मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 688, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वीकार करके ही खेती करना आरम्भ किया है। जैसे कोई कम्युनिस्ट राज्य ही किसी राज्यसे कोई भूमि या कारखाना अमुक वस्तु देनेके शर्तपर लिया हो तो वह अपनी शर्तके अनुसार देगा ही, उस देनेको लेनेवालेद्वारा छिनना नहीं कहा जायगा। इसी तरह यह भी समझ लेना चाहिये कि खेतीमें उत्पन्न होनेवाली वस्तु भी केवल श्रमका फल नहीं है, किंतु श्रमविशिष्ट भूमिका ही फल है। अतः कुछ फल श्रमवालेको मिलना चाहिये और कुछ भूमिपतिको भी अवश्य मिलना चाहिये। यदि किसानोको व्यक्तिगत खेती करनेकी छूट होगी, तब तो कम्युनिस्ट राज्योंको भी राज्य-व्यवस्थाके लिये भूमिसे कुछ- न-कुछ कर लेना ही पड़ेगा। यदि वहाँ व्यक्तिगत खेती न होकर सरकारी ही खेती होगी, तब भी राज्यव्यवस्थाके लिये कुछ-न-कुछ अंश निकालना ही पडेगा। परिश्रमवालोंको ही सब फल दे देना सम्भव नहीं, क्योकि फलमें परिश्रमकी अपेक्षा भूमि और बीजका प्रमुख हाथ है। परिश्रम और भूमिकी अपेक्षा भी भूमिका अधिक महत्त्व है। एक-एक बीजके बदले सैकडो-सैकडो बीज भूमिके अंशसे बनते हैं। कही-कही जल और खाद आदिका भी दाम देना पडता है, क्योकि उनका भी उत्पादनमे हाथ होता है। इन वस्तुस्थितियोको समझकर ही किसान सहर्ष कर देता है और वह छीना-झपटीके कम्युनिस्ट आन्दोलनसे पिण्ड छुडानेके लिये भी प्रयत्न करता है। अपने देश या विदेशके लिये कच्चा माल दाम लेकर ही किसान देता है। दामके औचित्य-अनौचित्यका निष्पक्षसे विचार करनेके लिये तो सदा ही द्वार खुला रहना चाहिये। भूमिपर कर घटने-बढनेकी व्यवस्था लाभपर ही निर्भर करती है। यदि कल-कारखानोके लिये किसी वस्तुकी अधिक माँग हुई तो उस वस्तुका दाम भी अधिक बढेगा। तब जैसे श्रमका दाम बढ जायगा वैसे ही भूमिका भी दाम बढ जाना उचित ही है। हाँ, जहाँ श्रमकी अधिकतासे ही उत्पादन बढा है, जैसे उसी पडोसकी, उसी ढंगकी भूमिसे परिश्रम कम होनेसे कम फल हुआ, परिश्रम अधिक होनेसे प्रकृत भूमिमे उत्पादन अधिक हुआ है, तो उस अधिक फलको परिश्रमका ही फल मानना चाहिये। यदि सिचाईका प्रबन्ध भूमिके मालिकने किया है तो अवश्य ही उसके अनुपातसे भूमिका कर बढना उचित है। यदि किसानने ही कूप आदि बनाये हैं तो उसका फल किसानको ही प्रधानरूपसे मिलना चाहिये। सरकारी विभागमे या किसी अन्य ठेकेदारने अगर नहर आदिका प्रबन्ध किया है तो वह सिचाई, कर आदि भी लेगा। फिर भी कर देनेवालेको ही उसका फल भोगना उचित है। धर्मनियन्त्रित शासनका यह कर्तव्य है कि भूमिपतिकी आयके पाँचवे अगसे, जो कि अर्थके ही लिये है, तथा अन्य सहायताओसे