भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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३७२ मार्क्सवाद और रामराज्य तस्मादरिषड्वर्गत्यागेनेन्द्रियजयं कुर्वीत । एवं वश्येन्द्रियः परस्त्रीद्रव्य- हिंसाश्च वर्जयेत् । धर्मार्थाविरोधेन कामं सेवेत । संस्थाया धर्मशास्त्रेण शास्त्रं वा व्यावहारिकम् । यस्मिन्नर्थे विरुध्येत धर्मेणार्थं विनिर्णयेत् ॥ (कौ० अर्थ० १ । ७ । १, ३, ६; ३ । १५६) इसी प्रकार रत्न, लवणकी उत्पत्तिपर खानका खर्च काटकर आधा छोड़ना चाहिये । कर्षकको अधिक लाभ हो तो उसके अनुसार यथायोग्य तृतीय, पञ्चम, सप्तम या दशम भाग ग्रहण करना चाहिये । बकरी, भेड, भैस, घोडाकी वृद्धिमें अष्टमांश ग्रहण करना चाहिये । भैस, बकरीके दूधका सोलहवाँ भाग ग्रहण करना चाहिये । गाय आदिका दूध, अन्न, फल जो कुटुम्बके खाने-पीने लायक ही हो, उससे कर नहीं लेना चाहिये । उपभोगके लिये खरीदे गये अन्न- वस्त्रोंपर भी कर नहीं होना चाहिये—'गवादिदुग्धान्नफलात् कुटुम्बार्थाद्धरेन्नृपः । उपभोगो धान्यवस्त्रक्रेतृत्तो नाहरेत्फलम्॥' जहाँ राजतन्त्र शासन नहीं है वहाँ भी संसद्, कार्यपालिका, राष्ट्रपति या प्रधान मन्त्रियोंको भी धर्मनियन्त्रित होकर ही शास्त्रो तथा परम्पराके अनुसार कार्य करना चाहिये । प्रजा-पोषणके अनुकूल कार्य करना चाहिये । शास्त्रोकी दृष्टिमें भौतिक भावनाओद्वारा युगप्रवर्तन नहीं होता, किन्तु धर्मात्मा, पराक्रमी, बुद्धिमान् राजासे ही युगप्रवर्तन होता है । राजा ही कालका कारण होता है, सत् तथा असत् गुणोका भी प्रवर्तक राजा होता है । कठोरता एवं दण्डके द्वारा राजा ही प्रजाको धर्ममें प्रतिष्ठित करता है । अधर्मके कारण वेन आदि राजा नष्ट हो गये । धर्मसे पृथुकी वृद्धि हुई, अतः धर्मको पुरस्कृत करके ही राजाको काम करना चाहिये— कालस्य कारणं राजा सदसत्कर्मणस्त्वतः । स्वक्रौर्योद्यतदण्डाभ्यां स्वधर्मे स्थापयेत्प्रजाः ॥ वेनो नष्टस्त्वधर्मेण पृथुर्वृद्धस्तु धर्मतः । तस्माद्धर्मं पुरस्कृत्य यतेतार्थाय पार्थिवः ॥ (शुक्र० १, ६०, ६९) राजाका कर्तव्य है कि दण्ड, विष्टि करके बोझसे सकटग्रस्त कृषिकी रक्षा करे । डाकू, सर्प तथा दूसरी विषैली वस्तुओ तथा व्याधियोसे पशुओंको बचाये । अपने प्रिय कर्मचारियों, सीमारक्षकों, डाकू तथा बनैले पशुओसे क्षीयमाण व्यापारियों- की रक्षा करे । कौ० अर्थ० (२ । १ । ४५) मात्स्यन्यायसे पीड़ित प्रजाने सर्वप्रथम वैवस्वत मनुको राजा बनाया तथा धान्यका छठा एव पुण्यका बीसवाँ भाग उस राजाको देना निश्चित किया था । मार्क्सवादी कहते हैं कि 'भूमिपर वसूल किये जानेवाले करद्वारा ही भूमिके मालिककी आमदनी होती है और इसी करद्वारा खेतीके लिये मेहनत करनेवाले किसानका शोषण होता है। इसलिये करके अनेक रूपों और भेदोंको समझ लेना जरूरी है ।