भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पाश्चात्त्य राजनीति १२१ वैयक्तिक स्वतन्त्रताका भी पूर्ण सम्मान करते हैं, परन्तु यह व्यक्तिवादके विपरीत समाजवादी व्यवस्थामे ही सम्भव मानते हैं । ये साम्राज्यके स्थानमें राष्ट्रमण्डल- का समर्थन करते हैं । औपनिवेशिक देशोंमें भी ये आर्थिक, राजनीतिक प्रगति तथा औपनिवेशिक स्वराज्य स्थापित करना चाहते हैं । सर क्रिप्सने राष्ट्रमण्डलको प्रजातन्त्रीय विकासशील संस्था बना दिया था । यह संस्था केन्द्रीकरण एव विकेन्द्रीकरणका प्रतीक है । समष्टिवाद, पूँजीवाद एव साम्राज्यवादके एकाधिकारका और व्यक्तिवाद तथा रूढिवादका भी विरोधी है । साथ ही मार्क्सवाद पूर्ण औपनिवेशिक स्वराज्य एव श्रमिक एकाधिकारका और अधिनायकवाद एव पूर्ण नवीन समाजका भी विरोधी है । वह डार्विनकी पूँजीवादी दुनियाके वैयक्तिक स्वतन्त्रता और साम्यवादी दुनियाकी अर्थयोजनाका समन्वय करना चाहता है । एक तरहसे समष्टिवाद विभिन्न मतोकी खिचड़ी है । रामराज्य-प्रणालीके अनुसार निश्चित शास्त्रानुसारी सिद्धान्तोके बिना स्थिरता नही हो सकती । मार्क्सवादियों तथा समष्टि-वादियोंका सुन्दोपसुन्दन्याया- नुसारा विरोध इन दोनो ही सिद्धान्तोकी त्रुटियोको स्पष्ट करता है ।

सङ्घवाद

१९ वीं सदीके अन्तमें फ्रान्सीसी सङ्घवाद भी मार्क्सवाद एव अराजकता- वादके आधारपर ही बना है । इसका भी अनेक देशोंपर प्रभाव फैला । कोकरके कथनानुसार यह राज्य-विरोधी, देश-भक्ति-विरोधी, सैन्यवाद-विरोधी, राजनीतिक- दल-विरोधी, संसद्-विरोधी, माध्यमवर्ग-विरोधी और सोवियतवाद विरोधी भी है । उस समयके वोलेञ्जर, ग्रेवी-विल्सन, पनामा आदि अनेक भ्रष्टाचारकाण्ड इसके कारण थे । लेवीनके मतानुसार जिस शासनमें नागरिक स्वय निर्माण करे, वही वास्तविक जनवाद है । मार्क्सके अनुसार ये भी देशभक्तिको ढोंग मानते हैं । श्रमिकोकी न कोई मातृभूमि होती है और न कोई देश । भूखो और नंगोंके लिये मातृ-भूमिका आदर्श खोखला है, यह पूँजीपतियोका प्रचार मात्र है । संघवादी सैनिकोसे कहते थे कि 'वे अपने वर्गीय बन्धुओपर गोली न चलायें, क्योंकि वे भी श्रमिक कुटुम्बके ही सदस्य हैं और अन्तमे उन्हे उन्हीमें रहना है ।' वे युद्ध-विरोधी भी थे । इनके मतमे ससदीय नीति एवं वर्ग-सहयोगसे श्रमिकोंका हित नही हो सकता, इसके लिये वर्ग-सघर्ष ही आवश्यक है । वे तोड़-फोड़में, आम हड़ताल करने और वोटमें भाग न लेनेमें विश्वास रखते थे ।

जॉर्ज सोरेलके अनुसार पूँजीपतियोको सदा भयभीत रखना चाहिये । आम हड़ताल प्रोत्साहन एवं प्रेरणाके द्वारा ही सफल होती है । अराजकतावादियोके,