भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

१२६ मार्क्सवाद और रामराज्य क्रोपोट्किनके अनुसार 'जेले पाखण्ड और कायरताकी स्मारक हैं।' वह स्वय रूस और फ्रान्सकी जेलोंमें रहा था । जेलोंके अपने अनुभव बतलाते हुए वह लिखता है कि “जेलोंमें आधेसे अधिक हत्यारे तथा चोर थे, जो अनेक बार जेलोंमें रह चुके थे । दण्डके भयसे प्राणी अपराध नहीं करेगा, यह समझना सर्वथा भ्रम है । एक अपराधी अपराध करते समय यही सोचता है कि वह दण्डसे अपने आपको बचा लेगा । किसी व्यक्तिको फाँसी देनेसे उसके बाल- बच्चे निराश्रित असहाय होकर समाजके लिये अधिक हानिकर सिद्ध हो सकते हैं। अराजकतावादियोंके अनुसार इतिहास बतलाता है कि राज्यने कभी भी उच्च आदर्शकी पूर्ति नहीं की । उसके द्वारा सदा ही दुःख एवं अन्यायको स्थायी- बनानेका प्रयत्न किया गया है। राज्यकर्णधारोंके सदियोंके प्रचारद्वारा राज्य नितान्त आवश्यक वस्तु समझी जाने लगी है। जन्मसे यही सुनते, विद्यालयोंमें पढ़ते और पुस्तकों, लेखों और समाचार-पत्रोंमें राज्यकी आवश्यकताका वर्णन पढ़ते-पढ़ते मनुष्यके मस्तिष्कमें यह बात बैठ जाती है कि राज्य नितान्त आवश्यक संस्था है। कोई भी राजनीतिज्ञ यही कहता है कि 'मुझे अधिकार दीजिये तो मै देशमें घी- दूधकी नदियाँ वहा दूँगा।' राज्यका अन्त हुए बिना इन पाखण्डोंकी समाप्ति नहीं हो सकती। अराजकतावादियोंका अपना कार्यक्रम भी है। उनके मतानुसार 'क्रान्तिके पहले अराजकतावादकी शिक्षा होनी चाहिये। मनुष्य समाज अराजकताकी ओर अग्रसर हो रहा है। क्रोपोट्किन जीवशास्त्रज्ञ था । उसके अनुसार ' मनुष्य जातिने सहयोगद्वारा ही प्रगति की है, प्रतियोगिताद्वारा नहीं । सहयोगद्वारा ही मनुष्यने प्रकृतिपर विजय पायी है, सहयोगद्वारा ही प्राचीन मनुष्य जीवित रहते थे । आधुनिक युगमें भी सहयोगकी मात्रा बढ़ रही है, अतएव स्वेच्छात्मक संस्थाओंकी वृद्धि हो रही है । राज्यके कायोंकी सीमा भी घट रही है । मनुष्य जितना सभ्य होगा उतना ही सहयोगी होता है । सभ्यताकी प्रगतिसे स्वेच्छात्मक संस्थाओंद्वारा राज्य-कार्य सीमित हो रहे हैं । अब थोडे ही प्रयत्नसे राज्यका अन्त एवं स्वेच्छात्मक संस्थाओंका युग आरम्भ होगा, यही अराजकतावादी युग है । वैज्ञानिक तर्कोंद्वारा जनताको अराजकताके पक्षमें कर लेना चाहिये । जनताके मस्तिष्कमें यह विचार कूट-कूटकर भर देना चाहिये कि अराजकतावादी युग अब बहुत ही निकटवर्ती है । जनता स्वागतके लिये तैयार रहे । यह अन्ध- विश्वास नहीं, किंतु वैज्ञानिक सत्य है । इसके लिये क्रान्ति आवश्यक है। अरा- जकतावादी समितियों तथा केन्द्रीय समितिके प्रयत्नसे यह क्रान्ति होगी । इनका भावी समाज साम्यवादी, स्वेच्छावादी और सहयोगवादी होगा । नागरिककी हैसियतसे राज्यसे, उत्पादककी हैसियतसे पूँजीवादसे और मनुष्यकी हैसियतसे शासनमात्रसे स्वतन्त्रता प्राप्त करना अराजकतावादका ध्येय है।