मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ मार्क्सवाद और रामराज्य मार्क्सका जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवारमें हुआ। पहले उसने वकालतकी शिक्षा ग्रहण की। फिर वह पत्रकार बना, समय पाकर उसने 'हिगेलवाद'का अध्ययन किया। मानवतावादसे प्रेरित होकर वह श्रमिक आन्दोलनमें अग्रसर हुआ और शीघ्र ही आन्दोलनका नेता बन गया। उसकी जीविकाका आधार उसके लेख एव एंगिल्सकी सहायता ही थी। गरीबी अवस्थामें भी उसने अपना ध्येय नहीं त्यागा। अफलातून, अरस्तू, हीगेलकी श्रेणीमें ही वह भी उच्च दार्शनिक गिना जाता है। 'पावर्टी आफ फिलासफी' 'मेनिफेस्टो आफ कम्युनिस्ट पार्टी' 'एटटिन्थ ब्रूमेयर आफ लूई बोनापार्ट' 'ए कंट्रीब्यूशन टु दी क्रिटिक आफ पोलेटिकल एकानामी' 'दी कैपिटल' 'सिविलवार इन कास' 'दी गोथा प्रोग्राम' 'क्लास स्ट्रगल इन फ्रांस' 'रेवेल्यूशन एंड काउंटर-रेवेल्यूशन' आदि उसके प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। एंगिल्स एक धनी व्यवसायी कुटुम्बमे जन्मा था। उसका पिता प्रशाका एक व्यवसायी था। युद्धमे एंगिल्स ब्रिटेनके व्यवसायी नगर मेनचेस्टरमे रहने लगा। वह स्वयं एक मिलमालिक था। उसने मार्क्सको आर्थिक, बौद्धिक दोनो ही प्रकारकी आजन्म सहायता दी। मार्क्सकी मृत्युके बाद कम्यूनिस्ट आन्दोलनका नेतृत्व उसने ही किया। उसने मार्क्सके सिद्धान्तोको विज्ञान तथा दर्शनपर लागू किया। उसकी कई पुस्तके प्रसिद्ध हैं। लेनिन क्रान्तिकारी वॉलशेविक दलका जन्मदाता हुआ। २० वी शताब्दीमे रूसके समाजवादी जनतान्त्रिकदलमे दो पक्ष हो गये। एक वॉलशेविक, दूसरा मेन शेविक। वॉलशेविक दल पहले क्रान्तिकारी था, लेनिन उसका नेता था। बहुत संघर्षोंके बाद १९१७ मे उसके नेतृत्वमे समाजवादी क्रान्ति हुई और जीवन- पर्यन्त वह सोवियत-शासनका प्रमुख सूत्रधार बना रहा। उसकी सारी कृतियाँ ग्यारह ग्रन्थोंमें संकलित हैं। मार्क्सके दर्शनको द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (डाइलेक्टिकल मेटिरियलिज्म) या ऐतिहासिक भौतिकवाद (हिस्टारिकल मेटेरियलिज्म) भी कहा जाता है। यह द्वन्द्वात्मक दृष्टिसे प्राकृतिक घटनाओंकी परख और पहचान करता है। भौतिकवादी दृष्टिसे प्राकृतिक घटनाओकी व्याख्या, कल्पना तथा सिद्धान्तकी विवेचना करता है। स्टालिनके मतानुसार 'मार्क्सवाद अन्धश्रद्धा नहीं है।' अतः उसकी व्याख्या समयानुसार बदलती रहती है। साम्राज्यवाद और सर्वहारा क्रान्तियुगमें लेनिनने उसकी पुनः व्याख्या की थी। इसीलिये लेनिनवादको प्रधानरूपसे सर्व- हाराके अधिनायकत्वका दर्शन कहा जाता है। इतिहास और समाजकी आर्थिक व्याख्या, मूल्य तथा अतिरिक्त मूल्यका सिद्धान्त वर्गसंघर्ष तथा सर्वहाराका अधिनायकत्व उसके दर्शनके मुख्य विषय हैं।