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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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३६० मार्क्सवाद और रामराज्य

करनेका यत्न नहीं कर रहे हैं। वे अपनी गिरती हुई अवस्थामें केवल रोक लगानेका यत्न कर रहे हैं। वे समाजकी इमारतको नये सिरेसे बनानेका यत्न न कर गिरती हुई इमारतमें टेक देनेका यत्न कर रहे हैं .... 'मुनासिब कामके लिये मुनासिब मजदूरीकी जगह अब उन्हे अपना यह नारा बुलंद करना चाहिये ...... 'मजदूरी और पूँजीवादी व्यवस्थाका खात्मा हो।' मार्क्सवाद इतिहासके जिस क्रम और विचारधारा मे विश्वास करता है उसके अनुसार पूँजीवादी प्रणालीमे सुधार और लीपापोतीकी गुंजाइश बाकी नहीं। वह अपना उद्देश्य समझता है एक नवीन समाजका निर्माण। असलमे चीनके अनुभवोसे ही मार्क्सवादियोको मजदूरोसे भिन्न किसान और निम्न मध्यम- श्रेणीको भी साधनहीन श्रेणीमे मिलाना पड़ा। चीनकी क्रान्तिसे पहले मार्क्सवादी कहते थे—'सर्वहाराके ही अधिनायकत्वमे क्रान्ति होगी। उसीसे समाजवादकी स्थापना होगी। भले ही किसानोकी सख्या बडी है तथापि वह उदीयमान नही है। मजदूरदल ही उदीयमान है।' पर चीनमें कृषकोद्वारा ही क्रान्ति हुई। सम्भवतः आगे चलकर परिस्थितियोके थपेड़ेसे मार्क्सवादियोको अन्य आस्तिकोके भी सिद्धान्त मानने पड़ जायँ। क्रुश्चेव तथा बुल्गानिनने भारत आकर बहुत-से भारतीय परम्पराओका अनुगमन किया ही। यह कहा जा चुका है कि विशेषतः भारत-जैसे सास्कृतिक देशोमे उच्च खानदानके लोग ही परिस्थितिवश मजदूर बनकर मजदूरी करते हैं। उनमे धर्म, सभ्यता, सस्कृति तथा अपनी मर्यादाकी रक्षाका भाव रहता है। वे मजदूरी करके कुछ पैसा पाकर अपने धर्म, संस्कृति तथा माता, पिता, पुत्र, पत्नी आदि कुटुम्ब एवं कुलपरम्पराका रक्षण चाहते हैं। वे क्रमागत ( बपौती ) सभ्यता, संस्कृति अपनी सम्पत्ति एव मिल्कियतमें अपना जन्म-सिद्ध अधिकार मानते है। भारतमें मिताक्षराके अनुसार पूर्वजोकी सम्पत्तिमे पुत्र-पौत्रोका स्वत्व मान्य है। गर्भस्थ बालककी ओरसे भी न्यायालयमे उठायी जानेवाली स्वत्वरक्षणकी माँग मान्य होती है। तभी लोकमान्य कह सके थे कि स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। मजदूर भी चाहता है कि मेरी कमाई मेरे पुत्र-पौत्रोको प्राप्त हो। मै अपनी कमाईसे दान-पुण्य कर अपना लोक-परलोक बना सकूँ। केवल फॉकेमस्तीकी बात करना, होटलमे खाना तथा अस्पतालमें मरना उसे पसद नहीं है। किसान तथा मध्यम श्रेणीके लोग भी अपनी भूमि, सम्पत्ति, सस्कृति छोडकर कम्यूनिज्मका परतन्त्रतापूर्ण जीवन व्यतीत करना नहीं चाहते। यह उनकी समझदारी है, बेसमझी नहीं। वे कहते हैं कि यह घरफूँककी समझदारी कम्युनिस्टोको ही मुबारक हो। व्यक्तिगत भूमि-सम्पत्ति आदिका राष्ट्रीयकरण हो जानेसे सभीको सदाके लिये परतन्त्रताके बन्धनमे जकड जाना पड़ेगा। अपनी संस्कृति, सभ्यता एव धर्मके विकास तथा रक्षणके लिये कोई कुछ

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