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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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१२४ मार्क्सवाद और रामराज्य जनवाद जनवादकी व्याख्याएँ भी भिन्न-भिन्न ढंगसे होती रही हैं। अब्राहम लिंकनके अनुसार 'जनताका जनताके लिये जनताद्वारा किया जानेवाला शासन ही प्रजातन्त्र या जनतन्त्र माना जाता है। प्रतिनिधि जनवादका आधार राष्ट्रका सामान्य हित होता है। सुशासनके लिये सामान्यहितको कार्यान्वित करनेके लिये कुछ प्रतिनिधियोंका निर्वाचन होता है। यही 'परोक्ष-जनवाद' है।' आलोचकोंकी दृष्टिमें जनवादका अर्थ 'मूर्खोंपर उनकी अनुमतिद्वारा शासन करना' है। पर यह तो परम सत्य है कि जनवादमे जन-शिक्षा, निष्पक्ष जनमत, राजनीतिक दलोंका अस्तित्व, नागरिकोंका शासनमे सक्रिय भाग, सतर्कता और आदर्श निर्वाचन-व्यवस्था अनिवार्य है। इनके बिना तो जनवाद कोरा दम्भ ही है। राजनीतिक दलोंमें अर्धसैनिक-अनुशासन, नेताओका बोलबाला और पूँजीपतियोंका दलोंपर अधिकार आदि जनवादके बाधक ही हैं। पक्षपातयुक्त प्रचार-साधन—रेडियो, पत्र, सिनेमा आदि—भी बाधक हैं। समाचारपत्र आदि अपने दलों एवं मालिकोंका गुणगान करते हैं। इससे विवेकशीलताको धक्का पहुँचता है। सतर्कता भी इसमे परमावश्यक है। सतर्कता स्वतन्त्रताकी बहिन है। कहा जा चुका है कि एतदर्थ विकेन्द्रीकरण और सक्रियता आवश्यक है। इसीलिये स्थानीय स्वशासनादि आवश्यक होते हैं। प्रतिनिधि जनवादमें योग्य उम्मीदवारोंका मिलना, स्वतन्त्र मतदान, निर्वाचकोंकी योग्यता, निर्वाचन-विधिका सरलता और अल्पव्ययिता आदि भी आवश्यक हैं। यह सब इस समय असम्भव-सा ही हो रहा है। फिर भी इस समय इससे अन्य अच्छी व्यवस्था कोई नहीं है। यदि इसे शस्त्र एव धर्म अथवा सामान्य मानव-धर्मसे भी नियन्त्रित कर दिया जाय तो अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, क्षमा, दया, ईश्वर भक्ति आदि सद्गुणोंसे युक्त रामराज्य प्रणालीका जनतन्त्र-राज्य राम-राज्य ही बन सकता है। अराजकतावाद मार्क्सवादियोंसे भी बढ़े-चढ़े अराजकतावादी हैं। इसके प्रवर्तक माइकेल बाकुनिन ( १८१४-१८७६ ) और प्रिंस क्रोपोटकिन ( १८४२-१९१९ ) हुए हैं। उनके मतानुसार क्रान्तिद्वारा पूँजीवादका अन्त होते ही राज्यका भी अन्त हो जाना चाहिये। श्रमिक क्रान्तिके पश्चात् वर्गीय संस्थाका अन्त हो जाना चाहिये। न मर्ज (वर्ग) रहे, न मरीज (राज्य) रहना चाहिये। मार्क्सवादी भी राज्यको वर्ग-विशेषकी ही संस्था मानते हैं। लेनिनके अनुसार भी राज्य दमन-यन्त्र है। किंतु वे विरोधियोंको कुचलनेके लिये उसकी आवश्यकता मानते हैं। परंतु अराजकतावादी इसका विरोध करते हैं। वे कहते हैं कि 'ऐतिहासिक दृष्टिसे राज्य

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