भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 679

३६६ मार्क्सवाद और रामराज्य नहीं समझते । भारतके ऋषि, महर्षि कन्द-मूल-फलादिका भी कुछ अंश राजा- को देना उचित समझते थे । व्यक्तिगत वैध भूमि किसीकी भूमिपर यज्ञ या पितृश्राद्ध करनेपर भी भूमिपतिको कुछ देना आवश्यक समझा जाता है, अन्यथा भूमिपति उनके फलमें हिस्सेदार होगा । जिन्हें जड भौतिक प्रपञ्चोसे पृथक् धर्म, परलोक अदृष्टपर भी विश्वास है, वे तो धर्मबुद्धिसे ही कर देना उचित समझते हैं । उसे वे शोषण नहीं समझते । जमींदारी, जागीरदारीके सम्बन्धमें कम्युनिष्ट आदिकी धारणाएँ सर्वथा मिथ्या हैं । राजतन्त्रके अनुसार राजाका ज्येष्ठ पुत्र राजा होता था, शेष पुत्रोको गुजारे- के रूपमें जागीरे मिलती थी । इस क्रममें बहुत-सी जमींदारियाँ बनी, संग्राम जीतनेसे पुरस्कारके रूपमें कुछ मन्दिरो, आचार्यों, विद्वानोको दानके रूपमें जागीरे मिली । बहुतोने गाढे पसीनेकी कमाईसे खरीदकर जमींदारियाँ बनायी हैं । यह सब भूमि भारतीय शास्त्रोंके अनुसार वैध हैं । बहुत-से कर देनेवाले राजा भी जमींदार, ताल्लुकेदार हो गये हैं । शुक्रनीतिका मत है कि 'वैध' स्वामित्व, दातृत्व और धनिकत्व तपस्याका ही फल है । पर-पीडन एव शोषणसे होनेवाली धनिकता आदि तो नवीन पाप है, वह तपका फल नहीं । अर्थिता, दासता, दरिद्रता आदि पापका फल है । गुरुजनोके प्रति दासता और त्यागमूलक दरिद्रता पापका फल नहीं, क्योकि यह एक नयी तपस्या है— स्वामित्वं चैव दातृत्वं धनिकत्वं तपःफलम् । एनसः फलमर्थित्वं दास्यत्वं च दरिद्रता ॥ ( शुक्रनीतिसार १ । १२१ ) शुक्रने लिखा है कि प्रतिवर्ष जिसे एक लक्ष मुद्रासे लेकर तीन लक्षतक बिना प्रजापीडनके वैध ढंगसे आमदनी होती है, वह सामन्त कहलाता है— लक्षकर्षमितो भागो राज्यतो यस्य जायते । वत्सरे वत्सरे नित्यं प्रजानां त्वविपीडनैः ॥ सामन्तः स नृपः प्रोक्तो यावल्लक्षत्रयावधि ॥ ( शुक्रनीतिसार १ । १८२-१८३ ) उससे ऊपर दस लक्ष मुद्रातक जिसकी आय हो वह माण्डलिक राजा है, बीस लाखतक आयवाला राजा और पचास लाख आयवाला महाराजा होता है । करोड़ लाभवाला स्वराट् और दस करोड़वाला सम्राट् कहलाता है । यह सम्राट् राजसूययाजी राजराजसे भिन्न है । पचास करोड़वाला विराट् एवं सप्तद्वीपा मेदिनी जिसके नियन्त्रणमें हो वह सार्वभौम कहलाता है—

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