भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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३८० मार्क्सवाद और रामराज्य

छोडनेकी आवश्यकता पडेगी और न भूमि पूँजीपतियोंके ही हाथ जायगी । विकेन्द्रीकरण सरकारी लक्ष्य होनेपर पूँजी और भूमि सभीके केन्द्रीकरणपर प्रतिबन्ध रहेगा । सरकारीकरणके यन्त्रमे सबका खात्मा हो जानेके खतरेकी अपेक्षा सापेक्ष एवं सीमित नियन्त्रण सबको ही सुखकर होगा । रूसका अनुभव प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता । रूसी प्रचारद्वारा भले ही रूस स्वर्ग बन गया हो, परन्तु वस्तुस्थिति इसके सर्वथा विपरीत है । मशीनोके अधिक व्यवहार करनेसे चेतन प्राणी भी स्वय एक जड मशीन बन जाता है । पराधीनता भी बढती जाती है—'सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्' (मनु) —पराधीनता ही सब दुःख है, स्वाधीनता ही सब सुख है । मशीनोद्वारा सब कामसे छुट्टी पाकर मनुष्य शिक्षा आदि प्राप्त करनेमे समय लगायेगा । पर वह भोग- विलासमे समय न गँवायेगा—यह कौन कह सकता है ? फिर शिक्षा-सस्कृतिके लिये भी तो कोई मशीन निकाली ही जाती है और तब बेकारी भी और अधिक बढ सकती है । श्रेणी-चेतना यदि सङ्घर्षके लिये ही अपेक्षित होगी तो कोई भी बुद्धिमान् सङ्घर्षको हानिकारक ही समझेगा । समझौता, सामञ्जस्य, समन्वय ही समाजके लिये अपेक्षित है । धर्मनियन्त्रित रामराज्य तो मुख्य रूपसे महायन्त्रोपर प्रतिबन्ध लगानेके पक्षमे ही है । जबतक इसमे विलम्ब है तबतक अन्य औद्योगिक विकास एवं खेतीके विकासका संतुलन रखा जायगा । सरकारीकरण होनेके पहले किसान अपनी जमीनमे खेती करनेमे स्वतन्त्र है । मजदूर तो वह तब बनेगा जब सब खेतोका सरकारीकरण हो जायगा । इसीलिये भारतका वर्तमान किसान-मण्डल भूमि-सम्बन्धी सरकारी नीतिसे चिन्तित है । वह सरकारीकरण नीतिका विरोध करनेके लिये प्रस्तुत है । कम्युनिष्टोके तर्क वस्तुस्थितिके विरुद्ध हैं । किसानोका प्रतिनिधि-संगठन भी कम्युनिज्ममे वास्तविक नहीं हो पाता; क्योकि वहाँ स्वतन्त्र मत व्यक्त करना, स्वतन्त्र लेख प्रकाश करने आदिकी किसी प्रकारकी सुविधा नहीं है । कम्युनिष्ट सरकार जैसा चाहती है, वैसे ही प्रतिनिधि-संगठनका नाटक किसानोको भी करना पडेगा । फिर भी अधिनायकत्व मजदूरोँका ही होगा, किसानोका नही । मार्क्सवादी पूँजीवादके दोषोका वर्णन करते हुए मशीनोपर लाञ्छन लगाते हैं कि 'मशीनोके कारण ही अनेक प्रकारकी बेकारी फैली, स्वाधीन उद्योग-धंधे नष्ट हो गये । कारीगरोको मजदूर बना डाला गया', किंतु स्वय कम्युनिष्ट उन मशीनोका मोह नहीं छोड सकते । समान वितरणके नामपर मशीनोके दोष छिपानेका प्रयत्न करते हैं, रही-सही स्वाधीनताको समाप्त करके व्यक्तियोको तानाशाही शासनका नगण्य कल-पुर्जा बना देना चाहते ह ।