति होती थी या जितनी सहायताकी आशा राजा किसी सरदारसे
३६४ मार्क्सवाद और रामराज्य कर सकता था उतनी ही भूमि उस सरदारको दी जाती थी। भारतवर्षमें जागीर, जमींदारी और ताल्लुकदारी कुछ तो मुगलो, मराठो और सिखोके समयसे चली आ रही है। ये वही जमीदार और जागीरदार हैं, जिन्होने अग्रेजी राज्य आनेपर मौजूदा सरकारकी राजभक्ति स्वीकार कर ली। कुछ जागीरदारियाँ अंग्रेजी सरकारने भूमिकर किसानोंसे सुविधापूर्वक वसूल करनेके लिये कायम कर दीं। सरकारने कुछ लोगोको भूमिके बड़े-बड़े भाग मालगुजारीकी एक निश्चित रकम- पर सौंप दिये और उन्हे किसानोंसे लगान वसूल करनेका अधिकार दे दिया। सरकारकी शक्तिके बलपर ये लोग किसानोसे लगान वसूल करते हैं और मालगुजारीके बीचका अन्तर इन लोगोकी आमदनी बन जाती है।” वस्तुतः भूमि या कृषिवाणिज्य आदि ही कौटल्यकी दृष्टिसे मुख्य अर्थ है। मनुष्याणां वृत्तिरर्थः। मनुष्यवती भूमिरित्यर्थः। (कौटिली० अर्थ० १५।१।१-२) मनुष्योकी जीविका कृषिवाणिज्य आदि अर्थ है। मनुष्योसे युक्त भूमिका भी नाम अर्थ है। इसीमें विविध उद्योग-धंधा भी आ जाता है। यह सही है कि उद्योग-धंधो, कल-कारखानोका अधिक विकास होनेसे खेतीका काम पिछड़ गया, परतु यह सभी समझते हैं कि पेट भरनेके लिये अन्न परमावश्यक है, जो खेतीके बिना नहीं मिल सकता। जूट और कपासके लिये भी खेती आवश्यक है, कितने कल- कारखाने खेती बिना नही चल सकते। चावल निकालने, तेल बनाने, कपड़ा, बोरे तथा चीनी बनानेवाले बड़े-बड़े कारखाने भी खेती बिना चौपट हो सकते है। अब गन्ना, तेलहन, जूट, कपास आदिके लिये भी खेत आवश्यक है। सिचाई- के लिये बहुत प्राचीन कालसे तालाब, कुँआ बनवाने, नहर बनवानेकी प्रथा चालू है। अन्यान्य यन्त्रोके विकासके साथ खेत जोतनेके लिये तथा कुँओसे पानी निकालने और नये ढंगके नलकूपोकी व्यवस्था सर्वत्र चल रही है। अमेरिका, जापान, इंग्लैड, फ्रांस, जर्मनी आदि देशोमें खेतीको उपजाऊ बनाने- के लिये नयी-नयी खाद और नये-नये दूसरे आविष्कार भी हो रहे है। वैज्ञानिक ढंगसे खेतोको गरमी या ठंढ पहुँचाने, अच्छे ढंगका पौधा तथा विभिन्न फलों- को बढानेमे मीठा या स्वादिष्ट बनानेका भारतीय प्राचीन शास्त्रोमे भी बहुत चर्चा है। यह अवश्य है कि अभीतक यह व्यवस्था ग्राम-ग्राममे व्यापक नहीं हो सकी है, परतु कल-कारखाने भी तो गाँव-गाँव नही पहुँच पाये है। मकान बनाने, खेती करने, बोझ ढोने आदिका लाखो काम मजदूर भी अभीतक पुराने ढंगसे ही करते हैं। किसी भी देशमे अभीतक सर्वत्र समानता नहीं है। यह दूसरी बात है कि नमूनेके तौरपर कुछ फर्म, कुछ ग्राम सब देशोने बना रखे हैं। बाहरसे आनेवालोको वही दिखाया जाता है, जैसे श्रीबुल्गानिन आदि सभी नेताओँको भारतमें नमूनेके ग्राम, नमूनेके फर्म तथा उद्योग-धंधे दिखलाये
गये, नमूनेकी खुशहाली दिखायी गयी । ठीक वैसे ही रूस आदिमें भी नमूनेके ग्राम, नमूनेकी सुव्यवस्थाएँ ही अधिक दिखायी जाती हैं। पूँजीवादी ढंग- से कल, कारखानोंकी कम्युनिष्ट भरपेट निन्दा करते हैं, परन्तु उनका बहिष्कार नहीं करना चाहते । वे ही चीजें गैर कम्युनिष्टोंके हाथोंमें रहती हैं तो दूषण समझी जाती हैं, कम्युनिष्टोंके हाथ पहुँचते ही वे निर्दोष हो जाती हैं। रामराज्यवादी तो महायन्त्रोंके निर्माणपर प्रतिबन्ध ही उचित समझता है अन्यथा उसकी सीमा तो होनी ही चाहिये । आखिर पूँजीवादी कल-कारखानोंमें कम्युनिष्ट जो-जो दोष दिखाते हैं, वह सब कम्युनिष्टोंके हाथ आनेसे कैसे दूर हो जायँगे ? कल-कारखानोका बढ़ना, मशीनोंके रफ्तारका बढ़ना, मजदूरोकी माँग-वृद्धि, ग्रामीणोंका शहरोंकी ओर दौड़ना आदि तो कम्युनिष्टोके कल- कारखानोंसे भी होगा ही । इसी तरह बड़े-बड़े फार्मोंका विस्तार कम्युनिष्ट राज्योंमें भी हो ही रहा है । वस्तुतः यह तो मार्क्सवादी भी मानता है कि कल- [L1
३६६ मार्क्सवाद और रामराज्य नहीं समझते । भारतके ऋषि, महर्षि कन्द-मूल-फलादिका भी कुछ अंश राजा- को देना उचित समझते थे । व्यक्तिगत वैध भूमि किसीकी भूमिपर यज्ञ या पितृश्राद्ध करनेपर भी भूमिपतिको कुछ देना आवश्यक समझा जाता है, अन्यथा भूमिपति उनके फलमें हिस्सेदार होगा । जिन्हें जड भौतिक प्रपञ्चोसे पृथक् धर्म, परलोक अदृष्टपर भी विश्वास है, वे तो धर्मबुद्धिसे ही कर देना उचित समझते हैं । उसे वे शोषण नहीं समझते । जमींदारी, जागीरदारीके सम्बन्धमें कम्युनिष्ट आदिकी धारणाएँ सर्वथा मिथ्या हैं । राजतन्त्रके अनुसार राजाका ज्येष्ठ पुत्र राजा होता था, शेष पुत्रोको गुजारे- के रूपमें जागीरे मिलती थी । इस क्रममें बहुत-सी जमींदारियाँ बनी, संग्राम जीतनेसे पुरस्कारके रूपमें कुछ मन्दिरो, आचार्यों, विद्वानोको दानके रूपमें जागीरे मिली । बहुतोने गाढे पसीनेकी कमाईसे खरीदकर जमींदारियाँ बनायी हैं । यह सब भूमि भारतीय शास्त्रोंके अनुसार वैध हैं । बहुत-से कर देनेवाले राजा भी जमींदार, ताल्लुकेदार हो गये हैं । शुक्रनीतिका मत है कि 'वैध' स्वामित्व, दातृत्व और धनिकत्व तपस्याका ही फल है । पर-पीडन एव शोषणसे होनेवाली धनिकता आदि तो नवीन पाप है, वह तपका फल नहीं । अर्थिता, दासता, दरिद्रता आदि पापका फल है । गुरुजनोके प्रति दासता और त्यागमूलक दरिद्रता पापका फल नहीं, क्योकि यह एक नयी तपस्या है— स्वामित्वं चैव दातृत्वं धनिकत्वं तपःफलम् । एनसः फलमर्थित्वं दास्यत्वं च दरिद्रता ॥ ( शुक्रनीतिसार १ । १२१ ) शुक्रने लिखा है कि प्रतिवर्ष जिसे एक लक्ष मुद्रासे लेकर तीन लक्षतक बिना प्रजापीडनके वैध ढंगसे आमदनी होती है, वह सामन्त कहलाता है— लक्षकर्षमितो भागो राज्यतो यस्य जायते । वत्सरे वत्सरे नित्यं प्रजानां त्वविपीडनैः ॥ सामन्तः स नृपः प्रोक्तो यावल्लक्षत्रयावधि ॥ ( शुक्रनीतिसार १ । १८२-१८३ ) उससे ऊपर दस लक्ष मुद्रातक जिसकी आय हो वह माण्डलिक राजा है, बीस लाखतक आयवाला राजा और पचास लाख आयवाला महाराजा होता है । करोड़ लाभवाला स्वराट् और दस करोड़वाला सम्राट् कहलाता है । यह सम्राट् राजसूययाजी राजराजसे भिन्न है । पचास करोड़वाला विराट् एवं सप्तद्वीपा मेदिनी जिसके नियन्त्रणमें हो वह सार्वभौम कहलाता है—
मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३६७ तदूर्ध्वं दशलक्षान्तो नृपो माण्डलिकः स्मृतः । तदूर्ध्वं तु भवेद् राजा यावद्विंशतिलक्षकम् ॥ पञ्चाशल्लक्षपर्यन्तो महाराजः प्रकीर्तितः । ततस्तु कोटिपर्यन्त. स्वराट् सम्राट् ततः परम् ॥ दशकोटिमितो यावद् विराट् तु तदनन्तरम् । पञ्चाशत्कोटिपर्यन्त• सार्वभौमस्ततः परम् ॥ सप्तद्वीपा च पृथिवी यस्य वश्या भवेत् सदा । ( शुक्रनीतिसार १ । १८३-१८६ ) इनका उपर्युक्त सभी लाभ प्रजाके रक्षण-पोषणके ही काम आता है। जैसे ग्रीष्ममें अंशुमाली सूर्य भूमिसे जलका शोषण करता है, अपने यहाँ जमा रखनेके लिये नहीं बल्कि वर्षांमे मेघद्वारा वर्षणके लिये ही, ठीक वैसे ही प्रजापोषणार्थ ही राजाद्वारा कर-संग्रह है। शुक्रने तो सार्वभौम राजाको भी प्रजाका दास कहा है— स्वभागभृत्या दास्यत्वे प्रजानां च नृप. कृतः । ब्रह्मणाः स्वामिरूपस्तु पालनार्थं हि सर्वदा ॥ ( शुक्र नी० १ । १८७ ) अर्थात् प्रजाके लाभसे षष्ठांश या अष्टमांश यथायोग्य राजाको दिलाकर ब्रह्माने उसे प्रजाके दास्यत्वमे नियुक्त किया है। सर्वदा प्रजाका सेचन-पालन करना ही राजाका परम कर्तव्य है । अरक्षिता राजा अतपस्वी ब्राह्मण अप्रदाता धनवान्- को देवता नष्ट करके नीचे गिरा देते हैं । अपनी आयुको नियन्त्रित करके राजा अपना व्यवहार शास्त्रानुसार ऐसा बनाये जिससे इहलोक-परलोकमें सुख मिले । यौवन, जीवन, लक्ष्मी, छाया तथा राज्य—ये छः वस्तुएँ अत्यन्त चञ्चल होती हैं । अतः इनसे प्रमत्त न होकर सदा धर्मनिष्ठ होना आवश्यक है । आन्वीक्षिकी वेदान्त-विचारसे आत्मसाक्षात्कार करके हर्ष-शोकसे मुक्त होकर त्रयीवेदादि शास्त्रोंके अनुसार आचरण करता हुआ राजा इहलोक-परलोकके सुखका भागी होता है । अनृशंसता प्राणीका परम धर्म है । अतः राजाको चाहिये कि अनृशंसता, मृदुता तथा सरलतासे दीन जनोका पालन करे । राजाको चाहिये कि वह सदा ही आन्वीक्षिकी वेदादि शास्त्र तथा वार्ता एव दण्डनीतिका अभ्यास करता रहे । कुसीद, कृषि, गोरक्षा, वाणिज्य ये वार्त्ता शब्दसे व्यवहृत होते हैं । सबके प्रति दया, मैत्री और दान एव मधुर वाणी तीनो लोकमे सर्वोत्कृष्ट आकर्षक गुण हैं । बलवान्, बुद्धिमान्, शूर, सावधान एव पराक्रमी राजा वित्तपूर्ण महीमण्डलका भोक्ता होता है, और वही भूप वास्तवमें भूपति होता है । कौटल्यने धर्मको ही सुखका मूल माना है और धर्मका मूल अर्थको माना १ सुखस्य मूलं धर्म । धर्मस्य मूलमर्थः । अर्थस्य मूलं राज्यम्। राज्यमूलम् इन्द्रियजयः ।