भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 140

पाश्चात्त्य राजनीति १२७ अराजकतावाद 'पूर्णस्वतन्त्रताका युग है। इसमें जो स्वस्थ और योग्य होगा, वह काम करेगा । २४ से ५० वर्षतक काम करनेकी अवस्था होगी । प्रत्येक व्यक्तिको प्रतिदिन ४ या ५ घंटे काम करना होगा। मनुष्य वेतन और प्रोत्साहनके बिना ही काम करेगा। काम करना मनुष्यका स्वभाव है। मनुष्यको सभी सुगम एव रोचक कार्य ही पसंद होते हैं। अतः भावी समाजमें सभी काम सुगम एव रोचक बना दिये जायेंगे । विज्ञानकी प्रगतिसे कोई काम गंदा न रह जायगा । अराज- कतावादमें उत्पादन एव उपभोगकी वस्तुओमें कोई अन्तर न होगा । भोजन, वस्त्र, साइकिल, मोटर आदिकी सहायतासे, जो कि उपभोगकी वस्तु मानी जाती हैं, मनुष्य उत्पादन भी करता है, अतः सभी वस्तुओंका वितरण अराजकतावादी संघोंद्वारा होगा। पहले बच्चो, बूढ़ो, अङ्गहीनोको उनके आवश्यकतानुसार चीजे दी जायेंगी, फिर अन्य लोगोको पहले जीवनोपयोगी वस्तुएँ दी जायेंगी, फिर आरामकी वस्तुएँ । सामाजिक बहिष्कारसे असामाजिक कायोकी स्वतः निवृत्ति होगी । इतनेपर भी सुधर न होनेपर अपराधीका डाक्टरी इलाज होगा, उमे सुधार-गृहमें भेजा जायगा । मनुष्य अपने सामाजिक समझौतेको भग न करेगा । आधुनिक समाज रचनासे ही मनुष्यमें दुर्गुण आये हैं । सघटनके लिये छोटे छोटे प्रादेशिक सघ होगे । इनमें प्रत्यक्षजनवादी प्रबन्ध होगा । इन्हींमे प्रान्तीय समितियाँ बनेगी और पान्तीय समितियोसे देश-समिति बनेगी । वहाँसे यूरोपको प्रतिनिधि भेजे जायेंगे और वहाँसे फिर ससारको प्रतिनिधि भेजे जायेंगे । ये प्रतिनिधि विशेषज्ञ होंगे, अटपज या अज्ञ नही । समस्या-पूर्ति होनेपर इन अस्थायी सघोका भी अन्त हो जायगा । दूमरी समस्या आनेपर पुनः उस प्रकारके विशेषज्ञ प्रतिनिधि भेजे जायेंगे; अर्थात् रोग-निवृत्तिके लिये चिकित्साविशेषज्ञ प्रतिनिधि होगा और खेलके लिये खेलका विशेषज्ञ खिलाड़ी-प्रतिनिधि होगा । स्वतन्त्र स्वेच्छात्मक संघोंका समुच्चय ही अराजकतावादी सघ होगा।' अराजकतावादका सार 'व्यवस्थाका अन्त नहीं, किंतु निरङ्कुशताका अन्त है।' इसके अनुसार 'समाजके बिना स्वतन्त्रतासे शोषण और अन्याय बढता है एव स्वतन्त्रताके बिना समाजवादसे दासता और पशुता बढती है।' कहना न होगा कि इतिहास भी एक विचित्र गोरखधंधा है । इसके द्वारा ही भिन्न भिन्न मतवादी अपना-अपना पक्ष सिद्ध करते हैं । इन लोगोंके इतिहास रामायण, महाभारतके समान महर्षियोंके आर्षविज्ञान एव समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञाके आधारपर नही बनते । इनके इतिहास तो कुछ ईंट-पत्थरो, मुद्राओके आधारपर ही कल्पनाओके खड़े किये गये महल हैं, जिनमें कि प्रायः अटकलपच्चू अनुमान भिड़ाये जाते हैं । आज भी प्राय. विभिन्न समाचार-एजेन्सियोंके तारों,