भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पाश्चात्त्य राजनीति [११७]

मार्क्सने निम्नलिखित वस्तुओको सिद्ध किया— १. वर्गोंका अस्तित्व उत्पादन व्यवस्थाके अनुकूल होता है । दासताके युगमें वर्गोंका अस्तित्व और सङ्घर्ष उस युगकी उत्पादन व्यवस्थाके अनुकूल था। इसी तरह सामन्तशाही एवं पूँजीवादी युगोमे इनका अस्तित्व तथा सङ्घर्ष इन युगोंके उत्पादनके अनुकूल था। २. वर्ग-सङ्घर्ष अनिवार्य रूपसे सर्वहारा दलके अधिनायकत्वका मार्ग प्रशस्त करता है । ३.यह अधिनायकत्व स क्रमणकालिक हेगा । इसके वाद वर्गोंका अन्त हो जायगा और एक वर्गविहीन समाजका जन्म होगा । हीगेलका द्वन्द्ववाद, ब्रिटेनका अर्थशास्त्र, फ्रांसका समाजवादी दर्शनके अध्ययन- द्वारा द्वन्द्वात्मक भौतिकवादके नामसे उसने नये दर्शनका आविर्भाव किया । हीगेलके द्वन्द्ववादमें विचारका प्रमुख स्थान है । उनके मतानुसार 'बाह्य जगत् आन्तरिक विचारोंका ही प्रतिबिम्ब है । परंतु मार्क्सने भौतिक संसारकी ही सत्ता मानी है और उसे आन्तरिक विचारोंका जनक माना है। इस प्रकार दोनोंके द्वन्द्वात्मक प्रणालीमे भेद है । प्रायः इतिहासकार मनुष्यको ही सर्वश्रेष्ठ स्थान देते आये हैं । इतिहासमें परिवर्तन अपूर्व बुद्धि मनुष्योद्वारा ही मानते आये हैं । परंतु मार्क्सवादके अनुसार इतिहासकी प्रगतिमें सर्वप्रधान है अर्थव्यवस्था । आर्थिक ढाँचेपर ही एक युगका सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक ढाँचा आश्रित होता है । उत्पादनके साधन और उत्पादनके सम्बन्ध ही आर्थिक ढाँचा हैं। इतिहासके परिवर्तनमें मनुष्यका भी महत्त्वपूर्ण स्थान है, परंतु वह परिस्थितियोंका दास होता है । उसके विचार भी उन्हीं परिस्थितियोपर आश्रित रहते हैं । एक व्यक्ति नेता तभी बन सकता है जब उसकी योजनाएँ तत्कालीन परिस्थितियोंके अनुसार होती हैं ।' अपनी परिस्थिति, अपनी सम्पत्ति, विपत्तिकी प्रतिक्रिया ही आधुनिक दार्शनिकोंका दर्शन होता है । वे अपने सुख-दुःख, राग-द्वेषके संस्कारोंसे घिरे हुए होते हैं । अतः जैसे लाल-पीले चश्मेवालोंको सारा जगत् ही लाल पीला दिखायी देता है, उसी प्रकार अपनी परिस्थितियो तथा भावनाओके अनुसार ही उनकी प्रतिक्रियास्वरूप तर्क तथा सिद्धान्तोका आविष्कार होता है । कामुकके लिये संसार कान्तामय ही उपलब्ध होता है । परिस्थितियोंसे ऊँचे उठे हुए तत्त्वज्ञको संसार ब्रह्ममय दिखायी देता है । गरीबीकी हालतमें आर्थिक कष्टसे पीड़ित मार्क्सके मस्तिष्कमें जैसी प्रक्रिया हुई, वैसा ही मार्क्सीय दर्शन हुआ । आर्थिक कष्टपीड़ित मनुष्य ही अर्थका महत्त्व समझता है । प्यासा पानीका, भूखा भोजनका महत्त्व समझता है । इस दृष्टिसे मार्क्सको संसारमें सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु अर्थ ही प्रतीत हुआ । ब्रह्म, चेतन आत्मा, श्रेष्ठ मनुष्य, धार्मिक, सामाजिक, शाश्वत नियम—सभी महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ उसे अर्थके सामने नगण्य जँचीं।