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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३६३

और उपयोगके दूसरे सामान तैयार कर लेता था या किसानके परिवारका कोई एक आदमी परिवारभरके लिये इन पदार्थोंको तैयार कर लेता था। परंतु कारखानोंमें यह पदार्थ अधिक सस्ते और अच्छे तैयार हो सकनेके कारण किसानोका इन पदार्थोंका स्वयं तैयार करना लाभदायक न रहा। उद्योग-धंधे सिमटकर शहरोंमें चले गये और गाँवोंमें केवल खेतीका ही काम रह गया। "समाजमे पूँजीवादी व्यवस्था आरम्भ हो जानेका प्रभाव खेतीपर भी काफी पडा। पूँजीवादने कला-कौशलकी उन्नति कर और मजदूरोकी माँग पैदा कर खेतीको पुरानी जागीरदारी व्यवस्थामें काफी परिवर्तन किया। पहले तो इसका प्रभाव यह हुआ कि जागीरोसे किसान लोग दौडकर औद्योगिक नगरोकी ओर आने लगे और जागीरें टूटने लगीं। परंतु जब पूँजीपतियोके पास पूँजीकी बडी मात्रा इकट्ठी हो गयी, तो इसका प्रभाव यह हुआ कि पूँजीपतियोंने जागीरें बनाना शुरू किया। खासकर बड़े-बड़े फार्मोंके रूपमे जागीरें, जिनमे खेती किसानोकी बडी संख्याद्वारा न होकर मशीनोंद्वारा होने लगी। "उद्योग-धंधोकी पैदावारमे पूँजीवादी व्यवस्थाके आरम्भ हो जानेसे उद्योग- धंधोके केन्द्र और खेतीकी जगह गाँवोकी अवस्थामे बहुत बड़ा अन्तर आ गया। विज्ञानके विकाससे औद्योगिक क्षेत्रमें आये दिन परिवर्तन होता रहता है। मनुष्योंका स्थान मशीने ले लेती हैं, रफ्तार और चालोमे उन्नति हो जाती है, परंतु खेतीकी अवस्थापर इन सब बातोका प्रभाव बहुत कम पडता है। समाजकी आवश्यकताको उद्योग-धंधे और खेती मिलाकर पूरा करते हैं। उनमेसे एकके बहुत आगे बढ जाने और दूसरेके बहुत पीछे रह जानेसे विषमता आ जाना स्वाभाविक हो जाता है। पूँजीवादद्वारा धनके केवल एक छोटी ही श्रेणीके हाथोमे एकत्र हो जानेका प्रभाव खेती करनेवालोपर भी बहुत गहरा पडता है। कृषिके क्षेत्रमें होनेवाला शोषण न केवल अधिक पुराना है, बल्कि मजदूरकी अपेक्षा किसानके अधिक असहाय होनेके कारण वह अधिक गहरा भी है। "खेतीद्वारा आवश्यक पदार्थोंकी पैदावार करनेके लिये सबसे पहले जरूरत पडती है भूमिकी। पूँजीवादी देशोमे भूमि कुछ बड़े-बडे जमीदारोकी सम्पत्ति होती है। ये जमीदार स्वयं भूमिसे कुछ पैदावार नही करते। किसानोको खेती करनेके लिये भूमि देकर ये उनसे लगान वसूल लेते हैं। खेतीके लिये कुछ परिश्रम न करके ये खेतीके उपजका भाग इसलिये ले सकते है, क्योकि ये लोग भूमिके मालिक समझे जाते हैं। भूमि जागीरदारोके अधिकारमे प्रायः तीन तरह जाती है। मध्यकालमे जब सामन्तशाही और सरदारशाहीका जोर था, भूमिको राजा लोग दूसरे राजाओसे जीत करके अपने सरदारोमे उसे बाँट देते थे। जिस सरदार- की जितनी शक्ति होती थी या जितनी सहायताकी आशा राजा किसी सरदारसे

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