मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमार्क्स्रीय अर्थ-व्यवस्था ३५३
पैदावार, खर्च करनेकी शक्ति घटती जाती है । इन सबका कारण है, अतिरिक्त मूल्यके रहस्यमय मार्गद्वारा जनताके परिश्रमका मुनाफेके रूपमें पूँजीपति श्रेणीके खजानोमे जमा होते जाना । इस व्यवस्थासे मेहनत करनेवाली साधनहीन श्रेणी तो संकट भोगती ही है, परंतु पूँजीपति श्रेणीको भी कम उलझनका सामना नहीं करना पडता । समाजमें हो सकनेवाली पैदावारको जनता खपा नहीं सकती । पूँजीपतियोंके पैदावारके विशाल साधन निष्प्रयोजन खडे रहते हैं । उन साधनोमें लगी उनकी पूँजी उन्हे कोई लाभ नही पहुँचा सकती और वे भयंकर आर्थिक संकट अनुभव करने लगते हैं । 'यद्यपि पूँजीवादी व्यवस्थामे मेहनत करनेवाली श्रेणीका शोषण उन्हे दी जाने- वाली मजदूरीके पर्देमे छिपा रहता है, जिसके द्वारा उन्हे सदा यह विश्वास दिलाया जाता है कि उनकी मेहनतका पूरा फल मेहनत करनेवालोको मिल जाता है, परंतु मजदूरोको उनकी मेहनतसे मिलनेवाले फलमे नित्य कमी आते जानेसे उनका जीवन दिन प्रतिदिन संकटमय होता जाता है, इसलिये मजदूरश्रेणी अपनी मजदूरीको बढानेकी पुकार उठाये बिना नही रह सकती ।' मार्क्सने उसी बातको बार-बार दोहराया है । कहा जा चुका है कि मजदूरीकी दर उचित होना चाहिये, परंतु मार्क्सवादी तो किसी न्यायालय या पंचायतकी बात माननेको प्रस्तुत ही नही होते । समझौता उन्हे अभीष्ट नही होता । उनका उद्देश्य तो सम्पूर्ण पूँजीको हथियाना है। जो पहले बेकारीके कारण परेशान होकर नौकरी ढूँढता था उसे काम मिला । नौकरी मिलनेसे जब बैठनेको जगह मिल गयी तो अब वह मालिकको समाप्त करके स्वय मालिक बनना चाहता है। ऐसी दृष्टिवाला व्यक्ति या समाज समझौता भला कब चाहेगा ? शोषण, उत्पीडनका अतिरंजित बीभत्स वर्णन केवल उत्तेजना और विद्वेष फैलानेकी दृष्टिसे मार्क्सवादी करते हैं । उनके वर्णनमें तथ्यांश नगण्य ही होता है । मार्क्सका अतिरिक्त श्रम, अतिरिक्त मूल्य सर्वथा निराधार है । मजदूरीका मार्ग बिल्कुल स्पष्ट है । इसमे कोई भी रहस्य नही । जैसे आपसी समझौते या पंचायत अथवा निष्पक्ष सरकारद्वारा कच्चे मालकी दर निर्धारित होती है वैसे ही श्रमकी भी दर निर्धारित होती है और हो सकती है। यह प्रत्यक्ष ही ससारकी आँखमे धूलि-प्रक्षेप है कि 'व्यापार या उद्योगमे होनेवाले लाभका मूल कारण उस श्रमिकका श्रम ही है, जो वेतनसे काम करता है। पूँजीका लाभमें कोई हाथ नहीं है।' जब सूदपर रुपया लेने या बैंकमे जमा कर देनेसे भी रुपयोका सूद मिलता है, तो फिर यदि अधिक लाभका लोभ न हो तो कौन बुद्धिमान् उद्योगोमे रुपया लगायेगा और क्यो रुपयेको व्यर्थ खतरेमें डालेगा ? क्योकि उद्योग या व्यापारमें हानिकी भी तो सम्भावना रहती है और झझटमें ऊपरसे पडना । लाभमें रुपयेका कोई हाथ भी
मा० रा० २३-