भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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३७८ मार्क्सवाद और रामराज्य सामूहिक कामोके प्रति ईमानदारोकी भी सामान्य ही प्रवृत्ति होती है । शक्तिचोरोका तो कहना ही क्या है ? प्रसिद्ध है—'न गणस्याग्रतो गच्छेत् सिद्धे कार्ये समं फलम् । यदि कार्यविपत्तिः स्यान्मुखरस्तत्र हन्यते ॥' (हितो० १।२९) कल्याण चाहनेवालेको गणका अग्रगामी नही बनना चाहिये, क्योकि कार्य सिद्ध होगा तो समान ही फल मिलेगा और यदि कार्यमे बाधा पड़ी तो मुखियाको ही सकटमें पड़ना होगा । इन्ही कारणोसे अक्टूबर ( १९५५ ) के किसी अङ्कमें 'प्रवदा' ने कुछ रूसी मन्त्रियोकी लापरवाहीकी शिकायत की थी । इसके अतिरिक्त स्वतन्त्रता भी कोई वस्तु है। अपने इच्छानुसार अन्न, गन्ना, विविध फल आदि पैदा करना, फिर उसका अपने इच्छानुसार उपयोग करना सरकारी खेतीमें सम्भव नही । अतः कोई भी किसान उसे पसन्द नहीं कर सकता । अधिक क्या, पक्षी भी स्वतन्त्रता- पूर्वक खट्टे फल खाना, खारा पानी पीकर जीवन व्यतीत करना ही ठीक मानता है। वह सुवर्ण-पिंजरमे रहकर मधुर फल खाकर भी पराधीनता पसन्द नही करता, इसी तरह जमीदारो, किसानोकी भूमिका अपहरण भी व्यक्तिगत वैध-स्वत्वके विपरीत ही है। व्यक्तिगत उत्पादनमे भी प्रतियोगिता आदिद्वारा विकासमे सुविधा होती है । रामराज्यवादी तो बड़े-बड़े उद्योग-धंधोको भी विकेन्द्रित करनेके ही पक्षमे हैं । खेतीका विकेन्द्रीकरण उद्योग स्वालम्बनका प्रतीक है । बड़े परिमाणमें खेती मार्क्सके अनुसार पूँजीवादद्वारा उद्योग-धंधोके विकास और पैदावारकी अन्य वृद्धिका एक रहस्य है । पैदावारको एक स्थानपर बड़े परिमाणमे करनेपर ही उसमें आधुनिक ढंगकी बड़ी मशीनोंका व्यवहार हो सकता है, खर्च घट सकता है और मनुष्यकी पैदावारकी शक्ति बढ़ सकती है । मनुष्य जितनी ही विकसित और बडी मशीनपर काम करेगा, उसी परिमाणमें उसकी पैदावारकी शक्ति बढ़ सकेगी । उद्योग-धंधोके क्षेत्रमे बड़े परिमाणमे पैदावार समाजकी पैदावार-शक्तिको बढ़ाती है, इस विषयमें किसीको भी संदेह नहीं। परंतु खेतीके विषयमे पूँजीपतियोकी राय इससे भिन्न है । पूँजीवादी-प्रणालीमें विश्वास रखनेवालोका कहना है कि बड़े परिमाणमे खेती पैदावारको बढानेकी अपेक्षा घटायेगी । उसके लिये दलीलके तौरपर कहा जाता है कि खेतीको बड़े परिमाणमे करनेसे किसानकी भूमिके प्रति वह सहानुभूति और प्रेम नही रहेगा, जो छोटे परिमाणमे खेती करनेपर होता है ।' परंतु मार्क्सवादियोका विश्वास है कि 'और दूसरे उद्योगोकी तरह खेती भी बड़े परिमाणमें ही होनी चाहिये । इसके बिना न तो खेतीकी पैदावार ही उचित मात्रामे बढ़ सकती है, न समाजमें ही खेतीकी और उद्योग-धंधोकी पैदावारका बटवारा समान रूपसे हो सकता है और न किसानोकी ही आर्थिक अवस्था सुधर सकती है। "यदि उद्योग-धंधोसे काम करनेवाली श्रेणी मशीनसे पैदावार करेगी तो