भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३६७ तदूर्ध्वं दशलक्षान्तो नृपो माण्डलिकः स्मृतः । तदूर्ध्वं तु भवेद् राजा यावद्विंशतिलक्षकम् ॥ पञ्चाशल्लक्षपर्यन्तो महाराजः प्रकीर्तितः । ततस्तु कोटिपर्यन्त. स्वराट् सम्राट् ततः परम् ॥ दशकोटिमितो यावद् विराट् तु तदनन्तरम् । पञ्चाशत्कोटिपर्यन्त• सार्वभौमस्ततः परम् ॥ सप्तद्वीपा च पृथिवी यस्य वश्या भवेत् सदा । ( शुक्रनीतिसार १ । १८३-१८६ ) इनका उपर्युक्त सभी लाभ प्रजाके रक्षण-पोषणके ही काम आता है। जैसे ग्रीष्ममें अंशुमाली सूर्य भूमिसे जलका शोषण करता है, अपने यहाँ जमा रखनेके लिये नहीं बल्कि वर्षांमे मेघद्वारा वर्षणके लिये ही, ठीक वैसे ही प्रजापोषणार्थ ही राजाद्वारा कर-संग्रह है। शुक्रने तो सार्वभौम राजाको भी प्रजाका दास कहा है— स्वभागभृत्या दास्यत्वे प्रजानां च नृप. कृतः । ब्रह्मणाः स्वामिरूपस्तु पालनार्थं हि सर्वदा ॥ ( शुक्र नी० १ । १८७ ) अर्थात् प्रजाके लाभसे षष्ठांश या अष्टमांश यथायोग्य राजाको दिलाकर ब्रह्माने उसे प्रजाके दास्यत्वमे नियुक्त किया है। सर्वदा प्रजाका सेचन-पालन करना ही राजाका परम कर्तव्य है । अरक्षिता राजा अतपस्वी ब्राह्मण अप्रदाता धनवान्- को देवता नष्ट करके नीचे गिरा देते हैं । अपनी आयुको नियन्त्रित करके राजा अपना व्यवहार शास्त्रानुसार ऐसा बनाये जिससे इहलोक-परलोकमें सुख मिले । यौवन, जीवन, लक्ष्मी, छाया तथा राज्य—ये छः वस्तुएँ अत्यन्त चञ्चल होती हैं । अतः इनसे प्रमत्त न होकर सदा धर्मनिष्ठ होना आवश्यक है । आन्वीक्षिकी वेदान्त-विचारसे आत्मसाक्षात्कार करके हर्ष-शोकसे मुक्त होकर त्रयीवेदादि शास्त्रोंके अनुसार आचरण करता हुआ राजा इहलोक-परलोकके सुखका भागी होता है । अनृशंसता प्राणीका परम धर्म है । अतः राजाको चाहिये कि अनृशंसता, मृदुता तथा सरलतासे दीन जनोका पालन करे । राजाको चाहिये कि वह सदा ही आन्वीक्षिकी वेदादि शास्त्र तथा वार्ता एव दण्डनीतिका अभ्यास करता रहे । कुसीद, कृषि, गोरक्षा, वाणिज्य ये वार्त्ता शब्दसे व्यवहृत होते हैं । सबके प्रति दया, मैत्री और दान एव मधुर वाणी तीनो लोकमे सर्वोत्कृष्ट आकर्षक गुण हैं । बलवान्, बुद्धिमान्, शूर, सावधान एव पराक्रमी राजा वित्तपूर्ण महीमण्डलका भोक्ता होता है, और वही भूप वास्तवमें भूपति होता है । कौटल्यने धर्मको ही सुखका मूल माना है और धर्मका मूल अर्थको माना १ सुखस्य मूलं धर्म । धर्मस्य मूलमर्थः । अर्थस्य मूलं राज्यम्। राज्यमूलम् इन्द्रियजयः ।