मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 674, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंमार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३६१ भी न कर सकेगा । मुट्ठीभर तानाशाह कम्युनिस्टोंका निर्णय ही उनकी धर्म, सभ्यताका निर्णय समझा जायगा । मध्यम श्रेणीको यह समझानेकी आवश्यकता नहीं है कि मजदूर लोग गरीब नहीं रहेगे । यह तो कोई भी समझ सकता है कि जिसका शासन रहता है वह गरीब नहीं रहता । 'मजदूरों, गरीबोंका राज्य', होगा यह नारा तो बहुसंख्यक गरीबोंके आकर्षणके लिये ही है। और इसीके द्वारा मनुष्यकी स्वाभाविक दुर्बलताओंका लाभ उठाकर ईर्ष्या-द्वेषकी वृत्ति उभारकर विध्वंस तथा अपहरणमे गरीबोंको प्रवृत्त करनेके लिये चेष्टा की जाती है । फिर भी समझदार गरीब मजदूर सब समझते हैं कि छीना-झपटी तथा अपहरणादिके द्वारा किसीका स्थायी उपकार एवं कल्याण नहीं हो सकता । दूसरोंको बिना सताये धर्मको बिना उल्लङ्घन किये थोडा भी धन बरकत और शान्तिका कारण होता है । बेईमान, विधर्म लोगोंके बड़े ऊंचे- ऊंचे मनसूबे सुख-स्वप्नके मनोराज्य होते हैं । उनकी पूर्ति कभी नहीं होती । यदि धर्मनियन्त्रित रामराज्यकी नीतिके अनुसार ईमानदारीसे धार्मिक सामाजिक सगठन हो तो सभी उत्पादनकी असुविधाएँ दूर हो सकती हैं । बेकारी, बेरोजगारी, भूखमरीकी चर्चा स्वप्नमे भी न दीखेगी । रामराज्यमे ऐसा ही था । नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना । नहिं कोउ अबुध न लच्छनहीना ॥ समुचित प्रयत्न बिना कम्यूनिज्मरूपी जादूकी छडीसे समस्त समस्याओका समाधान नहीं हो सकता । जीवनमे रोटी ही सब कुछ नहीं है, धर्म तथा ईमानका भी मानव-जीवनमे महत्त्वपूर्ण स्थान है । ईमानदार व्यक्तिको मुनासिब कामके लिये मुनासिब मजदूरीकी बात तो समझमे आ सकती है, लेकिन मजदूरी भी खत्म हो, मजदूरी देनेवाला भी खत्म हो, मजदूरी ही नहीं, मजदूरी देनेवालेकी सारी सम्पत्तिके ही हम मालिक बन जायें, यह भावना दगावाज डाकूकी दानवी मनो- वृत्ति है, सद्विचार नहीं। एक खूँखार भेडिया या कुत्ता भी यह नहीं सोचता कि मुझे टुकडा देनेवाला खतम हो जाय, उसकी सारी रोटी मुझे मिल जाय । सब जगह इमारत तोडकर नयी इमारत ही नहीं बनायी जाती, किंतु बिना तोड़े हुए सुधारका प्रयत्न भी कर्तव्य है । कम्युनिष्टको अपने शरीर, दिल-दिमागमें फितूर है तो इसीलिये सबको खतम नहीं किया जा सकता । किंतु विविध चिकित्सा-प्रणालियोंके सहारे उनके सुधारका प्रयत्न ही उचित है । इसी तरह जो व्यवस्था अच्छी है, किंतु उसमे कुछ आगन्तुक दोषोका ससर्ग लग गया हो, वहाँ उस दोषको ही मिटानेका प्रयत्न किया जाता है । उस व्यवस्थाको ही मिटानेका प्रयत्न तो उस ढगका है, जैसे सिरमे दर्द होनेपर दर्द दूर करनेका प्रयत्न न कर सिर काट डालनेका प्रयत्न करना । ऐसे तो सभी श्रेणियाँ राज्याधिकार पानेको छटपटा सकती हैं, छटपटाती रहेगी, पर इसमे सिवा सघर्ष तथा अश्रान्तिके कुछ लाभ नहीं हो सकता । वस्तुतस्तु