भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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३७३ मार्क्सवाद और रामराज्य पूर्वोक्त विवेचनसे यह स्पष्ट है कि शासनसार राजा, करद राजा, गुजारेदार, इमानदार या दानदार आदि भूमिके अधिकारी कई ढंगके होते हैं । करद राजा तथा सामन्त आदि प्रजासे कर लेते हैं और स्वयं भी राजाको कर देते हैं । यही लगान मालगुजारी आदि रूपसे प्रसिद्ध होता है । जैसे मनुष्य अपनी कमाईका हकदार होता है, वैसे ही पिता-पितामह आदिकी कमाईका भी हकदार होता है । पिता-पितामह आदिकी सम्पत्ति पुत्रादिको दायके रूपमें प्राप्त होती है—'दीयते पित्रा पुत्रेभ्यः स्वस्य यद्धनं तद्दायम्'—पिताद्वारा अपने पुत्रको जो धन दिया जाता है वह दाय कहलाता है । उसमें ज्येष्ठ-कनिष्ठ आदि भेदसे पुत्रोंको भिन्न-भिन्नरूपसे दाय मिलता है । विद्या एवं कर्ममें संलग्नको अन्य पुत्रोंसे अधिक मिलना चाहिये—'विद्याकर्मरतस्तेषामधिकं लब्धुमर्हति' (बृह० स्मृ० गा० २६ । १९) । यह भी एक पक्ष है कि ज्येष्ठ ही पिताके धनका मालिक हो, शेष भ्राता पितृतुल्य मानकर उसीका अनुसरण करे— ज्येष्ठ एव तु गृह्णीयात् पित्र्यं धनमशेषतः । शेषांस्तमुपजीवेयुर्यथैव पितर तथा ॥ ( मनु० ९ । १०५ ) कम्युनिष्टोंके सम्पूर्ण तर्कोंका एकमात्र आधार है—बाप दादाकी सम्पत्तिमे पुत्रादिकोंका बपौती अधिकार न मानना । परंतु यह तर्कों, शास्त्रों तथा व्यवहार एवं परम्पराओसे सर्वथा विरुद्ध है । व्यक्तिगत भूमि, सम्पत्ति, खानों- कारखानोको न माननेसे सब कामोका अधिकारी काम करनेवाला ही हो सकता है । परंतु दूसरोके खेतमे खेती करने, दूसरोकी पूँजीसे वस्तु बनाने, दूसरोके वृक्षोंसे फल तोडने वा संग्रह करनेपर भी फललाभका भागी केवल काम करनेवाला नहीं हो सकता । उसे परिश्रमका फल कुछ वेतन अवश्य मिल सकता है । हाँ, यदि वह खेतको खरीदकर या पूँजी उधार लेकर वस्तु बनाता है, वृक्षोको खरीदकर या ठेकापर ले लेता है, तब अवश्य वह लाभका भागी हो सकता है । पिछले प्रकरणोंमे भूमि-सम्पत्ति आदिपर व्यक्तिगत वैध अधिकार दिखलाया जा चुका है । मजदूरोके श्रममे जैसे दो भेद निरर्थक एवं निराधार हैं, वैसे ही किसानोकी भी दो प्रकार श्रमकल्पना निरर्थक एवं निराधार है । खेती करके अन्न आदि पैदा करनेका परिश्रम अभिन्न ही है । वह उसमेसे ही कुछ अंगसे कर चुकाता है, कुछ अगसे अपनी जीविका चलाता है । हाँ, कर अधिक होनेकी शिकायत हो सकती है । उसके औचित्यका निर्णय निष्पक्ष सरकार या न्यायालय अथवा पञ्चायतद्वारा किया जाना उचित हो सकता है । पैदावार किसानसे छीनी नहीं जाती, किंतु भूमि-मालिक और किसानके समझौतेसे स्वयं किमान ही करके रूपमें देता है । किसानने कर देना