भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पाश्चात्य राजनीति १२३ एवं संघर्ष विश्वव्यापी है । लॉस्कीके मतानुसार आदर्श नागरिकका सर्वप्रथम कर्तव्य अपनी आत्माकी प्रगति है । वह उसी सत्ताका अनुसरण करेगा, जिसमें उसकी आत्मतुष्टि हो । अतः राज्यसत्ताधारी पदके योग्य तभी हो सकता है, जब वह व्यक्ति प्रगति को पूरी करे । इतिहासके अनुसार संघोंने अनेक बार राज्यकी निरपेक्षताको सीमित किया है । नागरिककी सक्रियता ही सच्चा जनतन्त्र है । यह बहुलवादी सत्तात्मक समाजमें ही सम्भव है । ऑस्टिनके अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय निरपेक्षता भी सम्भव नहीं है । विश्वजनमतको कोई राज्य उल्लङ्घन नहीं कर सकता । लॉस्कीके अनुसार ब्रिटेनका आदेश दृष्टिकोण यह होना चाहिये कि वह विश्व-कल्याणमें अपना कल्याण समझे । उसके अनुसार नैतिक क्षमताको पूर्ण करनेवाली व्यवस्था या नियम मान्य होना चाहिये । यदि अव्यवस्थाका लक्ष्य मानव-प्रगति है, तो वह अन्यायसे कई गुना अच्छी है । व्यक्ति-स्वातन्त्र्य, व्यक्त-प्रगति और व्यक्ति-सत्ताका अस्तित्व ही उनके दर्शनका सार है । फैसीवाद मुसोलिनी एवं हिटलरके फैसीवाद एवं नाजीवादने डार्विनके संघर्षको बहुत महत्त्व दिया और स्पेंसर आदिके इस पक्षको अपनाया कि 'जो संघर्षमें सफल हो वही जीवित रहे ।' अर्थक्रियाकारित्ववाद इसका प्राण है । उत्कृष्ट जातिका यह प्रकृतिसिद्ध अधिकार है कि वह निकृष्ट जातिका शासन करे । उनके अनुसार मानव-इतिहास एक युद्धकी कहानी है । मानव- प्रगति युद्धके द्वारा ही होती है । इसमें भी वर्गों तथा सोरेलकी भाँति अन्ध श्रद्धाको बढ़ाना आवश्यक माना जाता था । उनके मतानुसार 'जन-समूह एक स्त्रीकी भाँति होता है, जो बलवान् एवं नाटकीय व्यक्तिकी तरफ आकृष्ट होता है । इसीलिये राज्य, देश एवं नेताकी भक्तिको खूब प्रोत्साहन दिया गया, रक्तकी पवित्रतापर भी बहुत बल दिया गया, भौतिकताके स्थानपर आध्यात्मिकता, गौरव, मान, चरित्रको मानव-जीवनका लक्ष्य बतलाया गया । राज्यको साध्य और व्यक्तिको साधन कहा गया । इनके मतानुसार सर्वाधिकारी राज्यके संरक्षणमें ही व्यक्तिकी सर्वविध उन्नति सम्भव है, राज्य ही सर्वेसर्वा है । केन्द्रिय कार्य- पालिका एक प्रकारकी अधिनायककी परामर्श-समिति थी। जनसत्ताके स्थानपर नेतृ- सत्ता ही फैसीवादकी विशेषता थी । रूसी समाजवाद एवं फैसीवाद दोनो ही सर्वाधिकारवादी अधिनायकवादी हैं । समाजवादी जनवादका नाम लेते हैं । फैसीवाद जनवादके स्पष्ट विरोधी थे ।