मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६८ मार्क्सवाद और रामराज्य है। एतावता अर्थका मुख्य फल कामोपभोग नहीं, किंतु धर्म ही अर्थका फल है— नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः । ( श्रीमद्भा० १ । २ । ९ ) अर्थका मूल राज्य है, परंतु उसका भी मूल इन्द्रिय-जय ही है। उसका भी मूल विनय, विनयके लिये वृद्ध-सेवा और उसके लिये भी ज्ञान-सम्पादन आवश्यक समझा जाता है। प्रत्येक कार्यके लिये उन्होने समकक्ष विचारकका ही सम्मान आवश्यक समझा है। निर्मत्सर होकर ही विचार करना आवश्यक बताया है। हर कार्यमे लौकिक प्रयत्नके अतिरिक्त दैवका भी हाथ रहता है, अतः दैवकी अनुकूलता बिना सब प्रयत्न व्यर्थ होते हैं। दैव बिना सुसाध्य कार्य भी दुःसाध्य होते हैं। देवताराधनसे दैवप्रतिकूलता दूर की जाती है। सत्पुरुषोंका मत अतिक्रमणीय नही होता। सुवृत्तता शत्रुको भी जीत लेती है, किसीका अपमान नहीं करना चाहिये। फलद्वारा प्रजानुराग सूचित होता है*। सारा ऐश्वर्य प्रज्ञाका ही फल है, धैर्यहीन प्राणी महान् ऐश्वर्यको प्राप्त करके भी नष्ट हो जाता है। दया धर्मकी जन्मभूमि है, अधर्मबुद्धि आत्मनाशकी सूचना है। भले ही वस्तु सब अनित्य ही हो तथापि अपनेको अमर ही मानकर अर्थार्जन करना चाहिये†। पर-द्रव्यमें राग और उसका अपहरण आत्मनाशका मूल है। व्यवहारमे पक्षपात न करना चाहिये। परायत्त वस्तुमे उत्कण्ठा न करनी चाहिये। विश्वासघातीका कोई प्रायश्चित्त नही। सभी अनित्य है। भूमि-कर निष्कर्ष यह है कि धर्मनियन्त्रित राज्यतन्त्र एक शुद्ध शास्त्रीय सुव्यवस्था है। उसी व्यवस्थामे रामचन्द्र, हरिश्चन्द्र, दिलीप, शिबि, रन्तिदेव आदि लोकप्रिय तन्मूलं विनय । तन्मूल वृद्धोपसेवा । तन्मूलं विज्ञानम् । तस्माद् विज्ञानेनात्मान सम्पादयेत् । धर्मेण धार्यते लोक. । मानी प्रतिमानिनामात्मनि द्वितीयं मन्त्रमुत्पादयेत् । मन्त्रकाले मत्सर न कुर्वीत । ( चाणक्यसूत्र १ । ३१ )
- दैव विनातिप्रयत्नमपि करोति यत्तद्विफलम् । दैवहीन कार्यं सुसाध्यमपि दुस्साध्यं भवति । दैवकर्मणा तत्समाधानम् । सतां मत नातिक्रमेत । शत्रु जयति सुवृत्तता । कदापि पुरुष नावमन्येत । अनुरागोस्तु फलेन सूच्यते । † प्रज्ञाफलमैश्वर्यम् । महदैश्वर्य प्राप्य अधृतिमान् विनश्यति । दया धर्मस्य जन्मभूमि । आत्मनाश सूचयति अधर्मबुद्धि.। अमरवदर्थजातमर्जयेत्। परविभवेष्वादरोऽपि नाशमूलम् ।परद्र- व्यापहरणमात्मद्रव्यनाशहेतुः। अधनस्य बुद्धिर्न विद्यते । यथाकुलं तथाचारः । व्यवहारे पक्षपातो न कार्य. । परायत्तेषु उत्कण्ठा न कुर्यात् । विश्वासघातिनो न निष्कृतिः । सर्वमनित्यं भवति ।