भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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आवश्यक नहीं। राज्यकी उत्पत्तिके पहले भी मनुष्य रहते थे और अपने समूहोंमें सुखी एवं स्वतन्त्र जीवन-निर्वाह करते थे । श्रमिक क्रान्तिके बाद भी वैसे ही बिना राज्यके सुखी एवं सम्पन्न रह सकते हैं । वर्गविहीन समाजमें, जो कि श्रमिक क्रान्तिका फल है, वर्गीय संस्था—राज्यकी आवश्यकता ही क्या है ?' अराजकतावादी कहते हैं कि 'इतिहासके अनुसार राज्य कभी भी न्यायपूर्ण नहीं था। व्यक्तिगत सम्पत्तिके द्वारा ही राज्यका जन्म हुआ है । व्यक्तिगत सम्पत्ति एक चोरी है, राज्य इसका रक्षक रहा है। राज्य सदा ही शोषकोंका पक्षपाती तथा शोषितोंके विपरीत रहा है। जो संस्था सदा मजदूरोंके हितोंको कुचलती रही है, उससे मजदूर कैसे प्रेम कर सकता है।' क्रोपोट्किनने कहा है कि 'पूँजीवादी प्रथाके अभावका नाम ही शासन-प्रथाका अभाव है।' अराजकतावादी राज्यको निरङ्कुशताका प्रतीक मानते हैं, चाहे वह राज्य जैसा भी हो । जैसे राजतन्त्र या कुलीनतन्त्रमें अल्पसंख्यकोंद्वारा बहुसंख्यकोंकी स्वतन्त्रताका अपहरण होता है वैसे प्रजातन्त्रके बहुमतद्वारा भी वैयक्तिक स्वतन्त्रताका अपहरण होता है । अराजकतावादियोंके अनुसार 'कोई मनुष्य दूसरेका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। 'अ' का प्रतिनिधि सभामें ठीक 'अ' की भाँति नहीं बोल सकता । फिर समूहोंका प्रतिनिधि तो कोई हो ही कैसे सकता है ? कोई विधान-विशेषज्ञ धारासभाका सदस्य बनता है । वह सफ़ाई, शिक्षा तथा शासनके सम्बन्धमें अनुभवशून्य होता है। फिर उसके द्वारा इन विषयोंके सम्बन्धमें बनाये नियम किस तरह लाभदायक होंगे ? अतः प्रतिनिधियोंकी सरकार वही होती है जो सभी कार्योंको अयोग्यतापूर्वक करती है। निर्वाचनद्वारा जनताकी सामान्य इच्छाएँतक व्यक्त नहीं हो सकतीं। शक्तिका मद तो शासकमें आ ही जाता है।' अराजकतावादियोंके मतानुसार साधारणतया मनुष्य नेक होता है, परंतु पदपर पहुँचते ही वह बुरा हो जाता है । मनुष्य राजनीतिज्ञ होनेसे ही बुरा हो जाता है । गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीका भी कहना है कि अधिकार पाकर किसे गर्व नहीं होता— प्रभुता पाइ काहि मद नाहीं । अराजकतावादियोंके मतानुसार राज्यके बिना भी मनुष्य खाता, सोता, बोलता, पढता है । जुआड़ी जुएमें हारकर बिना राज्यके दबावके ही रुपया देता है । चोर भी आपसमें समझौता करते ही हैं । कितने ही खेलोंमें खिलाड़ी स्वयं नियम बनाते और उसका पालन करते हैं । इसी तरह राज्यके बिना भी स्वेच्छात्मक संस्थाओंद्वारा सब काम चल सकता है । बाह्य आक्रमणका भी सामना राज्य सेनाकी अपेक्षा जनताकी सेना अधिक अच्छा कर सकती है। अराजकतावादी दण्ड-विधान एवं जेल आदिद्वारा भी सुधारमें विश्वास नहीं करते।