मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० मार्क्सवाद और रामराज्य इसलिये प्रचारद्वारा उन्हे यह बतलाना ही पर्याप्त है कि आधुनिक कुरीतियोका अन्त समाजवादसे ही सम्भव है । निर्वाचनकी सफलतासे समाजवादी सरकार बनेगी । वह शनैः-शनैः पूँजीवादी व्यवस्थाको समाजवादमे परिवर्तन करेगी । मैकडानल्डके अनुसार समाजवाद अवश्यंभावी है, अतः ससदीय नीति और प्रचारद्वारा क्रमेण सुधार करना इनकी नीति है। मार्क्सवाद सुधारवादको सड़ियल मानता है । समष्टिवादियोका समाजवादकी स्थापनाका एक ही लक्ष्य होना चाहिये, फिर अन्य विषयोमें मतभेद रखनेवाले भी उसमें सम्मिलित हो सकते हैं । इनके यहाँ सगठनकी एकतापर जोर है, मार्क्सवादियोंकी तरह दर्शनकी एकता आवश्यक नहीं है । अन्य समाजवादियोके विपरीत समष्टिवादियोका यह भी कहना है कि सामन्तो तथा पूँजीपतियोके अनुपार्जित लाभको राज्यद्वारा समाजहितके लिये प्रयोगमें लाना चाहिये । परतु परोपजीवी पूँजीवादका अन्त वह भी चाहता है । किंतु इस कार्यमें समष्टिवादी शीघ्रता नहीं करना चाहते । इनके मतानुसार खजाना, खान, इस्पात, विद्युत्, यातायात आदि व्यवसायोका शीघ्र ही राष्ट्रिय- करण कर लेना चाहिये । साबुन, तेल, वस्त्र आदि व्यवसायोके परिपक्व होनेपर ही उनका राष्ट्रियकरण होना चाहिये । नाई, बढई, होटल आदि व्यवसायोका व्यक्तिगत संचालन ही वे लाभदायक मानते हैं। शनैः-शनैः-वादी नीति अनुभव- की दृष्टिसे हितकर है। इनके अनुसार पूँजीपति आदिकी पूँजी लेनेपर उन्हें उसका मुआवजा देना उचित है । एटलीके मतानुसार ऐसा न करना अन्याय है । जनमत-निर्वाचन ही उनके परिवर्तनका आधार है । डाक्टर डाल्टनके अनुसार पूँजीवाद एव समाजवादमें गुणात्मक नहीं, अपितु परिमाणात्मक भेद है । समष्टि- वादके अनुसार व्यक्तिगत क्षेत्र धीरे-धीरे कम होना और सामाजिक क्षेत्र बढ़ना चाहिये । इनके मतानुसार आधुनिक जनवाद अपूर्ण है। इसकी पूर्णता होनेपर ही राष्ट्रियकरण समाजके लिये हितकर होगा । ब्रिटिश-मजदूर-दल राजतन्त्रको उपयुक्त सुधारोंद्वारा जनतन्त्रीय बनाना चाहता है। बड़ी धारा-सभाको भी वह जनवादीरूप देना चाहता है । उसके अनुसार छोटी धारा-सभाकी सत्ताका वास्तवीकरण जनवादके लिये नितान्त आवश्यक है । यह कमेटियोकी संख्यामें वृद्धिसे सम्भव है । निर्वाचन तथा प्रचार आदिद्वारा जनतन्त्रकी पुष्टि होती है । ये न राज्यको एकवर्गीय संस्था मानते हैं और न वर्ग-सघर्षको समाजका आधार मानते हैं। इनके अनुसार राज्य एक अवयवी है। नागरिकका एवं राज्यका हित अन्योन्याश्रित है । श्रमिकों एवं पूँजीपतियोका हित अवश्य वर्गीय है, तथापि सामाजिक जीवनमें वर्ग-सहयोगकी भी प्रधानता होती है । ये लोग