मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 675, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ें३६२ मार्क्सवाद और रामराज्य अधिकार तथा मोहमे न फँसकर कर्त्तव्य-मार्गपर प्रवृत्त होनेसे अधिकार बिना बुलाये ही पीछे-पीछे दौड़ता है । यहाँ यह स्पष्ट समझना चाहिये कि धर्महीन वस्तुतः शोषक अन्यायी चाहे पूँजीवाद हो, चाहे सर्वहाराके नामसे कुछ कम्युनिष्टोंका अधिनायकत्व हो, रामराज्यवादी दोनोंके ही विरोधी हैं । परंतु इसीलिये किसी व्यक्ति या समूहको मिटा देना कथमपि उचित नहीं है । और कोयलेमे कालिमाके तुल्य बुराई या शोषण व्यक्ति या समूहका अनिवार्य स्वाभाविक धर्म नही है, तो कोई कारण नहीं कि बुराई या शोषण व्यक्ति या समूहके बिना मिटाये न मिट सकती हो । कोयलेसे तो मनो साबुन खर्च करनेपर भी कालिमा नही मिटती, परंतु जिस स्वच्छ वस्त्रमे कोयलेकी कालिमा लगी होती है, वह तो साबुन आदिसे धो लिया जा सकता है । प्राचीन वस्तु सब बुरी, नवीन अच्छी; पुराना समाज निकम्मा, नया अच्छा होगा, यह कोई नियम नहीं । कई बार नयी वस्तु पुरानीसे भी बुरी होती है । रामराज्यके विपरीत नयी व्यवस्था वैसे ही भीषण होगी जैसे स्वस्थताके विपरीत प्लेग और कालरा । यदि रामराज्यकी कल्पना अन्धविश्वास है, तो सम्पूर्ण संसारमे सर्वहाराके नामपर कम्युनिष्टोंका अधिनायकत्व भी उनका दिमागी फितूर ही है । विश्वभरमे वर्गराज्य या शासनहीन समाजकी कल्पना तथा इच्छानुसार काम करना, इच्छानुसार वस्तु लेना इत्यादि कल्पना तो अन्धविश्वाससे भी अधिक अन्धतम विश्वास है । जैसे रूसोकी सामान्येच्छा, फिक्टेकी आदर्श विश्व सरकार, हीगेलका आदर्श राज्य केवल दिमागी चीज ठहरती है, वैसे ही मार्क्सकी वर्गहीन स्वच्छन्द राज्यकी कल्पना भी दिमागी फितूर ही है । रामराज्यकी दृष्टिमे तो कर्मानुसार फलके सिद्धान्तमे राजमार्ग निर्विवाद है । जब व्यष्टि, समष्टि जगत्, दीनदार, ईमानदार विद्वान् सत्प्रयत्नशील होगा, तब कभी भी सुख- समृद्धिका रामराज्य हो ही सकेगा । पूँजीवाद और कृषि कृषिके सम्बन्धमे मार्क्सवादियोका कहना है कि उद्योग-धंधोमे पूँजीवादी ढंगपर संगठित हो जानेसे पहले भी खेती और खेतीसे सम्बन्ध रखनेवाले कारोबार पशुपालन, फलोको उत्पन्न करना, आदि जारी थे और आजतक वे सब काम कही उसी रूपमें और कहीं परिवर्तित रूपमे चले जा रहे हैं । "पूँजीवादका पहला प्रभाव खेतीपर यह पड़ा कि उद्योग-धंधोके कारखाने- के रूपमे जारी होनेके कारण उनका खेतीसे कोई सम्बन्ध न रह गया । पूँजीवादी व्यवस्थाका आरम्भ होनेसे पहले प्रायः उद्योग धंधो और खेतीका काम एक साथ ही होता था । किसान या तो खेतीके काममें बचे हुए समयसे कपड़ा, जूता