मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् । कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् ॥ ( महा० ) 'मुझे राज्य, स्वर्ग, मोक्ष कुछ न चाहिये, केवल प्राणियोंकी दुःख-निवृत्ति ही मुझे इष्ट है।' रामचन्द्र, हरिश्चन्द्रका राज्यत्याग तथा दिलीप एव रन्तिदेवका सर्वस्व त्याग प्रसिद्ध है। समर्थ विद्वान्, महातपा, महात्यागी पुरुष तो इतिहासकी धारा ही बदल सकते हैं, यह प्रत्यक्ष सत्य है। जो तर्कसे इस प्रत्यक्षको मिथ्या सिद्ध कर सकते हैं, वे प्रत्यक्ष सूर्यको भी अपनी बुद्धि-वैभवसे अधकार वतला सकते हैं । परिस्थितियाँ तथा अवसरके प्रवाहमें बह जाना वैसा ही है, जैसे मुर्देका नदी- प्रवाहमें बहना। बुद्धिमान् साहसी महापुरुष प्रवाहको चीरकर बाहर निकलते हैं और प्रवाहको भी वैसे ही बदल देते हैं, जैसे नदी-प्रवाहमें पड़ा व्यक्ति प्रवाहको काटकर निकलता है और बाँध बाँधकर, नहर निकालकर, प्रवाहका मुँह भी मोड़ देता है। ईर्ष्या-द्वेषकी स्थिति भी सामान्य स्थिति है। उत्तम स्थिति तो यही है कि अपने पुरुषार्थसे अपनी गाढ़ी कमाईके कुछ पैसोंसे ही सतुष्ट रहे। लूटकर, दूसरोंको मारकर धनवान् बनना अच्छा नहीं है। ये सस्कार अभीतक ग्रामीणों, नागरिकों सभीके हृदयोंमें बद्धमूल हैं । ईर्ष्या-द्वेष आदि मनुष्यके दोष हैं, गुण नहीं । मार्क्सवादी इन्हीं विकारोंको उत्तेजित करके उनके द्वारा राजनीतिक समस्या सुलझाना चाहते हैं। स्वार्थ-साधनमें भी नैतिकताका कुछ ध्यान रखा जाता है, परापहरण आदि निन्द्य समझा जाता है। पर मार्क्सके मतसे परकीय वस्तुका अपहरण न्याय ही है; अन्याय नहीं। समष्टिवाद समष्टिवादका भी मार्क्सवादसे अंशतः मतभेद है। उसका स्रोत है फेबियन- वाद और संशोधनवाद। इसे ही 'समाजवादी जनतन्त्र' या 'जनतन्त्रीय समाज- वाद' कहा जाता है। द्वितीय अन्तर्राष्ट्रिय मजदूर-सघके कई दल इसके समर्थक थे। इसे ही सुधारवादी या विकासवादी समाजवाद भी कहा जाता है। इंग्लैण्ड- का मजदूर-दल इसी विचारधाराका है। मिल इस वादका उद्गम है। वार्करने मार्क्सवादसे बचकर ब्रिटेनमें समाजवादी दर्शनका निर्माण किया है। उसने ब्रिटिश व्यक्तिवादी परम्पराके अनुसार सुधारवादी समाजवादकी रूपरेखा प्रस्तुत की है। पीजका कहना था कि 'हम समाजवाद बनाना चाहते हैं, समाजवादी नहीं।' बर्न स्टाइन ( १८५०--१९२२ ) ने मार्क्सवादका सशोधन करते हुए वतलाया था कि 'संसदीय नीतिद्वारा समाजवादकी स्थापना सम्भव है।' मार्क्सने भी अमेरिका और इंग्लैण्डमें समदीय व्यवस्थाद्वारा भी समाजवादकी स्थापनाको सम्भव वतलाया था। एक तरहसे यह दर्शन विधानवादका समर्थक है। इनके अनुसार व्यक्ति विवेकशील होता है, अतः निर्वाचक समाजवादके पक्षमें मतदान करेंगे।