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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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३५२ मार्क्सवाद और रामराज्य घंटे कराये जानेपर और परिश्रमकी शक्तिका दाम मजदूरी न बढानेपर अतिरिक्त श्रम बजाय पाँच घंटेके सात घंटे होने लगेगा। इसीलिये जब मशीनोंद्वारा थोडे समयमें अधिक काम हो सकता है, तब भी मालिक लोग कामके घंटे घटानेके लिये तैयार नहीं होते। “इस प्रकार हम देखते हैं कि मुनाफा कमानेकी पूँजीवादी प्रणालीमें मशीनों- का प्रयोग बढ़ने, पैदावार बढ़ने आदि सभी प्रकारकी उन्नतिसे मजदूरोंको नुकसान और पूँजीपतियोंको लाभ होता है, क्योंकि इन सब वस्तुओंका व्यवहार समाजकी आवश्यकताओंको पूरा न कर मुनाफा कमानेके उद्देश्यसे किया जाता है। पैदावार- के सब साधनोंके मौजूद होते हुए भी पैदावार उस समयतक नहीं हो सकती जब- कि मेहनतकी शक्तिको व्यवहारमें न लाया जाय। पूँजीवादी समाजमें मजदूरोंसे मेहनतकी शक्ति आती है। मजदूरोंकी मेहनतकी शक्तिको मजदूरी या वेतन- द्वारा खरीदकर पैदावारके साधनोंको चलाया जाता है! मजदूरी पूँजीवादी समाजका विशेष महत्त्वपूर्ण अङ्ग है, क्योंकि मजदूरीद्वारा ही पूँजीपति मजदूर- की मेहनतसे मुनाफा उठाता है। “अपने लाभके विचारसे पूँजीपति मजदूरोंकी मजदूरी अर्थात् परिश्रम करनेकी शक्तिका दाम सदा ही घटानेकी कोशिश करते रहते हैं। परिश्रमकी शक्तिके मूल्य और परिश्रमके मूल्यपर विचार करते समय यह कहा गया है कि पूँजीपतिके व्यवसाय- में परिश्रम करनेवाले मजदूरके परिश्रमके दो भाग होते हैं। मजदूरके परिश्रमका एक वह भाग होता है, जो उसकी परिश्रमकी शक्तिके मूल्यमें उसे दे दिया जाता है और उसके परिश्रमका दूसरा भाग वह होता है, जिसका उसे कोई फल नहीं मिलता, अर्थात् अतिरिक्त श्रम। मजदूर इस रहस्यको नहीं जानता। उसे यही समझाया जाता है कि ‘जितने दामका परिश्रम उसने किया है, उतना दाम उसे मिल गया है’ मजदूरको कहा जाता है कि ‘तुम्हारे परिश्रमका जो दाम एक पूँजीपति तुम्हें देता है, उसे यदि तुम कम समझते हो तो दूसरी जगह मजदूरी तलाश कर सकते हो।’ मजदूरीका दर समाज भरमें एक ही रहता है, क्योंकि सभी पूँजीपति अतिरिक्त श्रम- से लाभ उठाना चाहते हैं। “यदि मजदूरकी मजदूरी उसी पदार्थके रूपमें दी जाय जिसे वह अपन परिश्रमसे तैयार करता है, तो उसे इस बातका अनुमान हो सकता है कि उसके परिश्रमके फलका कितना भाग उसे मिलता है, और कितना भाग मालिककी जेबमें चला जाता है। परंतु मजदूरी या वेतनका पर्दा मजदूरसे उसके शोषणकी वास्तविकताको छिपाये रहता है। पूँजीवादी समाजमें मेहनत करनेवाली साधनहीन श्रेणी पैदावार तो बहुत अधिक करती है, परंतु खर्च करनेके लिये बहुत कम पाती है। पैदावारकी शक्ति और साधन तो खूब बढ़ते जाते हैं, किंतु जनताकी

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