भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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उसकी पैदावारकी शक्ति बढ़ जायगी । उसे अपनी मेहनतका अधिक फल मिलेगा, परंतु किसानोके मशीनसे मेहनत न करनेपर उनकी पैदावारकी शक्ति न बढ़ेगी और उन्हें उनकी मेहनतका फल कम मिलेगा । इस प्रकार खेती और उद्योग- धंधोंकी पैदावारका विनिमय समानरूपमें न हो सकेगा । "पूँजीवादी लोग खेतीको बड़े परिमाणमें बड़ी मशीनोसे करनेके पक्षमें इसी- लिये नहीं हैं कि भूमिके छोटे-छोटे टुकडोंपर मशीनोंका व्यवहार नहीं हो सकता । उसके लिये मीलों लंबे खेत चाहिये । ऐसे खेत बनानेमें अनेक जमींदारोंकी मिल्कियत मिट जायगी । उद्योग-धंधोंमें जिस प्रकार पूँजीपति निजी पूँजीको बढ़ा सकता है, जमींदार अपनी भूमिको नहीं बढ़ा सकता । बड़े परिमाणपर खेती करनेके लिये या तो जमींदारोंका अधिकार भूमिपर अस्वीकार करना होगा या सैकडों जमींदारोंकी भूमिको एकत्रमें मिलाकर उसे समाजके नियन्त्रणमें रखना होगा । मार्क्सवादियोका कहना है कि खेतीको बड़े परिमाणपर करनेके सम्बन्धमें जितने भी एतराज किये जाते हैं, रूसके अनुभवसे वे सब निराधार प्रमाणित हो गये हैं । "खेतीको संयुक्त रूपसे बड़े परिमाणपर करनेसे ही उसमें ट्रैक्टर आदि बड़ी- बड़ी मशीनों और सिंचाईका प्रबन्ध हो सकेगा । खेतीके सुधारके लिये बड़े परिमाणपर कर्जा मिल सकेगा और खेतीकी पैदावारको बेचनेवालोंमे परस्पर मुकाबला न होनेपर उसे ठीक समय और पूरे मूल्यमें बेचा जा सकेगा । खेतीकी पैदावारके विनिमयका काम संयुक्तरूपमे और बडे परिमाणमें होनेपर उसे व्यवहारमें लानेवाली जनतातक पहुँचानेका काम व्यापारियो और साहूकारोके हाथ न रह सकेगा । किसान अपने प्रतिनिधि सगठनद्वारा उसे स्वयं कर लेगा, इस तरह किसानके श्रमका वह बडा भाग, जो इन व्यापारियोकी जेबमें जाता है, किसानके उपयोगमें आयेगा । खेतीके बड़े परिमाणपर और संयुक्तरूपमे करनेपर किसानकी मानसिक उन्नतिका भी अवसर रहेगा । मशीनका व्यवहार करनेसे वह आज दिनकी तरह दिन-रात भूमिसे सिर मारनेके लिये विवश न होगा, बल्कि उसे शिक्षा और संस्कृति प्राप्त करनेके लिये समय मिल सकेगा और किसानोके परस्पर सहयोगसे काम करनेपर उनमें श्रेणी-भावना और श्रेणी-चेतना भी उत्पन्न हो सकेगी, जिसका उनमें न होना उनके शोषणको पशुताकी सीमातक पहुँचा देता है । मशीनोंका व्यवहार खेतीमें होनेसे ही किसान, जो वास्तवमें मिल-मजदूरकी तरह खेत-मजदूर है, औद्योगिक धंधोंमे काम करनेवाले मजदूरके समान उन्नति कर सकेगा ।" मार्क्सवादियोका अन्तर्विरोधका रोग सर्वत्र दिखायी देता है । इसीसे उन्हें खेतीमे भी अन्तर्विरोध दिखायी देता है । धर्मनियन्त्रित र नराज्यवादी शासन आर्थिक सन्तुलनकी दृष्टिसे करोंमें संशोधन कर सकेगा । अतः न किसानको भूमि