भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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"खेतीकी सम्पूर्ण भूमिपर कर होता है। यह कर या लगान कहीं अधिक होता है कहीं कम। यदि भूमिके सबमे कम करको 'आवश्यक कर' (एब्सोल्यूट रेन्ट) मान लिया जाय तो अधिक उपजाऊ या शहरके समीपकी भूमिपर जो अधिक कर वसूल किया जाता है, उसे 'विशेष कर' (डिफ्रेन्सल रेन्ट) कहा जायगा। भूमिके प्रत्येक टुकड़ेपर कुछ-न-कुछ कर होनेका कारण यह है कि पैदावारके औद्योगिक साधनोंको जिस प्रकार शहरसे दूर आवश्यकतानुसार बढ़ाया जा सकता है, नजदीक इस प्रकार नहीं बढ़ाया जा सकता। उन उपजाऊ या शहरसे दूरकी भूमिको छोड़कर उपजाऊ और शहरकी भूमि आवश्यकतानुसार तैयार नहीं की जा सकती। इसलिये भूमिके किसी भी टुकड़ेको जीतनेकी आवश्यकता होनेपर उसपर कर देना ही पड़ेगा। जो भूमि अधिक उपजाऊ होगी या शहरके अधिक समीप होगी, जहाँ सिंचाई आसानीसे हो सके, ऐसी भूमिपर विशेष लगान या कर वसूल किया जाता है। इस प्रकारकी अच्छी जमीनपर जो विशेष कर या लगान वसूल किया जाता है, वह भूमिके मालिकके जेबमें ही चला जाता है। परंतु भूमिको अच्छी बनाने या भूमिके शहर या जलके समीप होनेमे भूमिके मालिकको कुछ परिश्रम नहीं करना पड़ता। "सभी पूँजीवादी देशोंमे भूमिके दो मालिक होते हैं। प्रथम तो सरकार, जो खेतीके काम आनेवाले भूमिके प्रत्येक टुकड़ेपर कर या मालगुजारी लगाती है। दूसरा मालिक होता है भूमिक्षा मालिक समझा जानेवाला व्यक्ति, जो भूमिका कर सरकारको अदा कर उसे किसानसे जुतवाता है और अपना लगान किसानसे वसूल करता है। सरकारी कर और जमींदारी लगान अदा किये जाते हैं खेतीकी उपजसे, परंतु खेतीकी उपजमें न तो जमींदार न सरकार ही कुछ परिश्रम करती है। परिश्रम सब करता है किसान और किसानके परिश्रमसे की गयी पैदावारमे जमींदार और सरकारका भाग निकाला जाता है। यदि किसानके परिश्रमको बाँटकर देखा जाय तो उसके दो भाग हो जाते हैं। एक भाग वह जिसे वह स्वयं खर्च करता है ताकि उसके शरीरमे परिश्रमकी शक्ति कायम रह सके और दूसरा भाग वह, जिसे भूमिक मालिक किसानसे ले लेता है और आगे सरकारको कर देता है। किसान अपनी सम्पूर्ण उपज अपने लिये पैदा करता है। यदि किसान जितना अपने और अपने परिवारके लिये खर्च करता है उतना ही पैदा करे तो उसे बहुत कम स्थानपर खेती करनी होगी और बहुत कम परिश्रम करना होगा। वर्तमान व्यवस्थामे किसानको जितना वह खर्च करता है, उससे बहुत अधिक पैदा करना पड़ता है। मजदूरकी अवस्थाके साथ तुलना करनेपर हम कहेंगे कि किसानको काफी मात्रामे अतिरिक्त या फालतू पैदावार करनी पडती है, जो जमींदार और सरकारके व्यवहारमें आती है।"