भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 677

३६४ मार्क्सवाद और रामराज्य कर सकता था उतनी ही भूमि उस सरदारको दी जाती थी। भारतवर्षमें जागीर, जमींदारी और ताल्लुकदारी कुछ तो मुगलो, मराठो और सिखोके समयसे चली आ रही है। ये वही जमीदार और जागीरदार हैं, जिन्होने अग्रेजी राज्य आनेपर मौजूदा सरकारकी राजभक्ति स्वीकार कर ली। कुछ जागीरदारियाँ अंग्रेजी सरकारने भूमिकर किसानोंसे सुविधापूर्वक वसूल करनेके लिये कायम कर दीं। सरकारने कुछ लोगोको भूमिके बड़े-बड़े भाग मालगुजारीकी एक निश्चित रकम- पर सौंप दिये और उन्हे किसानोंसे लगान वसूल करनेका अधिकार दे दिया। सरकारकी शक्तिके बलपर ये लोग किसानोसे लगान वसूल करते हैं और मालगुजारीके बीचका अन्तर इन लोगोकी आमदनी बन जाती है।” वस्तुतः भूमि या कृषिवाणिज्य आदि ही कौटल्यकी दृष्टिसे मुख्य अर्थ है। मनुष्याणां वृत्तिरर्थः। मनुष्यवती भूमिरित्यर्थः। (कौटिली० अर्थ० १५।१।१-२) मनुष्योकी जीविका कृषिवाणिज्य आदि अर्थ है। मनुष्योसे युक्त भूमिका भी नाम अर्थ है। इसीमें विविध उद्योग-धंधा भी आ जाता है। यह सही है कि उद्योग-धंधो, कल-कारखानोका अधिक विकास होनेसे खेतीका काम पिछड़ गया, परतु यह सभी समझते हैं कि पेट भरनेके लिये अन्न परमावश्यक है, जो खेतीके बिना नहीं मिल सकता। जूट और कपासके लिये भी खेती आवश्यक है, कितने कल- कारखाने खेती बिना नही चल सकते। चावल निकालने, तेल बनाने, कपड़ा, बोरे तथा चीनी बनानेवाले बड़े-बड़े कारखाने भी खेती बिना चौपट हो सकते है। अब गन्ना, तेलहन, जूट, कपास आदिके लिये भी खेत आवश्यक है। सिचाई- के लिये बहुत प्राचीन कालसे तालाब, कुँआ बनवाने, नहर बनवानेकी प्रथा चालू है। अन्यान्य यन्त्रोके विकासके साथ खेत जोतनेके लिये तथा कुँओसे पानी निकालने और नये ढंगके नलकूपोकी व्यवस्था सर्वत्र चल रही है। अमेरिका, जापान, इंग्लैड, फ्रांस, जर्मनी आदि देशोमें खेतीको उपजाऊ बनाने- के लिये नयी-नयी खाद और नये-नये दूसरे आविष्कार भी हो रहे है। वैज्ञानिक ढंगसे खेतोको गरमी या ठंढ पहुँचाने, अच्छे ढंगका पौधा तथा विभिन्न फलों- को बढानेमे मीठा या स्वादिष्ट बनानेका भारतीय प्राचीन शास्त्रोमे भी बहुत चर्चा है। यह अवश्य है कि अभीतक यह व्यवस्था ग्राम-ग्राममे व्यापक नहीं हो सकी है, परतु कल-कारखाने भी तो गाँव-गाँव नही पहुँच पाये है। मकान बनाने, खेती करने, बोझ ढोने आदिका लाखो काम मजदूर भी अभीतक पुराने ढंगसे ही करते हैं। किसी भी देशमे अभीतक सर्वत्र समानता नहीं है। यह दूसरी बात है कि नमूनेके तौरपर कुछ फर्म, कुछ ग्राम सब देशोने बना रखे हैं। बाहरसे आनेवालोको वही दिखाया जाता है, जैसे श्रीबुल्गानिन आदि सभी नेताओँको भारतमें नमूनेके ग्राम, नमूनेके फर्म तथा उद्योग-धंधे दिखलाये