मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाश्चात्य राजनीति १६७ शास्त्रका सम्बन्ध महत्त्वकी वस्तु है । किंतु राज्यको अन्तर्राष्ट्रिय नैतिकतासे भी मुक्त मानना राज्यकी पूर्ण निरङ्कुशताका समर्थन है । 'राज्य कोई अनैतिक कार्य कर ही नहीं सकता । युद्धसम्बन्धी अत्याचार अनैतिक नहीं कहे जा सकते' यह सब असंगत एवं मानवता-विरुद्ध है । रामराज्यमें अनिवार्य होनेपर युद्ध आदरणीय अवश्य है, परंतु उसके भी कुछ धर्म हैं, नियम हैं । अत्याचार, क्रूरता वहाँ भी अनैतिक ही है । शस्त्रहीन, अयुद्धयमान, पराङ्मुखका वध आदि यहाँ भी अनैतिक ही है । स्वतन्त्र-बुद्धि-प्रसूत कल्पनाएँ निरङ्कुश होती हैं, इसीलिये पाश्चात्य दार्शनिकोंमें दार्शनिकोंकी परस्पर अत्यन्त विसंगति है । कोई व्यक्तिवादका अतिवाद, कोई समष्टिवादका अतिवाद स्वीकार करते हैं । कोई प्रजा-प्राखर्य, कोई राज्य-प्राखर्यको चरम सीमापर ले जाना चाहते हैं । बिना सुस्थिर शास्त्रीय प्रमाण और बिना प्रामाणिक परम्पराके इन विभिन्न नुस्खोंको आजमानेके लिये विभिन्न राष्ट्ररूपी प्रयोगशालामें प्रयुक्त किया जाता है । कोई भी प्रयोग कुछ सालोंमें ही असफल सिद्ध हो जाते हैं । रामराज्य-प्रणाली ठीक इसके विपरीत है । वह अनादि अनन्त ईश्वरीय अपौरुषेय शास्त्रों एवं आर्ष, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक शास्त्रों तथा प्रामाणिक परम्पराओंके आधारपर स्थिर है । यही प्रणाली ईश्वरराज्य, धर्मराज्य, रामराज्य, पक्षपात-विहीन धर्मसापेक्षराज्य, अध्यात्मवादपर आधारित धर्मनियन्त्रित शासनतन्त्र आदि नामोंसे प्रसिद्ध है । वह लाखों-करोड़ों नहीं, अरबों वर्षोंसे सफल अनुभूत है । मार्क्सवाद कार्लमार्क्स ( १८१८-१८८३) के केपिटल आदि अनेक ग्रन्थोंद्वारा समाजवाद एवं साम्यवादका परिष्कृत रूप व्यक्त हुआ । यों इसका प्रचलन बहुत पूर्वसे ही था । अफलातून, मोर आदिने तथा उनसे भी पहले कई धार्मिक लोगोंने साम्यवादी समाजका चित्रण किया है । 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की प्रसिद्धि बहुत पुरानी है । किंतु कार्लमार्क्सने साम्यवाद या समष्टिवादको आवश्यक ही नहीं, अपितु अवश्यम्भावी बतलाया । वह एक नयी ऐतिहासिक विश्लेषण-पद्धतिका जन्मदाता तथा पूँजीवादका सर्वश्रेष्ठ समालोचक माना जाता है । फ्रेडरिक एजिल्ससे इन कार्योंमें उसे बड़ी सहायता मिली थी । उसी दर्शनके आधारपर लेनिनके नेतृत्व- में १९१७ मे रूसी क्रान्ति हुई । लेनिनके बाद स्टालिनने इसका नेतृत्व अपने हाथोंमें लिया । चीनमें माओत्सेतुगने साम्यवादका नेतृत्व किया । इन लोगोंने नयी परिस्थितियोंके अनुसार मार्क्सवादकी नयी व्याख्या की ।