भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

३६६ मार्क्सवाद और रामराज्य नहीं समझते । भारतके ऋषि, महर्षि कन्द-मूल-फलादिका भी कुछ अंश राजा- को देना उचित समझते थे । व्यक्तिगत वैध भूमि किसीकी भूमिपर यज्ञ या पितृश्राद्ध करनेपर भी भूमिपतिको कुछ देना आवश्यक समझा जाता है, अन्यथा भूमिपति उनके फलमें हिस्सेदार होगा । जिन्हें जड भौतिक प्रपञ्चोसे पृथक् धर्म, परलोक अदृष्टपर भी विश्वास है, वे तो धर्मबुद्धिसे ही कर देना उचित समझते हैं । उसे वे शोषण नहीं समझते । जमींदारी, जागीरदारीके सम्बन्धमें कम्युनिष्ट आदिकी धारणाएँ सर्वथा मिथ्या हैं । राजतन्त्रके अनुसार राजाका ज्येष्ठ पुत्र राजा होता था, शेष पुत्रोको गुजारे- के रूपमें जागीरे मिलती थी । इस क्रममें बहुत-सी जमींदारियाँ बनी, संग्राम जीतनेसे पुरस्कारके रूपमें कुछ मन्दिरो, आचार्यों, विद्वानोको दानके रूपमें जागीरे मिली । बहुतोने गाढे पसीनेकी कमाईसे खरीदकर जमींदारियाँ बनायी हैं । यह सब भूमि भारतीय शास्त्रोंके अनुसार वैध हैं । बहुत-से कर देनेवाले राजा भी जमींदार, ताल्लुकेदार हो गये हैं । शुक्रनीतिका मत है कि 'वैध' स्वामित्व, दातृत्व और धनिकत्व तपस्याका ही फल है । पर-पीडन एव शोषणसे होनेवाली धनिकता आदि तो नवीन पाप है, वह तपका फल नहीं । अर्थिता, दासता, दरिद्रता आदि पापका फल है । गुरुजनोके प्रति दासता और त्यागमूलक दरिद्रता पापका फल नहीं, क्योकि यह एक नयी तपस्या है— स्वामित्वं चैव दातृत्वं धनिकत्वं तपःफलम् । एनसः फलमर्थित्वं दास्यत्वं च दरिद्रता ॥ ( शुक्रनीतिसार १ । १२१ ) शुक्रने लिखा है कि प्रतिवर्ष जिसे एक लक्ष मुद्रासे लेकर तीन लक्षतक बिना प्रजापीडनके वैध ढंगसे आमदनी होती है, वह सामन्त कहलाता है— लक्षकर्षमितो भागो राज्यतो यस्य जायते । वत्सरे वत्सरे नित्यं प्रजानां त्वविपीडनैः ॥ सामन्तः स नृपः प्रोक्तो यावल्लक्षत्रयावधि ॥ ( शुक्रनीतिसार १ । १८२-१८३ ) उससे ऊपर दस लक्ष मुद्रातक जिसकी आय हो वह माण्डलिक राजा है, बीस लाखतक आयवाला राजा और पचास लाख आयवाला महाराजा होता है । करोड़ लाभवाला स्वराट् और दस करोड़वाला सम्राट् कहलाता है । यह सम्राट् राजसूययाजी राजराजसे भिन्न है । पचास करोड़वाला विराट् एवं सप्तद्वीपा मेदिनी जिसके नियन्त्रणमें हो वह सार्वभौम कहलाता है—

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३६७ तदूर्ध्वं दशलक्षान्तो नृपो माण्डलिकः स्मृतः । तदूर्ध्वं तु भवेद् राजा यावद्विंशतिलक्षकम् ॥ पञ्चाशल्लक्षपर्यन्तो महाराजः प्रकीर्तितः । ततस्तु कोटिपर्यन्त. स्वराट् सम्राट् ततः परम् ॥ दशकोटिमितो यावद् विराट् तु तदनन्तरम् । पञ्चाशत्कोटिपर्यन्त• सार्वभौमस्ततः परम् ॥ सप्तद्वीपा च पृथिवी यस्य वश्या भवेत् सदा । ( शुक्रनीतिसार १ । १८३-१८६ ) इनका उपर्युक्त सभी लाभ प्रजाके रक्षण-पोषणके ही काम आता है। जैसे ग्रीष्ममें अंशुमाली सूर्य भूमिसे जलका शोषण करता है, अपने यहाँ जमा रखनेके लिये नहीं बल्कि वर्षांमे मेघद्वारा वर्षणके लिये ही, ठीक वैसे ही प्रजापोषणार्थ ही राजाद्वारा कर-संग्रह है। शुक्रने तो सार्वभौम राजाको भी प्रजाका दास कहा है— स्वभागभृत्या दास्यत्वे प्रजानां च नृप. कृतः । ब्रह्मणाः स्वामिरूपस्तु पालनार्थं हि सर्वदा ॥ ( शुक्र नी० १ । १८७ ) अर्थात् प्रजाके लाभसे षष्ठांश या अष्टमांश यथायोग्य राजाको दिलाकर ब्रह्माने उसे प्रजाके दास्यत्वमे नियुक्त किया है। सर्वदा प्रजाका सेचन-पालन करना ही राजाका परम कर्तव्य है । अरक्षिता राजा अतपस्वी ब्राह्मण अप्रदाता धनवान्- को देवता नष्ट करके नीचे गिरा देते हैं । अपनी आयुको नियन्त्रित करके राजा अपना व्यवहार शास्त्रानुसार ऐसा बनाये जिससे इहलोक-परलोकमें सुख मिले । यौवन, जीवन, लक्ष्मी, छाया तथा राज्य—ये छः वस्तुएँ अत्यन्त चञ्चल होती हैं । अतः इनसे प्रमत्त न होकर सदा धर्मनिष्ठ होना आवश्यक है । आन्वीक्षिकी वेदान्त-विचारसे आत्मसाक्षात्कार करके हर्ष-शोकसे मुक्त होकर त्रयीवेदादि शास्त्रोंके अनुसार आचरण करता हुआ राजा इहलोक-परलोकके सुखका भागी होता है । अनृशंसता प्राणीका परम धर्म है । अतः राजाको चाहिये कि अनृशंसता, मृदुता तथा सरलतासे दीन जनोका पालन करे । राजाको चाहिये कि वह सदा ही आन्वीक्षिकी वेदादि शास्त्र तथा वार्ता एव दण्डनीतिका अभ्यास करता रहे । कुसीद, कृषि, गोरक्षा, वाणिज्य ये वार्त्ता शब्दसे व्यवहृत होते हैं । सबके प्रति दया, मैत्री और दान एव मधुर वाणी तीनो लोकमे सर्वोत्कृष्ट आकर्षक गुण हैं । बलवान्, बुद्धिमान्, शूर, सावधान एव पराक्रमी राजा वित्तपूर्ण महीमण्डलका भोक्ता होता है, और वही भूप वास्तवमें भूपति होता है । कौटल्यने धर्मको ही सुखका मूल माना है और धर्मका मूल अर्थको माना १ सुखस्य मूलं धर्म । धर्मस्य मूलमर्थः । अर्थस्य मूलं राज्यम्। राज्यमूलम् इन्द्रियजयः ।

३६८ मार्क्सवाद और रामराज्य है। एतावता अर्थका मुख्य फल कामोपभोग नहीं, किंतु धर्म ही अर्थका फल है— नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः । ( श्रीमद्भा० १ । २ । ९ ) अर्थका मूल राज्य है, परंतु उसका भी मूल इन्द्रिय-जय ही है। उसका भी मूल विनय, विनयके लिये वृद्ध-सेवा और उसके लिये भी ज्ञान-सम्पादन आवश्यक समझा जाता है। प्रत्येक कार्यके लिये उन्होने समकक्ष विचारकका ही सम्मान आवश्यक समझा है। निर्मत्सर होकर ही विचार करना आवश्यक बताया है। हर कार्यमे लौकिक प्रयत्नके अतिरिक्त दैवका भी हाथ रहता है, अतः दैवकी अनुकूलता बिना सब प्रयत्न व्यर्थ होते हैं। दैव बिना सुसाध्य कार्य भी दुःसाध्य होते हैं। देवताराधनसे दैवप्रतिकूलता दूर की जाती है। सत्पुरुषोंका मत अतिक्रमणीय नही होता। सुवृत्तता शत्रुको भी जीत लेती है, किसीका अपमान नहीं करना चाहिये। फलद्वारा प्रजानुराग सूचित होता है*। सारा ऐश्वर्य प्रज्ञाका ही फल है, धैर्यहीन प्राणी महान् ऐश्वर्यको प्राप्त करके भी नष्ट हो जाता है। दया धर्मकी जन्मभूमि है, अधर्मबुद्धि आत्मनाशकी सूचना है। भले ही वस्तु सब अनित्य ही हो तथापि अपनेको अमर ही मानकर अर्थार्जन करना चाहिये†। पर-द्रव्यमें राग और उसका अपहरण आत्मनाशका मूल है। व्यवहारमे पक्षपात न करना चाहिये। परायत्त वस्तुमे उत्कण्ठा न करनी चाहिये। विश्वासघातीका कोई प्रायश्चित्त नही। सभी अनित्य है। भूमि-कर निष्कर्ष यह है कि धर्मनियन्त्रित राज्यतन्त्र एक शुद्ध शास्त्रीय सुव्यवस्था है। उसी व्यवस्थामे रामचन्द्र, हरिश्चन्द्र, दिलीप, शिबि, रन्तिदेव आदि लोकप्रिय तन्मूलं विनय । तन्मूल वृद्धोपसेवा । तन्मूलं विज्ञानम् । तस्माद् विज्ञानेनात्मान सम्पादयेत् । धर्मेण धार्यते लोक. । मानी प्रतिमानिनामात्मनि द्वितीयं मन्त्रमुत्पादयेत् । मन्त्रकाले मत्सर न कुर्वीत । ( चाणक्यसूत्र १ । ३१ )

  • दैव विनातिप्रयत्नमपि करोति यत्तद्विफलम् । दैवहीन कार्यं सुसाध्यमपि दुस्साध्यं भवति । दैवकर्मणा तत्समाधानम् । सतां मत नातिक्रमेत । शत्रु जयति सुवृत्तता । कदापि पुरुष नावमन्येत । अनुरागोस्तु फलेन सूच्यते । † प्रज्ञाफलमैश्वर्यम् । महदैश्वर्य प्राप्य अधृतिमान् विनश्यति । दया धर्मस्य जन्मभूमि । आत्मनाश सूचयति अधर्मबुद्धि.। अमरवदर्थजातमर्जयेत्। परविभवेष्वादरोऽपि नाशमूलम् ।परद्र- व्यापहरणमात्मद्रव्यनाशहेतुः। अधनस्य बुद्धिर्न विद्यते । यथाकुलं तथाचारः । व्यवहारे पक्षपातो न कार्य. । परायत्तेषु उत्कण्ठा न कुर्यात् । विश्वासघातिनो न निष्कृतिः । सर्वमनित्यं भवति ।

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३६९ आदर्श राजर्षि हुए हैं । वे भी योग्य मन्त्रियों, निःस्पृह सभ्योंकी सभामें कार्याकार्यका विचार करके प्रजाहितार्थ स्वसर्वस्वकी बाजी लगानेके लिये हर समय प्रस्तुत रहते थे । पर लोलुपलोग उनकी शासन-सभाओके सभ्य भी नहीं हो सकते थे । व्यवहार- वेत्ता, प्राज्ञ, वृत्तशील, गुणान्वित, शत्रु-मित्रमें समान बुद्धि रखनेवाले, निरालस्य, धर्मज्ञ एवं सत्यवादी, काम, क्रोध, लोभको जीतनेवाले, प्रियवद, वृद्ध सभ्य ही उन शासन-सभाओंके सभ्य होते थे और वे विभिन्न जातिके होते थे— व्यवहारविदः प्राज्ञा वृत्तशीलगुणान्विताः । रिपौ मित्रे समा ये च धर्मज्ञाः सत्यवादिनः ॥ निरालसा जितक्रोधकामलोभाः प्रियंवदाः । राज्ञा नियोजितव्यास्ते सभ्याः सर्वासु जातिषु ॥ ( शुक्रनी० ४ । ५३९-४० ) उन्हें वर्गों तथा जातियोंका मिटाना अभीष्ट न था; किंतु योग्य एव एक दूसरेका पूरक—पोषक बनानेका ही प्रयत्न होता था । वेदमन्त्रके आधारपर राष्ट्रमें ब्रह्मवर्चस्वी ब्राह्मण, शूर, धनुर्धर, महारथी एवं लक्ष्यवेधी क्षत्रिय, दोग्ध्री गौ तथा भारवहन-समर्थ बलवान् वृषभ, शीघ्रगामी अश्वोंकी कामना की जाती थी । प्रतिगृहमे कुलपालिनी पतिव्रता स्त्री, विजयी प्रियदर्शी सभ्य युवक, यथेष्ट वृष्टि, फलयुक्त ओषधियो तथा योगक्षेमकी कामना की जाती थी— आब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामाराष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्यो ऽतिव्याधी महारथो जायताम् । दोग्ध्री धेनुर्वोढाऽनड्वानाशुः सप्ति पुरन्ध्रिर्योषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम् । निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो न कल्पताम् । (शु० यजु० २२।२२) राज्य-कर न केवल भूमिपर किंतु किसी प्रकारके आयपर भी लगानेका नियम अति प्राचीन है । क्रय विक्रयके करको शुल्क नामसे कहा जाता है— विक्रेतृक्रेतृत्तो राजभागः शुल्कमुदाहृतम् । शुल्कदेशा हट्टमार्गाः करसीमाः प्रकीर्तिताः ॥ वस्तुजातस्यैकवारं शुल्कं ग्राह्यं प्रयत्नतः । क्वचिन्नैवासकृच्छुल्कं राष्ट्रे ग्राह्यं नृपैश्छलात् ॥ द्वात्रिंशांशं हरेद्राजा विक्रेतुः क्रेतुरेव वा । विंशांशं वा षोडशांशं शुल्कं मूलाविरोधकम् ॥ न हीनसममूल्याद्धि शुल्कं विक्रेतृत्तो हरेत् । लाभं दृष्ट्वा हरेच्छुल्कं क्रेतृतश्च सदा नृपः ॥ ( शुक्रनीति, अध्याय ४ । २१८–२२१ ) बेचने-खरीदनेवालोद्वारा देय राजभाग ही चुंगी या शुल्क है । बाजारों या देशोंकी सीमापर चुंगीघर होना चाहिये । एक वस्तुकी एक ही बार मा० रा० २४—

३७० मार्क्सवाद और रामराज्य चुंगी या कर लेना उचित है। छल-छद्मसे अनेक बार चुंगी लेना अनुचित है। विक्रेता या क्रेतासे वस्तुका ३२ वाँ भाग शुल्करूपमें ग्रहण करे। अथवा लाभांशसे बीसवाँ या सोलहवाँ भाग ले। घाटावालेसे कुछ भी कर नहीं लेना चाहिये। खेतीके करोंके सम्बन्धमें भी शुक्रने लिखा है कि राजभाग एवं व्यय आदिकी अपेक्षा कम-से-कम दुगुना लाभ खेतीसे होना चाहिये। अन्यथा खेती दुःख ही है— राजभागादिव्ययतो द्विगुणं लभ्यते यतः। कृषिकृत्यं तु तच्छ्रेष्ठं तन्न्यूनं दुःखदं नृणाम्॥ (शुक्र० ४।२२४) मालाकार अथवा मधुमक्षिका जैसे पुष्पस्तबक आदिको नुकसान पहुँचाये बिना सार-संग्रह करके पुष्पमाला और मधु निर्मित कर लेती है, वैसे ही प्रजाको नुकसान पहुँचाये बिना राजाको कर ग्रहण करना चाहिये। अङ्गारकार जैसे वृक्षोको काटकर कोयला बनाता है, उस प्रकार प्रजाको नष्ट करके शुल्क-संग्रह नहीं करना चाहिये— मालाकार इव ग्राह्यो भागो नाङ्गारकारवत्। बहुमध्याल्पफलतः तारतम्यं विमृश्य च॥ (शुक्रनी० ४।२२३) तड़ाग, वापी, कूपसे तथा मेघजलसे, नदीजलसे जहाँ खेतकी सिंचाई हो, वहाँ-वहाँ लाभका तृतीय-चतुर्थ तथा आधा भाग क्रमसे लेना चाहिये। ऊषर या पत्थरवाली भूमिसे षष्ठांश ग्रहण करना चाहिये। राजाको जिस किसानसे १०० मुद्रा मिलती हो, उसमेंसे किसानके लिये राजा बीसवाँ भाग छोड़ दे— तडागवापिकाकूपमातृकाद्देवमातृकात्। देशान्नदीमातृकात्तु राजानुक्रमतः सदा॥ तृतीयांशं चतुर्थांशमर्धांशं तु हरेत्फलम्। षष्ठांशमूषरात्तद्वत् पाषाणादिसमाकुलात्॥ राजभागस्तु रजतशतकर्षमितो यतः। कर्षकाल्लभ्यते तस्मै विंशांशमुत्सृजेन्नृपः॥ (शुक्र० ४।२२५—२२७) गौतमने लाभका दसवाँ, आठवाँ या छठा भाग राज्यांश माना है। खेतोंकी भिन्नता- से यह भेद मान्य है। पशु एवं हिरण्यकी वृद्धिमें पचासवाँ भाग राजाको मिलना चाहिये— राज्ञे बलिदानं कर्षकैर्दशममष्टमं षष्ठं वा। पशुहिरण्ययोरप्येके पञ्चाशद्भागम्॥ (गौ० सू० १०।१४-१५) 'ये पशुभिर्जीवन्ति ये वा हिरण्यप्रयोक्तारो वार्धुषिकाः तैः पञ्चाशत्तमो भागो राज्ञे देयः इत्येके। तद्यथा—यस्य पञ्चाशत्पशवः सन्ति स प्रतिसंवत्सरमेकं पशुं राज्ञे दद्यात्। यस्य वा पञ्चाशन्निष्कैर्वृद्धिप्रयोगः स प्रतिवत्सरमेकैकं निष्कं राज्ञे बलिरूपेण दद्यादिति।' (गौ० ध० सू० मस्करी भाष्य) विक्रय-लाभमें बीसवाँ भाग राजाका है— 'विंशतिभागः शुल्कः पण्ये' (गौ० १०।१६) 'यद् वणिग्भिर्विक्रीयते तत्पण्यम्, तत्र विंशतितमो भागो राज्ञे देयस्तस्यैव दीयमा- नस्य शुल्क इति संज्ञा। शुल्कप्रदेशाः प्रतिभाव्यं वणिक्शुल्कमित्यादयः' (मस्क० भा०) मूल, फल, फूल, औषध, मधु, मांस, तृण, ईंधनोंके लानेका छठा भाग राजाको देना चाहिये— 'मूलफलपुष्पौषधमधुमांसतृणेन्धनानां षष्ठः' (गौ० १०।१७)

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३७१ 'मूलं हरिद्रादि, फलम् आम्रादि, पुष्पम् उत्पलादि, औषधं दित्वादि, शिष्टानि प्रसिद्धानि एतेषु पण्येषु षष्ठो भागो राज्ञे देय. विक्रेत्रा।' (मस्क० भा० ) करग्रहणमें तत्परता आवश्यक है—'तेषु तु नित्ययुक्तः स्यात् ।' ( गौ० सू० १०।१८) 'बल्यादानेषु सर्वदा सत्यपि कार्यव्यग्रत्वे तत्परो भवेत् । तु शब्दो विशेष- वाची । धर्मादनपेतेष्वन्येष्वपि द्रव्यार्जनोपायेषु तत्परो भवेत् । अत्र विशेषत इति।' ( मस्क० भा० ) शिल्पीलोग महीनेमें एक दिन काम कर दें, वही उनका कर है—'शिल्पिनो मासि मासि एकैकं कर्म कुर्यु ।' ( १०। २०) 'शिल्पिनो लोहकारादयो मासि मासि एकैकम् अह आत्मानुरूपं राज्ञः कर्म कुर्युः । तदेव तेषां शुल्कम् । नान्यत् किंचित् । ( मस्क० भा० ) नट-नर्तकादि भी महीनेमें एक दिन राज्यकर्म करें. अन्यथा महीनेमें एक रजत मुद्रा दें—'एतेनात्मोपजीविनो व्याख्याता.' ( गौ० सू० १०।२१) 'आत्मोपजीविनो नटनर्तकादयः । तेऽप्येकमह राज्ञः कर्म कुर्युरीति उशना । शिल्पिनो मासि मासि कर्मेकं प्रोक्तम् । तदभावे कार्षापणं वा दद्यात ।' (म० भा० ) सोना-चाँदीमें उपर्युक्त क्रम ही समझना चाहिये । ताम्रमें तृतीयांश छोडे । लोह, वग एव सीसेकी उत्पत्तिमें चतुर्थांश एव छठा भाग छोड़ना चाहिये— स्वर्णाद्यथ च रजतात्तृतीयांशं च ताम्रतः । चतुर्थांशं तु षष्ठांशं लोहाद् वंगाच्च सीसकात् ॥ (शु० नी० ४ । २२८) नाविक, कुम्भकार, बढ़ई, नाई, व्याध आदि महीनेमें एक दिन काम करें, अथवा उन्हे भी एक रजत मुद्रा देना चाहिये—'नौचक्रीवन्तश्च' ( गौ० १० । २२ ) 'चक्रं शकटम्, नौचक्राभ्यां य उपजीवन्ति बहुवचनाद् वर्धकिनापितादयो ग्राह्या । चकाराद् वन्यमृगघातकादय.।' ( मस्क० भा० ) परंतु काम करनेवालोंको भत्ता राज्यसे मिलना चाहिये—'भक्तं तेभ्यो दद्यात्' ( गौ० १० । २३ ) तेभ्यः शिल्पिप्रभृतिभ्यो राजा भक्तं दिवा भोजनं दद्यात । ( म० भा० ) राजाको अरिषड्वर्गको जीतकर इन्द्रियजय करके परस्त्री, परद्रव्य एवं हिंसाका वर्जन करना चाहिये तथा अर्थके अविरोधेन काम-सेवन करना चाहिये । जहाँ संस्था या धर्मशास्त्रसे शास्त्र तथा व्यवहारका विरोध हो वहाँ धर्मशास्त्रके अनुसार अर्थशास्त्रका निर्णय करना चाहिये—

३७२ मार्क्सवाद और रामराज्य तस्मादरिषड्वर्गत्यागेनेन्द्रियजयं कुर्वीत । एवं वश्येन्द्रियः परस्त्रीद्रव्य- हिंसाश्च वर्जयेत् । धर्मार्थाविरोधेन कामं सेवेत । संस्थाया धर्मशास्त्रेण शास्त्रं वा व्यावहारिकम् । यस्मिन्नर्थे विरुध्येत धर्मेणार्थं विनिर्णयेत् ॥ (कौ० अर्थ० १ । ७ । १, ३, ६; ३ । १५६) इसी प्रकार रत्न, लवणकी उत्पत्तिपर खानका खर्च काटकर आधा छोड़ना चाहिये । कर्षकको अधिक लाभ हो तो उसके अनुसार यथायोग्य तृतीय, पञ्चम, सप्तम या दशम भाग ग्रहण करना चाहिये । बकरी, भेड, भैस, घोडाकी वृद्धिमें अष्टमांश ग्रहण करना चाहिये । भैस, बकरीके दूधका सोलहवाँ भाग ग्रहण करना चाहिये । गाय आदिका दूध, अन्न, फल जो कुटुम्बके खाने-पीने लायक ही हो, उससे कर नहीं लेना चाहिये । उपभोगके लिये खरीदे गये अन्न- वस्त्रोंपर भी कर नहीं होना चाहिये—'गवादिदुग्धान्नफलात् कुटुम्बार्थाद्धरेन्नृपः । उपभोगो धान्यवस्त्रक्रेतृत्तो नाहरेत्फलम्॥' जहाँ राजतन्त्र शासन नहीं है वहाँ भी संसद्, कार्यपालिका, राष्ट्रपति या प्रधान मन्त्रियोंको भी धर्मनियन्त्रित होकर ही शास्त्रो तथा परम्पराके अनुसार कार्य करना चाहिये । प्रजा-पोषणके अनुकूल कार्य करना चाहिये । शास्त्रोकी दृष्टिमें भौतिक भावनाओद्वारा युगप्रवर्तन नहीं होता, किन्तु धर्मात्मा, पराक्रमी, बुद्धिमान् राजासे ही युगप्रवर्तन होता है । राजा ही कालका कारण होता है, सत् तथा असत् गुणोका भी प्रवर्तक राजा होता है । कठोरता एवं दण्डके द्वारा राजा ही प्रजाको धर्ममें प्रतिष्ठित करता है । अधर्मके कारण वेन आदि राजा नष्ट हो गये । धर्मसे पृथुकी वृद्धि हुई, अतः धर्मको पुरस्कृत करके ही राजाको काम करना चाहिये— कालस्य कारणं राजा सदसत्कर्मणस्त्वतः । स्वक्रौर्योद्यतदण्डाभ्यां स्वधर्मे स्थापयेत्प्रजाः ॥ वेनो नष्टस्त्वधर्मेण पृथुर्वृद्धस्तु धर्मतः । तस्माद्धर्मं पुरस्कृत्य यतेतार्थाय पार्थिवः ॥ (शुक्र० १, ६०, ६९) राजाका कर्तव्य है कि दण्ड, विष्टि करके बोझसे सकटग्रस्त कृषिकी रक्षा करे । डाकू, सर्प तथा दूसरी विषैली वस्तुओ तथा व्याधियोसे पशुओंको बचाये । अपने प्रिय कर्मचारियों, सीमारक्षकों, डाकू तथा बनैले पशुओसे क्षीयमाण व्यापारियों- की रक्षा करे । कौ० अर्थ० (२ । १ । ४५) मात्स्यन्यायसे पीड़ित प्रजाने सर्वप्रथम वैवस्वत मनुको राजा बनाया तथा धान्यका छठा एव पुण्यका बीसवाँ भाग उस राजाको देना निश्चित किया था । मार्क्सवादी कहते हैं कि 'भूमिपर वसूल किये जानेवाले करद्वारा ही भूमिके मालिककी आमदनी होती है और इसी करद्वारा खेतीके लिये मेहनत करनेवाले किसानका शोषण होता है। इसलिये करके अनेक रूपों और भेदोंको समझ लेना जरूरी है ।

"खेतीकी सम्पूर्ण भूमिपर कर होता है। यह कर या लगान कहीं अधिक होता है कहीं कम। यदि भूमिके सबमे कम करको 'आवश्यक कर' (एब्सोल्यूट रेन्ट) मान लिया जाय तो अधिक उपजाऊ या शहरके समीपकी भूमिपर जो अधिक कर वसूल किया जाता है, उसे 'विशेष कर' (डिफ्रेन्सल रेन्ट) कहा जायगा। भूमिके प्रत्येक टुकड़ेपर कुछ-न-कुछ कर होनेका कारण यह है कि पैदावारके औद्योगिक साधनोंको जिस प्रकार शहरसे दूर आवश्यकतानुसार बढ़ाया जा सकता है, नजदीक इस प्रकार नहीं बढ़ाया जा सकता। उन उपजाऊ या शहरसे दूरकी भूमिको छोड़कर उपजाऊ और शहरकी भूमि आवश्यकतानुसार तैयार नहीं की जा सकती। इसलिये भूमिके किसी भी टुकड़ेको जीतनेकी आवश्यकता होनेपर उसपर कर देना ही पड़ेगा। जो भूमि अधिक उपजाऊ होगी या शहरके अधिक समीप होगी, जहाँ सिंचाई आसानीसे हो सके, ऐसी भूमिपर विशेष लगान या कर वसूल किया जाता है। इस प्रकारकी अच्छी जमीनपर जो विशेष कर या लगान वसूल किया जाता है, वह भूमिके मालिकके जेबमें ही चला जाता है। परंतु भूमिको अच्छी बनाने या भूमिके शहर या जलके समीप होनेमे भूमिके मालिकको कुछ परिश्रम नहीं करना पड़ता। "सभी पूँजीवादी देशोंमे भूमिके दो मालिक होते हैं। प्रथम तो सरकार, जो खेतीके काम आनेवाले भूमिके प्रत्येक टुकड़ेपर कर या मालगुजारी लगाती है। दूसरा मालिक होता है भूमिक्षा मालिक समझा जानेवाला व्यक्ति, जो भूमिका कर सरकारको अदा कर उसे किसानसे जुतवाता है और अपना लगान किसानसे वसूल करता है। सरकारी कर और जमींदारी लगान अदा किये जाते हैं खेतीकी उपजसे, परंतु खेतीकी उपजमें न तो जमींदार न सरकार ही कुछ परिश्रम करती है। परिश्रम सब करता है किसान और किसानके परिश्रमसे की गयी पैदावारमे जमींदार और सरकारका भाग निकाला जाता है। यदि किसानके परिश्रमको बाँटकर देखा जाय तो उसके दो भाग हो जाते हैं। एक भाग वह जिसे वह स्वयं खर्च करता है ताकि उसके शरीरमे परिश्रमकी शक्ति कायम रह सके और दूसरा भाग वह, जिसे भूमिक मालिक किसानसे ले लेता है और आगे सरकारको कर देता है। किसान अपनी सम्पूर्ण उपज अपने लिये पैदा करता है। यदि किसान जितना अपने और अपने परिवारके लिये खर्च करता है उतना ही पैदा करे तो उसे बहुत कम स्थानपर खेती करनी होगी और बहुत कम परिश्रम करना होगा। वर्तमान व्यवस्थामे किसानको जितना वह खर्च करता है, उससे बहुत अधिक पैदा करना पड़ता है। मजदूरकी अवस्थाके साथ तुलना करनेपर हम कहेंगे कि किसानको काफी मात्रामे अतिरिक्त या फालतू पैदावार करनी पडती है, जो जमींदार और सरकारके व्यवहारमें आती है।"

३७३ मार्क्सवाद और रामराज्य पूर्वोक्त विवेचनसे यह स्पष्ट है कि शासनसार राजा, करद राजा, गुजारेदार, इमानदार या दानदार आदि भूमिके अधिकारी कई ढंगके होते हैं । करद राजा तथा सामन्त आदि प्रजासे कर लेते हैं और स्वयं भी राजाको कर देते हैं । यही लगान मालगुजारी आदि रूपसे प्रसिद्ध होता है । जैसे मनुष्य अपनी कमाईका हकदार होता है, वैसे ही पिता-पितामह आदिकी कमाईका भी हकदार होता है । पिता-पितामह आदिकी सम्पत्ति पुत्रादिको दायके रूपमें प्राप्त होती है—'दीयते पित्रा पुत्रेभ्यः स्वस्य यद्धनं तद्दायम्'—पिताद्वारा अपने पुत्रको जो धन दिया जाता है वह दाय कहलाता है । उसमें ज्येष्ठ-कनिष्ठ आदि भेदसे पुत्रोंको भिन्न-भिन्नरूपसे दाय मिलता है । विद्या एवं कर्ममें संलग्नको अन्य पुत्रोंसे अधिक मिलना चाहिये—'विद्याकर्मरतस्तेषामधिकं लब्धुमर्हति' (बृह० स्मृ० गा० २६ । १९) । यह भी एक पक्ष है कि ज्येष्ठ ही पिताके धनका मालिक हो, शेष भ्राता पितृतुल्य मानकर उसीका अनुसरण करे— ज्येष्ठ एव तु गृह्णीयात् पित्र्यं धनमशेषतः । शेषांस्तमुपजीवेयुर्यथैव पितर तथा ॥ ( मनु० ९ । १०५ ) कम्युनिष्टोंके सम्पूर्ण तर्कोंका एकमात्र आधार है—बाप दादाकी सम्पत्तिमे पुत्रादिकोंका बपौती अधिकार न मानना । परंतु यह तर्कों, शास्त्रों तथा व्यवहार एवं परम्पराओसे सर्वथा विरुद्ध है । व्यक्तिगत भूमि, सम्पत्ति, खानों- कारखानोको न माननेसे सब कामोका अधिकारी काम करनेवाला ही हो सकता है । परंतु दूसरोके खेतमे खेती करने, दूसरोकी पूँजीसे वस्तु बनाने, दूसरोके वृक्षोंसे फल तोडने वा संग्रह करनेपर भी फललाभका भागी केवल काम करनेवाला नहीं हो सकता । उसे परिश्रमका फल कुछ वेतन अवश्य मिल सकता है । हाँ, यदि वह खेतको खरीदकर या पूँजी उधार लेकर वस्तु बनाता है, वृक्षोको खरीदकर या ठेकापर ले लेता है, तब अवश्य वह लाभका भागी हो सकता है । पिछले प्रकरणोंमे भूमि-सम्पत्ति आदिपर व्यक्तिगत वैध अधिकार दिखलाया जा चुका है । मजदूरोके श्रममे जैसे दो भेद निरर्थक एवं निराधार हैं, वैसे ही किसानोकी भी दो प्रकार श्रमकल्पना निरर्थक एवं निराधार है । खेती करके अन्न आदि पैदा करनेका परिश्रम अभिन्न ही है । वह उसमेसे ही कुछ अंगसे कर चुकाता है, कुछ अगसे अपनी जीविका चलाता है । हाँ, कर अधिक होनेकी शिकायत हो सकती है । उसके औचित्यका निर्णय निष्पक्ष सरकार या न्यायालय अथवा पञ्चायतद्वारा किया जाना उचित हो सकता है । पैदावार किसानसे छीनी नहीं जाती, किंतु भूमि-मालिक और किसानके समझौतेसे स्वयं किमान ही करके रूपमें देता है । किसानने कर देना

स्वीकार करके ही खेती करना आरम्भ किया है। जैसे कोई कम्युनिस्ट राज्य ही किसी राज्यसे कोई भूमि या कारखाना अमुक वस्तु देनेके शर्तपर लिया हो तो वह अपनी शर्तके अनुसार देगा ही, उस देनेको लेनेवालेद्वारा छिनना नहीं कहा जायगा। इसी तरह यह भी समझ लेना चाहिये कि खेतीमें उत्पन्न होनेवाली वस्तु भी केवल श्रमका फल नहीं है, किंतु श्रमविशिष्ट भूमिका ही फल है। अतः कुछ फल श्रमवालेको मिलना चाहिये और कुछ भूमिपतिको भी अवश्य मिलना चाहिये। यदि किसानोको व्यक्तिगत खेती करनेकी छूट होगी, तब तो कम्युनिस्ट राज्योंको भी राज्य-व्यवस्थाके लिये भूमिसे कुछ- न-कुछ कर लेना ही पड़ेगा। यदि वहाँ व्यक्तिगत खेती न होकर सरकारी ही खेती होगी, तब भी राज्यव्यवस्थाके लिये कुछ-न-कुछ अंश निकालना ही पडेगा। परिश्रमवालोंको ही सब फल दे देना सम्भव नहीं, क्योकि फलमें परिश्रमकी अपेक्षा भूमि और बीजका प्रमुख हाथ है। परिश्रम और भूमिकी अपेक्षा भी भूमिका अधिक महत्त्व है। एक-एक बीजके बदले सैकडो-सैकडो बीज भूमिके अंशसे बनते हैं। कही-कही जल और खाद आदिका भी दाम देना पडता है, क्योकि उनका भी उत्पादनमे हाथ होता है। इन वस्तुस्थितियोको समझकर ही किसान सहर्ष कर देता है और वह छीना-झपटीके कम्युनिस्ट आन्दोलनसे पिण्ड छुडानेके लिये भी प्रयत्न करता है। अपने देश या विदेशके लिये कच्चा माल दाम लेकर ही किसान देता है। दामके औचित्य-अनौचित्यका निष्पक्षसे विचार करनेके लिये तो सदा ही द्वार खुला रहना चाहिये। भूमिपर कर घटने-बढनेकी व्यवस्था लाभपर ही निर्भर करती है। यदि कल-कारखानोके लिये किसी वस्तुकी अधिक माँग हुई तो उस वस्तुका दाम भी अधिक बढेगा। तब जैसे श्रमका दाम बढ जायगा वैसे ही भूमिका भी दाम बढ जाना उचित ही है। हाँ, जहाँ श्रमकी अधिकतासे ही उत्पादन बढा है, जैसे उसी पडोसकी, उसी ढंगकी भूमिसे परिश्रम कम होनेसे कम फल हुआ, परिश्रम अधिक होनेसे प्रकृत भूमिमे उत्पादन अधिक हुआ है, तो उस अधिक फलको परिश्रमका ही फल मानना चाहिये। यदि सिचाईका प्रबन्ध भूमिके मालिकने किया है तो अवश्य ही उसके अनुपातसे भूमिका कर बढना उचित है। यदि किसानने ही कूप आदि बनाये हैं तो उसका फल किसानको ही प्रधानरूपसे मिलना चाहिये। सरकारी विभागमे या किसी अन्य ठेकेदारने अगर नहर आदिका प्रबन्ध किया है तो वह सिचाई, कर आदि भी लेगा। फिर भी कर देनेवालेको ही उसका फल भोगना उचित है। धर्मनियन्त्रित शासनका यह कर्तव्य है कि भूमिपतिकी आयके पाँचवे अगसे, जो कि अर्थके ही लिये है, तथा अन्य सहायताओसे

खेतीके सुधारकी व्यवस्था करे । असाधु, कर्तव्यविमुख लोगोंकी अधिक सम्पत्तिका अपहरण कर तथा कर्ज लेकर भी खेती-सुधारकी व्यवस्था हो सकती है। बढनेवाली आमदनीके आधारपर कर्ज चुकाया जा सकता है। कृषकका अतिरिक्त श्रम और भूमि-कर मार्क्सवादी कहते हैं—"किसानसे छीन ली जानेवाली यह अतिरिक्त पैदावार किसानको इस योग्य नहीं रहने देती कि जितने दामकी फसल वह बाजारमें भेजता है, उतने दामका दूसरा सौदा बाजारसे लेकर खर्च कर सके। किसानके श्रमका यह फल या धन भूमिके मालिकोंकी जेबमे चला जाता है और वहाँसे पूँजीपतियोंके जेवमें । अथवा भूमिके मालिक स्वयं ही पूँजी इकट्ठी हो जानेपर उसे पूँजीवादियोंके व्यवसायोंमे सूदपर या पत्ती ( साझेदारी हिस्सा ) के रूपमे लगा देते हैं । अतिरिक्त श्रमके रूपमें किसानका यह शोषण जिसे भूमि-कर या लगान कहा जाता है, किसानद्वारा की जानेवाली पैदावारमे लगा हुआ एक पम्प है, जो किसानके पास सिवा उसके परिश्रमकी शक्तिको कायम रखनेके, और कुछ नहीं छोड़ता । किसानके सगठित न होने और अपने अधिकारके लिये आवाज न उठा सकनेके कारण उसके पास अपने परिश्रमका उतना भाग भी नहीं रह पाता, जितनेसे वह परिश्रम करने लायक स्वस्थ अवस्थामे रह सके। यह प्रत्यक्ष बात है कि इस देशका किसान न केवल इस देशके लिये बल्कि अनेक देशोंके उद्योग-धंधोंके लिये कच्चा माल पैदा करनेके बावजूद स्वयं आधा पेट खाकर और शरीरसे प्रायः नगा रहकर निर्वाह करता है। उसकी सम्पूर्ण पैदावार अतिरिक्त श्रम या पैदावारका रूप धारणकर इस देश तथा दूसरे देशके पूँजीपतियोंकी जेबमें चली जाती है। प्रत्यक्षमे किसानकी अतिरिक्त पैदावार उससे छीन लेनेको ही भूमि-करका नाम दिया जाता है। "पूँजीवादके विकाससे भूमि-कर बहुत तेजीसे बढता है, क्योकि नये-नये उद्योगधंधे जारी होनेसे नयी-नयी किस्मकी वस्तुएँ पैदा करनी पडती हैं, इसके लिये नयी भूमि तोड़ी जाती है। जो नयी भूमि तोड़ी जायगी, उसपर भी कर लगेगा । पूँजीपति या भूमिका मालिक नयी भूमि उसी समय तोड़ेगा, जब वह पहलेसे उपयोगमे आनेवाली भूमिपर लगनेवाले लगानको अधिक समझेगा। नयी भूमि तोड़नेसे पहले खेतीके काममें आनेवाली भूमिके लगानका दर बढेगा और जब बढा हुआ दर देनेकी अपेक्षा कोई व्यक्ति नयी भूमि तोड़ना ही पसन्द करेगा; तभी नयी भूमि तोडी जायगी । इस प्रकार भूमिके प्रत्येक नये भागको तोडनेसे पहले, जोती जानेवाली पुरानी और अच्छी भूमिपर लगान बढता चला जायगा और वह इस हदतक बढेगा कि किसानके पास कठिनतासे निर्वाहमात्रके लिये उसके परिश्रमका एक बहुत छोटा-सा भाग रह जायगा ।

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३७७ "यदि भूमिके किसी भागकी पैदावारकी शक्ति सिंचाई आदिका प्रबन्ध करके बढ़ायी जाती है तो उसका लगान भी साथ ही बढ़ जाता है और पैदावारमें होनेवाली बढ़ती सब मालिकके पास पहुँच जाती है। किसानके परिश्रमका बहुत बड़ा भाग अतिरिक्त श्रम या भूमिके लगानकी सूरतमें उससे छीन लिया जानेके कारण न किसानके पास अपनी भूमिकी अवस्था सुधारने या खेतीके नये वैज्ञानिक साधन व्यवहारमें लाने योग्य सामर्थ्य नहीं रहती और भूमिकी उपज घटने लगती है। परंतु लगान तथा करके पूँजीवादके साथ बढ़ते जानेके कारण भूमिकी कीमत बढ़ती जाती है। खेतीकी अवस्थामें यह अन्तर्विरोध संकट पैदा कर देता है। ऐसी अवस्थामें किसानके लिये भूमिके मालिकके संतोषके लायक लगान देना कठिन हो जाता है और किसान खेती करनेका काम छोड़ निर्वाहका कोई साधन और न देख मजदूर बननेके लिये चल देता है। उसकी 'जोत' की भूमि बिकने लगती है, परंतु भूमिका दाम तो लगानके बढनेके साथ बढ़ चुका है, इसलिये मामूली साधनोंके मालिकके लिये उसे खरीदना सम्भव नहीं होता। वह बिकती है बड़े-बड़े पूँजीपतियोंके हाथ। इस प्रकार पैदावारके दूसरे साधनोकी ही तरह भूमि भी पूँजीपतियोंके हाथ चली जाती है।" खेतीकी पैदावार बड़े परिमाणमें खेती करनेसे अवश्य अधिक बढ़ सकती है और तदर्थ सहकारिताके आधारपर सम्मिलित खेती होनी अनुचित नहीं। यह पीछे कहा जा चुका है कि लगान या करकी दर मनमानी ढंगसे नहीं होनी चाहिये। यदि किसान और जमीदारके आपसी समझौतेसे उचित दरका निश्चय न हो तो निष्पक्ष पञ्चायत या अदालतोद्वारा दरका निश्चय होना उचित है। किसी भी अनुचित कार्यको रोकनेके लिये सरकारी हस्तक्षेप भी अनिवार्यरूपसे मान्य है। कच्चे मालका भी उचित दाम किसानोंको मिलना चाहिये। संक्षेपमें राष्ट्रद्वारा निर्धारित नागरिक जीवनस्तरके अनुकूल प्रत्येक नागरिककी आयकी व्यवस्था होनी चाहिये। जीविकाके सभी साधनोमें खेती, वाणिज्य, मजदूरी आदिके उक्त दृष्टिकोणको ध्यानमें रखना आवश्यक है। साथ ही इसे भी भूलना न चाहिये कि व्यक्तिगत हानिका भय तथा लाभका लोभ जितना प्राणीको प्रमाद एवं आलस्यसे बचाकर कार्यपरायण बनाता है, उतना दूसरे हेतु नहीं। जहाँ सरकारी तौरपर वैतनिक कर्मचारियोंद्वारा काम होते हैं, वहाँकी लापरवाही तथा भ्रष्टाचार अवर्णनीय होता है। भारतके प्रथम पञ्चवर्षीय योजनानुसारी बाँधो आदिमें भीषण भ्रष्टाचारके उदाहरण विद्यमान हैं। फिर जहाँ वेतनकी व्यवस्था नहीं है, केवल निर्वाह-सामग्री ही मिलनेकी बात होती है, वहाँ तो ओर भी अधिक लापरवाही होती है।

३७८ मार्क्सवाद और रामराज्य सामूहिक कामोके प्रति ईमानदारोकी भी सामान्य ही प्रवृत्ति होती है । शक्तिचोरोका तो कहना ही क्या है ? प्रसिद्ध है—'न गणस्याग्रतो गच्छेत् सिद्धे कार्ये समं फलम् । यदि कार्यविपत्तिः स्यान्मुखरस्तत्र हन्यते ॥' (हितो० १।२९) कल्याण चाहनेवालेको गणका अग्रगामी नही बनना चाहिये, क्योकि कार्य सिद्ध होगा तो समान ही फल मिलेगा और यदि कार्यमे बाधा पड़ी तो मुखियाको ही सकटमें पड़ना होगा । इन्ही कारणोसे अक्टूबर ( १९५५ ) के किसी अङ्कमें 'प्रवदा' ने कुछ रूसी मन्त्रियोकी लापरवाहीकी शिकायत की थी । इसके अतिरिक्त स्वतन्त्रता भी कोई वस्तु है। अपने इच्छानुसार अन्न, गन्ना, विविध फल आदि पैदा करना, फिर उसका अपने इच्छानुसार उपयोग करना सरकारी खेतीमें सम्भव नही । अतः कोई भी किसान उसे पसन्द नहीं कर सकता । अधिक क्या, पक्षी भी स्वतन्त्रता- पूर्वक खट्टे फल खाना, खारा पानी पीकर जीवन व्यतीत करना ही ठीक मानता है। वह सुवर्ण-पिंजरमे रहकर मधुर फल खाकर भी पराधीनता पसन्द नही करता, इसी तरह जमीदारो, किसानोकी भूमिका अपहरण भी व्यक्तिगत वैध-स्वत्वके विपरीत ही है। व्यक्तिगत उत्पादनमे भी प्रतियोगिता आदिद्वारा विकासमे सुविधा होती है । रामराज्यवादी तो बड़े-बड़े उद्योग-धंधोको भी विकेन्द्रित करनेके ही पक्षमे हैं । खेतीका विकेन्द्रीकरण उद्योग स्वालम्बनका प्रतीक है । बड़े परिमाणमें खेती मार्क्सके अनुसार पूँजीवादद्वारा उद्योग-धंधोके विकास और पैदावारकी अन्य वृद्धिका एक रहस्य है । पैदावारको एक स्थानपर बड़े परिमाणमे करनेपर ही उसमें आधुनिक ढंगकी बड़ी मशीनोंका व्यवहार हो सकता है, खर्च घट सकता है और मनुष्यकी पैदावारकी शक्ति बढ़ सकती है । मनुष्य जितनी ही विकसित और बडी मशीनपर काम करेगा, उसी परिमाणमें उसकी पैदावारकी शक्ति बढ़ सकेगी । उद्योग-धंधोके क्षेत्रमे बड़े परिमाणमे पैदावार समाजकी पैदावार-शक्तिको बढ़ाती है, इस विषयमें किसीको भी संदेह नहीं। परंतु खेतीके विषयमे पूँजीपतियोकी राय इससे भिन्न है । पूँजीवादी-प्रणालीमें विश्वास रखनेवालोका कहना है कि बड़े परिमाणमे खेती पैदावारको बढानेकी अपेक्षा घटायेगी । उसके लिये दलीलके तौरपर कहा जाता है कि खेतीको बड़े परिमाणमे करनेसे किसानकी भूमिके प्रति वह सहानुभूति और प्रेम नही रहेगा, जो छोटे परिमाणमे खेती करनेपर होता है ।' परंतु मार्क्सवादियोका विश्वास है कि 'और दूसरे उद्योगोकी तरह खेती भी बड़े परिमाणमें ही होनी चाहिये । इसके बिना न तो खेतीकी पैदावार ही उचित मात्रामे बढ़ सकती है, न समाजमें ही खेतीकी और उद्योग-धंधोकी पैदावारका बटवारा समान रूपसे हो सकता है और न किसानोकी ही आर्थिक अवस्था सुधर सकती है। "यदि उद्योग-धंधोसे काम करनेवाली श्रेणी मशीनसे पैदावार करेगी तो

उसकी पैदावारकी शक्ति बढ़ जायगी । उसे अपनी मेहनतका अधिक फल मिलेगा, परंतु किसानोके मशीनसे मेहनत न करनेपर उनकी पैदावारकी शक्ति न बढ़ेगी और उन्हें उनकी मेहनतका फल कम मिलेगा । इस प्रकार खेती और उद्योग- धंधोंकी पैदावारका विनिमय समानरूपमें न हो सकेगा । "पूँजीवादी लोग खेतीको बड़े परिमाणमें बड़ी मशीनोसे करनेके पक्षमें इसी- लिये नहीं हैं कि भूमिके छोटे-छोटे टुकडोंपर मशीनोंका व्यवहार नहीं हो सकता । उसके लिये मीलों लंबे खेत चाहिये । ऐसे खेत बनानेमें अनेक जमींदारोंकी मिल्कियत मिट जायगी । उद्योग-धंधोंमें जिस प्रकार पूँजीपति निजी पूँजीको बढ़ा सकता है, जमींदार अपनी भूमिको नहीं बढ़ा सकता । बड़े परिमाणपर खेती करनेके लिये या तो जमींदारोंका अधिकार भूमिपर अस्वीकार करना होगा या सैकडों जमींदारोंकी भूमिको एकत्रमें मिलाकर उसे समाजके नियन्त्रणमें रखना होगा । मार्क्सवादियोका कहना है कि खेतीको बड़े परिमाणपर करनेके सम्बन्धमें जितने भी एतराज किये जाते हैं, रूसके अनुभवसे वे सब निराधार प्रमाणित हो गये हैं । "खेतीको संयुक्त रूपसे बड़े परिमाणपर करनेसे ही उसमें ट्रैक्टर आदि बड़ी- बड़ी मशीनों और सिंचाईका प्रबन्ध हो सकेगा । खेतीके सुधारके लिये बड़े परिमाणपर कर्जा मिल सकेगा और खेतीकी पैदावारको बेचनेवालोंमे परस्पर मुकाबला न होनेपर उसे ठीक समय और पूरे मूल्यमें बेचा जा सकेगा । खेतीकी पैदावारके विनिमयका काम संयुक्तरूपमे और बडे परिमाणमें होनेपर उसे व्यवहारमें लानेवाली जनतातक पहुँचानेका काम व्यापारियो और साहूकारोके हाथ न रह सकेगा । किसान अपने प्रतिनिधि सगठनद्वारा उसे स्वयं कर लेगा, इस तरह किसानके श्रमका वह बडा भाग, जो इन व्यापारियोकी जेबमें जाता है, किसानके उपयोगमें आयेगा । खेतीके बड़े परिमाणपर और संयुक्तरूपमे करनेपर किसानकी मानसिक उन्नतिका भी अवसर रहेगा । मशीनका व्यवहार करनेसे वह आज दिनकी तरह दिन-रात भूमिसे सिर मारनेके लिये विवश न होगा, बल्कि उसे शिक्षा और संस्कृति प्राप्त करनेके लिये समय मिल सकेगा और किसानोके परस्पर सहयोगसे काम करनेपर उनमें श्रेणी-भावना और श्रेणी-चेतना भी उत्पन्न हो सकेगी, जिसका उनमें न होना उनके शोषणको पशुताकी सीमातक पहुँचा देता है । मशीनोंका व्यवहार खेतीमें होनेसे ही किसान, जो वास्तवमें मिल-मजदूरकी तरह खेत-मजदूर है, औद्योगिक धंधोंमे काम करनेवाले मजदूरके समान उन्नति कर सकेगा ।" मार्क्सवादियोका अन्तर्विरोधका रोग सर्वत्र दिखायी देता है । इसीसे उन्हें खेतीमे भी अन्तर्विरोध दिखायी देता है । धर्मनियन्त्रित र नराज्यवादी शासन आर्थिक सन्तुलनकी दृष्टिसे करोंमें संशोधन कर सकेगा । अतः न किसानको भूमि

३८० मार्क्सवाद और रामराज्य

छोडनेकी आवश्यकता पडेगी और न भूमि पूँजीपतियोंके ही हाथ जायगी । विकेन्द्रीकरण सरकारी लक्ष्य होनेपर पूँजी और भूमि सभीके केन्द्रीकरणपर प्रतिबन्ध रहेगा । सरकारीकरणके यन्त्रमे सबका खात्मा हो जानेके खतरेकी अपेक्षा सापेक्ष एवं सीमित नियन्त्रण सबको ही सुखकर होगा । रूसका अनुभव प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता । रूसी प्रचारद्वारा भले ही रूस स्वर्ग बन गया हो, परन्तु वस्तुस्थिति इसके सर्वथा विपरीत है । मशीनोके अधिक व्यवहार करनेसे चेतन प्राणी भी स्वय एक जड मशीन बन जाता है । पराधीनता भी बढती जाती है—'सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्' (मनु) —पराधीनता ही सब दुःख है, स्वाधीनता ही सब सुख है । मशीनोद्वारा सब कामसे छुट्टी पाकर मनुष्य शिक्षा आदि प्राप्त करनेमे समय लगायेगा । पर वह भोग- विलासमे समय न गँवायेगा—यह कौन कह सकता है ? फिर शिक्षा-सस्कृतिके लिये भी तो कोई मशीन निकाली ही जाती है और तब बेकारी भी और अधिक बढ सकती है । श्रेणी-चेतना यदि सङ्घर्षके लिये ही अपेक्षित होगी तो कोई भी बुद्धिमान् सङ्घर्षको हानिकारक ही समझेगा । समझौता, सामञ्जस्य, समन्वय ही समाजके लिये अपेक्षित है । धर्मनियन्त्रित रामराज्य तो मुख्य रूपसे महायन्त्रोपर प्रतिबन्ध लगानेके पक्षमे ही है । जबतक इसमे विलम्ब है तबतक अन्य औद्योगिक विकास एवं खेतीके विकासका संतुलन रखा जायगा । सरकारीकरण होनेके पहले किसान अपनी जमीनमे खेती करनेमे स्वतन्त्र है । मजदूर तो वह तब बनेगा जब सब खेतोका सरकारीकरण हो जायगा । इसीलिये भारतका वर्तमान किसान-मण्डल भूमि-सम्बन्धी सरकारी नीतिसे चिन्तित है । वह सरकारीकरण नीतिका विरोध करनेके लिये प्रस्तुत है । कम्युनिष्टोके तर्क वस्तुस्थितिके विरुद्ध हैं । किसानोका प्रतिनिधि-संगठन भी कम्युनिज्ममे वास्तविक नहीं हो पाता; क्योकि वहाँ स्वतन्त्र मत व्यक्त करना, स्वतन्त्र लेख प्रकाश करने आदिकी किसी प्रकारकी सुविधा नहीं है । कम्युनिष्ट सरकार जैसा चाहती है, वैसे ही प्रतिनिधि-संगठनका नाटक किसानोको भी करना पडेगा । फिर भी अधिनायकत्व मजदूरोँका ही होगा, किसानोका नही । मार्क्सवादी पूँजीवादके दोषोका वर्णन करते हुए मशीनोपर लाञ्छन लगाते हैं कि 'मशीनोके कारण ही अनेक प्रकारकी बेकारी फैली, स्वाधीन उद्योग-धंधे नष्ट हो गये । कारीगरोको मजदूर बना डाला गया', किंतु स्वय कम्युनिष्ट उन मशीनोका मोह नहीं छोड सकते । समान वितरणके नामपर मशीनोके दोष छिपानेका प्रयत्न करते हैं, रही-सही स्वाधीनताको समाप्त करके व्यक्तियोको तानाशाही शासनका नगण्य कल-पुर्जा बना देना चाहते ह ।

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३८१ आर्थिक संकट मार्क्सवादके दृष्टिकोणसे "पूँजीवादी समाजमे पैदावारका काम समाजके सभी लोग मिलकर करते हैं, परंतु प्रत्येक पूँजीवादी अपने ही लाभको सामने रखता है। इसलिये सम्मिलित तौरपर समाजकी आवश्यकताओंका न तो सही अनुमान ही हो सकता है और न उसके उपयुक्त पैदावार ही। पूँजीवादी समाजमे उत्पादक अपने व्यवहारके लिये नहीं, बल्कि उसे बेचकर मुनाफा कमानेके लिये पैदावार करते हैं। पैदावार करनेवालोंको समाजकी आवश्यकताओं और खपतकी शक्तिका अंदाज़ा ठीक नही हो सकता, इसलिये समाजमे पैदावारके बड़े-बड़े साधनोंसे जो पैदावार की जाती है, उसकी खपत नहीं हो पाती। इसका अर्थ यह नहीं कि समाजको उस पैदावारकी ज़रूरत नहीं। हाँ, समाजके पास उसे खरीदनेकी शक्ति नहीं रहती। यदि यह पूँजीपतिके मुनाफेको ही समाजका उद्देश्य न मानकर समाजकी पैदावार और खपतपर विचार करे, तो दो प्रश्न उठते हैं। प्रथम पैदावार कौन करता है ? दूसरे समाजमे पैदावारको कौन खपा सकता है ? पहले प्रश्नका उत्तर है—समाजमे पैदावार मेहनत करनेवाले करते हैं । दूसरे प्रश्नका उत्तर है—समाजमे तैयार सामानकी खपत समाजमे मेहनत करनेवाले करते हैं। “इससे हम इस परिणामपर पहुँचते हैं कि समाजमे जो लोग पैदावारके लिये परिश्रम करते हैं, वे ही पैदावारको खर्च करनेवाले भी हैं। यदि पैदावारके लिये परिश्रम करनेवालोंको अपने परिश्रमका ( केवल परिश्रमकी शक्तिको कायम रखनेका नहीं) फल मिल जाय तो पैदावार फालतू पड़ी नहीं रह सकती । परंतु ऐसा होता नही, इसलिये पैदावार पड़ी रह जाती है और पैदावारका क्रम टूट जाता है । “मुनाफेके रूपमें पैदावारके लिये परिश्रम करनेवालोंका जो श्रम निकालकर एक तरफ रख दिया जाता है, वह पैदावार करनेकी शक्तिको बढ़ा देता है, परंतु समाजकी खर्च करनेकी शक्तिको घटा देता है । इसलिये एक तरफ तो पैदावारके अम्बार लग जाते हैं और दूसरी ओर जनताकी आवश्यकताएँ पूरी न हो सकनेके कारण, बिलखते रहनेपर भी पैदावारको खर्च नहीं कर सकती, क्योंकि उसके पास खरीदनेकी शक्ति नहीं। खर्च करनेकी शक्ति तो मुनाफेके रूपमें उससे छीन ली गयी है । पैदावारके खर्च न हो सकनेके कारण उसे कम करनेकी जरूरत अनुभव होती है। इसका अर्थ होता है—मजदूरीके रूपमे खरीदनेकी शक्ति जनताके पास और कम हो जाय । अर्थात् बेकारी बढ़े, मेहनत कर सकनेवालोंकी संख्या घटे और साथ ही खर्च कर सकनेवालोंकी संख्या भी घटे और पैदावारको और भी कम किया जाय । परिणामतः खर्च करनेकी शक्ति

३८२ मार्क्सवाद और रामराज्य और भी घट जाती है, इस प्रकार यह चक्कर समाजमें पैदावार और खर्चके दायरेको कम करता हुआ समाजकी एक बड़ी संख्याको भूखे और नंगे रहकर मरनेके लिये छोड़ देता है। "कहा जाता है कि पूँजीवादमें उत्पादन-शक्तियोमे निरन्तर प्रगति होती रहती है। नये-नये साधनोका आविष्कार एवं प्रयोग होता रहता है, परंतु सामाजिक सम्बन्धोमे परिवर्तन नही होता । अर्थात् पूँजीपति और श्रमिकका सम्बन्ध ज्यो-का-त्यो रह जाता है । पूँजीपति श्रमिकोको कम-से-कम वेतन देना चाहते हैं। फलतः प्रति दसवे वर्ष आर्थिक संकट उपस्थित होता है । उत्पादन-शक्तियोके बढ़नेसे लाखों मजदूरोके बदले सैकड़ो मजदूरोसे ही उत्पादन हजारो गुना ज्यादा बढ़ता जाता है । वस्तुओकी बहुतायतके साथ मजदूरोकी बेकारी बढ़ती जाती है और उनकी क्रयशक्ति घटती जाती है। अतः बाजारमे वस्तुओकी खपत कम हो जाती है। यह क्रम उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाता है। इस तरह पूँजीपतिके भी सामने प्रश्न खडा होता है कि वह अपना माल कहाँ बेचे ? इसका पहला मार्ग खोजा गया साम्राज्यवाद । निर्भीक होकर पूँजीपति दुनियाके कोने-कोनेमे पहुँचे । विश्वविजयका मार्ग अपनाया । औपनिवेशिक युद्ध किये । भारत, अमेरिका, कनाडा मे बाजार बनाया । वहाँसे सस्ता कच्चा माल प्राप्त किया । किसी देशके निवासियोको पराजित किया । किसी देशके निवासियोको मिटा भी दिया । यूरोपके पूँजीपतियोने दुनियाको अपना बाजार बना लिया । कहा जाता है—'लार्ड डलहौजीके समय भारतमे जो सुधार हुए, मार्क्सकी दृष्टिसे वे सुधार हुए ही नहीं, किंतु उस समय औद्योगिक क्रान्तिके कारण इंग्लैडमें रेल, तार आदिके सामान पर्याप्त बन गये थे । इस मालकी खपतके लिये पहले यूरोप और अमेरिकाके बाजार थे, किंतु कुछ समयके बाद और नये बाजारोंकी आवश्यकता हुई । तब भारतके द्वारा इस समस्याकी पूर्ति की गयी । भारतमे रेल-तारका सामान महँगे-से-महँगे दामोपर बेचा गया । फिर रेलोद्वारा भारतवर्षका कच्चा माल इंग्लैडमे भेजनेके लिये सुगमतासे एकत्रित किया जा सकता था । इंग्लैडका माल भी भारतके कोने-कोनेमे पहुँच गया औद्योगिक क्रान्ति सर्वप्रथम ( १७५०-१८५० ) इंग्लैडमे हुई । अतः उसने सर्वश्रेष्ठ साम्राज्य स्थापित कर लिया । बादमे फ्रांस और जर्मनीमें औद्योगिक उन्नति हुई । अतः वे साम्राज्य-निर्माणमें पिछड गये ।' पूर्वोक्त रामराज्य-प्रणालीके अनुसार कहा गया है कि मजदूरोकी संख्या- वृद्धि, वेतनमें वृद्धि, कामके घटोमें कमी होनेसे न तो बेकारी बढ़ेगी और न तो क्रयशक्ति ही घटेगी । फलतः मालकी खपतमे भी कमी न होगी । अतः आर्थिक

संकट भी नहीं आयेगा। पूँजीपतियोंने लाभके लोभमें राज्य फैलाया, बाजार बनाया, अपनी चीजोंको संसारके कोने-कोनेमें पहुँचाया सही, परंतु उनपर रामराज्यका धर्मनियन्त्रण न होनेसे उनमें शोषणकी मात्रा बढ़ गयी। फिर भी उनके रेलों, तारों, यन्त्रोंके कारण भौतिक दृष्टिसे पिछड़े हुए देशोंकी भी प्रगति हुई। जडयन्त्रवादमें यदि शासक सावधान एव नियन्त्रित होकर राज्य- सञ्चालन करता है तो लाभ होता है, अन्यथा नुकसान तो होता ही है। इसी तरह धर्मनियन्त्रित ईमानदार शासन होता है, तभी यान्त्रिक आविष्कार प्रगतिका साधन होता है, अन्यथा विश्व-संहार ध्रुव है। सावधान न रहनेपर अपने ही द्वारा आविष्कृत विद्युत् या यन्त्रके द्वारा वैज्ञानिक अपनी ही हत्या कर बैठता है। इस तरह विज्ञानका, यन्त्रोंका फैलाव नवीन साधनों एव वस्तुओंका विस्तार लाभदायक भी हुआ। परंतु उनपर धर्मनियन्त्रण न रहनेसे उनमें जन-शोषण युद्ध आदि अनर्थ भी हुए। विज्ञानपर धर्मका नियन्त्रण ठीक होनेसे अनर्थ- अंश दूर हो जाता है। धर्मनियन्त्रित शासनतन्त्रमें महती स्वतन्त्रता एव आत्मनिर्भरताके लिये तथा बेकारीकी समस्या हटानेके लिये ही महायन्त्रोंके निर्माणपर प्रतिबन्ध लगाया जाता है। इससे बाजारों, कोयला, पेट्रोल तथा कच्चे मालोंको प्राप्त करनेके लिये होनेवाले युद्धों, संहारोंपर भी रोक लग जाती है। अतः रामराज्यमें महायन्त्रोंके निर्माणपर प्रतिबन्ध भी आवश्यक होगा ही। परमाणुबम, हाइड्रोजनबम एक महत्त्वपूर्ण खोज होनेपर भी जन-हितकी दृष्टिसे उसपर प्रतिबन्ध आवश्यक समझा जा रहा है। उसी तरह महायन्त्रोंका आविष्कार महत्त्वपूर्ण होनेपर मानवशान्ति, सदाचार एव धर्मकी रक्षाके लिये महायन्त्रोंपर प्रतिबन्ध अत्यावश्यक है। यदि रामराज्यके इन सिद्धान्तोंको अपनाया गया होता तो गत दोनों महायुद्ध भी न होते और संसारकी प्रगति भी अधिकाधिक हुई होती। लेनिनने पूँजीवादके तीन स्तर बताये हैं—(१) व्यापारिक, (२) व्यावसायिक और (३) महाजनी। उसके अनुसार आधुनिक युग महाजनी पूँजीवादका है। इसमें यूरोप और अमेरिकाके पूँजीपति पिछड़े हुए देशोंमें पूँजी लगाते हैं और उस पूँजीके सूदद्वारा धन एकत्रित करते हैं। पूँजीसे तात्पर्य बड़े-बड़े कारखानोंसे है। इनका सञ्चालन उपनिवेशों या अन्य देशोंके पूँजीपतियोंद्वारा होता है। कारखानोंके मूलका सूद साम्राज्यवादी पूँजीपतिको मिलता है। लेनिनके अनुसार साम्राज्यवादी स्तर पूँजीवादकी मरणासन्न स्थिति है। इसमें अन्तर्विरोध चरमसीमामें पहुँचा होता है। पहला विरोध है पूँजी और श्रमके बीच। उद्योगप्रधान देशोंमें पूँजीवादियोंके ट्रस्टों, सिंडिकेटों, बैंकों, बैंकमालिकोंका देशकी पूँजी और व्यवसायोंपर पूरा प्रभुत्व रहता है। इस स्थितिमें

श्रमिकोंका वैधानिक सङ्घर्ष स्थिति सुधारनेके लिये पर्याप्त नहीं होता । इजारेदार बैंकशाह वैधानिक सङ्घर्षसे प्रभावित होकर श्रमिकोंकी दशा सुधारनेके लिये प्रस्तुत नहीं हो सकते । ( यहाँ वैधानिक विरोधका तात्पर्य है—मजदूर-सभाओ, सहयोगसमितियो एवं संसदीय दलोंके आन्दोलनसे ) अतः मजदूरोंको क्रान्तिका मार्ग अपनाना पडता है । क्रान्तिद्वारा पूँजीवादका अन्त करनेसे ही श्रमिकोंकी दशा सुधर सकती है । “दूसरा विरोध बैंकशाहोंके विभिन्न गुटों तथा साम्राज्यवादी शक्तियोंके बीच होता है । यह विरोध विभिन्न देशोंके पूँजीवादके असमान विकासके कारण होता है । यूरोपमे सर्वप्रथम इंगलैंडमे औद्योगिक क्रान्ति हुई । फ्रांसने इस क्षेत्रमे उसीका अनुसरण किया । १९ वीं सदीमे कच्चे मालके स्रोत एव तैयार मालके खपतके लिये बाजारोंकी आवश्यकता पड़ी । तब उन्होंने दुनियामे साम्राज्य स्थापित किया । तबतक जर्मनी भी औद्योगिक क्षेत्रमें अग्रसर हुआ । उसे भी साम्राज्यकी अपेक्षा हुई, किंतु साम्राज्य-स्थापनाके क्षेत्रमे इंग्लैंडका एकाधिकार था । फलतः साम्राज्य-स्थापनामे पिछडा हुआ मध्य यूरोप पुराने साम्राज्यवादी फ्रांस एवं इंग्लैंडको युद्धद्वारा पराजित करके ही साम्राज्यमें हिस्सा बँटा सकता था । इसीलिये जर्मनी, इटली तथा जापानने युद्धके लिये तैयारियाँ कीं और साम्राज्यवादी लोगोंमें भी अस्थायीरूपसे दो शिविर हो गये । युद्धों, महायुद्धोंद्वारा किसीका विनाश होता है, किसीका आधिपत्य होता है । फिर भी साम्राज्यवादी सङ्घर्षका अन्त नहीं होता, किंतु आन्तरिक विरोध हावी रहता है । तीसरा विरोध सभ्य कहे जानेवाले साम्राज्यवादी राष्ट्रों और पराधीन राष्ट्रोंके बीच होता है । साम्राज्यवादी निर्बल राष्ट्रोंका शोषण करते रहते हैं । साम्राज्यवादी शोषणको सङ्घटित करनेके लिये पराधीन देशोमे रेल-तार आदिके कारखाने खोलते हैं । जनता इनसे मुक्त होनेकी इच्छासे इनके विरुद्ध मोर्चा स्थापित करती है । समयकी प्रगतिसे शोषण बढता है । राष्ट्रीय सङ्घर्ष भीषण बन जाता है । साम्राज्यवादी देशोंके भी शोषित श्रमिकोंकी सहानुभूति पराधीन देशोंके शोषितोंके साथ होती है । बन्धु-भावसे प्रेरित होकर दोनो साम्राज्य- वादियोंके विरुद्ध बगावत करते हैं ।” यह हम कई बार कह चुके हैं कि घटनाएँ ससारमें भली भी होती हैं और बुरी भी । अच्छी घटनाओंका अनुसरण उचित है, बुरी घटनाओंका नहीं । व्यवहारके लिये विधानका ही उपयोग किया जाता है, इतिहासका नहीं । जगद्गुरु भारतकी दृष्टिसे सम्राट् एव सार्वभौमका अभिप्राय देशके केन्द्रीय शासन एवं विश्व-सरकारसे होता था । छोटी-छोटी शक्तियाँ परस्पर टकराकर अपने और संसारके अकल्याणका कारण बनती हैं । इसलिये एक परम समर्थ

मार्क्सकीय अर्थ-व्यवस्था ३८५ धर्मनियन्त्रित शासकका नियन्त्रण समाजपर होना आवश्यक होता है। जिसने राजसूययज्ञ किया हो, जो राजमण्डलका ईश्वर हो और जो अपनी आज्ञासे राजाओंका भी नियन्त्रण करता हो, वही सम्राट् है— येनेष्टं राजसूयेन मण्डलस्येश्वरोच यः। शास्ति यश्चाज्ञया राज्ञः स सम्राट् ॥ ( अमरकोष, २।८।३ ) 'सर्वभूमेरीश्वरः सार्वभौमः'—अखण्ड भूमण्डलका धर्मनियन्त्रित शासक 'सार्वभौम' होता है। व्यापारका कार्य वैश्यका था सम्राट्का नहीं। फिर भी योरप आदि देशोंमें पूँजीपति व्यापारियोंसे शासन प्रभावित रहता था, अतः पूँजीवाद और साम्राज्यवादका अभेद सम्बन्ध माना जाने लगा। आधुनिक सभ्यताके विस्तारमें ( जिसका मार्क्सवादी बड़ा महत्त्व मानते हैं ) इस साम्राज्य- वादका प्रमुख हाथ है। इसी कारण संसारके कोने-कोनेमें रेल, तार, रेडियो,- वायुयान, कल-कारखानोंका विस्तार हुआ। यह पूँजीवाद एवं साम्राज्यवाद यदि धर्मनियन्त्रित, ईमानदार होता तो उससे संसारका कल्याण ही होता, अकल्याण नहीं। धर्म-नियन्त्रण न होनेसे अथवा धर्मकी ओटमें स्वार्थ-साधकोंकी प्रधानता होनेसे लाभके साथ-साथ शोषण भी चलता रहता है। इसी प्रकार धर्महीन स्वार्थ साधक आन्दोलनकारियोंद्वारा संचालित आन्दोलन भी संघर्ष, वैमनस्य एवं सर्वनाशका ही कारण होता है। भारतके समान वैध अहिंसात्मक आन्दोलन- द्वारा मजदूरोंकी दशा सुधारी जा सकती है। परंतु मार्क्सवादियोंको तो दशा सुधारनेके बहाने विश्वमें सर्वहाराके अधिनायकत्वके नामपर कुछ ताना- शाहोंका राज्य बनाना अभीष्ट है। पूँजीवादके कारण संसार एक इकाई बन जाता है। यातायात यन्त्रोंद्वारा पूँजीपति संसारको अपने मालका बाजार बना लेता है। पिछड़े हुए देशोंमें भी प्राचीन अर्थतन्त्र नष्ट होकर नयी व्यवस्था चल पडती है। यह परिवर्तन व्यक्तिकी इच्छासे नहीं, किंतु परिस्थितिके अनुसार होता है। इस कारण ही पूँजीवादके विरुद्ध श्रमिक वर्गका अधिक संख्यामें एकत्रित होना सम्भव होता है। मार्क्सने पूँजीवादको आवश्यक ही नहीं किंतु सर्वहाराके अधिनायकत्वके समान ही अनिवार्य भी बताया है। आमतौरपर गुण-वर्णन ग्रहणके लिये होता है और दोष-वर्णन परित्यागके लिये। यही गुण-दोष-वर्णनका प्रयोजन है— ताते कछु गुन दोष बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने॥ जो पूँजीवाद इतना महत्त्वपूर्ण आवश्यक एवं अनिवार्य वस्तु है, जिसके बिना साम्यवादका मूलमन्त्र पूर्ण यन्त्रीकरण ही सम्भव नहीं, उसके दोषोंको मा० रा० २५—