मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबिना खतरा उठाये ही बैंकमें रुपया रखकर लाभ उठाया जा सकता है । अतः जैसे श्रमिकको श्रम लगानेका फल मजदूरी मिलती है, वैसे ही पूँजीपतिके पूँजी लगानेका फल मुनाफा मिलना चाहिये । हाँ, वह सीमित होना चाहिये । समाज तथा मजदूरोंको नुकसान पहुँचानेवाला न होना चाहिये ।
पूँजी और श्रम
अतिरिक्त श्रमके दरके सम्बन्धमें मार्क्सवादी कहते हैं कि "पूँजी या पैदावारके साधनोंको हम इस प्रकार बाँट सकते हैं । एक वे साधन, जो एक हदतक स्थायी हैं, उदाहरणतः इमारतें और मशीने, दूसरा कच्चा माल, तीसरे मजदूरको मजदूरी देनेके लिये पूँजी । पूँजीका जो भाग पैदावारके स्थायी साधनोंपर खर्च होता है, वह एक निश्चित समयमें पन्द्रह या बीस वर्षमें वसूल हो सकता है । इन साधनो- के दामपर सूद और घिसाई पूँजीपति आमदनीमेसे लगातार निकालता जाता है । कच्चे मालपर जो पूँजी खर्च होती है, वह भी तैयार किये गये सौदेके बिकते ही वसूल हो जाती है । पैदावारके इन साधनोंपर जो रुपया लगता है, पूँजीपति उसे सौदेके मूल्यसे वसूल कर लेता है, परन्तु उसपर मुनाफा वसूल नहीं किया जा सकता, वह घटता-बढ़ता नहीं । परिश्रमकी शक्ति इन साधनोंपर लगाये बिना कुछ लाभ नहीं हो सकता । पैदावारमे लगाये गये पूँजीपतिके धनका तीसरा भाग परिश्रमके शक्तिके खरीदनेमे लगता है । पूँजीपतिका मुनाफा उसकी पूँजीके इस भागसे आता है। "परिश्रम करनेकी शक्ति-जिस दामपर खरीदी जाती है, परिश्रमके फलका दाम उससे अधिक होता है । सौदेके दाममेंसे परिश्रमकी शक्ति या दाम निकाल देनेपर 'अतिरिक्त दाम' बच जाता है । अतिरिक्त दाम बढानेका सीधा तरीका यह है कि परिश्रमकी शक्तिके दाम मजदूरीको घटाया जाय, उदाहरणतः यदि मजदूर द्वारा कराये गये दस घंटे परिश्रमका दाम एक रुपया है और उसमेंसे मजदूरको उसकी परिश्रमकी शक्तिका मूल्य आठ आने दे दिया जाता है तो अतिरिक्त मूल्य आठ आने प्रति मजदूर बच जाता है । परिश्रमके मूल्य एक रुपयेमेसे यदि मजदूरी घटा दी जाय तो अतिरिक्त मूल्यका मुनाफा बढ़ जायगा । दूसरा उपाय मशीनोंका प्रयोग बढाकर पैदावार बढाना है । जिसमें परिश्रमके शक्तिके कम खर्च होनेसे उसके लिये कम दाम देना पड़े और मालिकके पास अतिरिक्त दाम या मुनाफा अधिक बच जाय । अतिरिक्त श्रमको बढानेका तीसरा उपाय यह है कि परिश्रमकी शक्तिका मूल्य तो न बढे, परन्तु परिश्रम अधिक दामका अधिक समयतक कराया जाय ताकि अतिरिक्त मूल्यका भाग बढ जाय । इसके लिये मजदूरोंसे बजाय दस घंटेके बारह घंटे काम कराया जाय । दस घंटे काम करानेसे पाँच घंटेमें तो मजदूर अपने परिश्रमकी शक्तिका दाम पैदा करता है, जो उसे मालिकसे मिलता है और पाँच घंटेमे मालिकके लिये अतिरिक्त दाम । अब काम बारह