मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसके पक्षमे न्याय हुआ है । 'अतः वह सब वकीलके श्रमका फल है, उसे ही मिलना चाहिये', यह नहीं कहा जा सकता । बहुत-सी ऐसी भी मजदूरी होती है जिसके द्वारा बाजारमे जानेवाला कोई सौदा नहीं बनता । उदाहरणार्थ अपने ही कुटुम्बके काम चलानेके लिये लोहार, दर्जी, बढ़ई, मकान बनानेवाले कारीगरसे उपयोगके लिये काम कराये जाते हैं, वहाँ धोबी, नाई, भंगीके श्रमोंका क्या दाम होगा ? यहाँ कोई बाजारमें बिकनेका सौदा नहीं बनता । अतः वहाँ बाजार भावके आधारपर श्रमका दाम निश्चित करना पड़ेगा । अवश्य ही वह दाम कामके अनुरूप तथा राष्ट्रीय नागरिकोंके जीवनस्तरके अनुरूप होना चाहिये । इसके विपरीत जहाँ कथञ्चित् मजदूरोंका जीवन चलानेके लिये नितान्त आवश्यक जो कम-से-कम मजदूरी देते हैं, वे अन्याय करते हैं । उनपर नियन्त्रण आवश्यक है । फिर भी सौदा बनानेवाले मजदूरोंकी उचित मजदूरी या नौकरीसे अतिरिक्त लागत खर्च निकालकर सौदेके सब दाममे भी मजदूरोंका अधिकार है, यह नहीं सिद्ध हो सकता । कोई कारण नहीं कि उपयोगार्थ काम करनेवाले मजदूरोंके परिश्रमका दूसरा दाम हो और सौदा बनानेवाले मजदूरोंके परिश्रमका दूसरा । बाजारमे गेहूँ खानेके लिये खरीदे या दानके लिये खरीदे अथवा बेचनेके लिये खरीदे, पर दाममे कोई अन्तर नहीं आता ।
कच्चा माल, मशीन और पूँजी तथा पूँजीपतिकी बुद्धि, साहस, चेष्टा आदि सब मिलकर लाभमे हेतु हैं। यदि मजदूरोंके परिश्रमका भेद मानकर परिश्रमका दाम भी पृथक्-पृथक् माना जाय तो मशीनोंके सम्बन्धमे भी कहा जा सकता है कि जितनेसे मशीन कामलायक बनी रहे, वह उनकी कार्यक्षमताका दाम होगा । मजदूरकी नौकरी आदि लागत खर्च निकालकर अवशिष्ट सौदेका दाम मशीनकी क्रियाका परिणाम है । लाखो मजदूरोंका काम करनेवाली मशीनके सम्बन्धमें वे सभी न्याय लागू होने चाहिये, जो मजदूरके सम्बन्धमें लागू होते हैं। अतः लाखो मजदूरोंकी श्रमशक्ति एव श्रमका जो भी फल है, वह सब मशीनके मालिकको मिलना चाहिये । कच्चा माल तो सौदेका उपादान-कारण ही होता है । रूई ही सूत बनती है, सूत ही कपड़ा बनता है, अतः रूई तथा सूतके मालिकको जो दाम दिया गया है, उसे भी अपूर्ण ही कहा जा सकता है । रुपया निश्चल पड़ा रहे तो उसका कुछ भी फल नहीं होता । परंतु बैंकमें जाता है तो व्याजरूपसे उससे कुछ आमदनी होती है । व्यापार-उद्योगमें लगानेसे उससे और बड़ी आमदनी होती है । इसलिये व्यापारमे पूँजी लगायी जाती है । यदि लागत खर्चके अतिरिक्त सौदेका दाम मजदूरके परिश्रमका ही फल है और वह सब मजदूरको ही मिलना चाहिये, तब तो कच्चे माल खरीदने, मकान, मशीन बनाने, मजदूरोंको बटोरकर काम कराने, मजदूरी देनेमे पूँजी लगाकर उसे खतरेमे डालना व्यर्थ ही होगा । उसकी अपेक्षा तो