मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय परिच्छेद विकासवाद प्राणिशास्त्र, शरीर-रचना आजकल धर्म, संस्कृति, राजनीति, भाषाविज्ञान, इतिहास सभी क्षेत्रोंमें विकासवादका सिद्धान्त लागू किया जा रहा है । आधुनिक विज्ञान तथा जड- भौतिकवादका एक प्रकारसे यही मूल हो रहा है । बहुत-से भारतीय विद्वान् भी इसे ही मानकर भारतीय विषयोंकी व्याख्या करते हैं । मार्क्सवादके सिद्धान्तोंका आधार भी बहुत कुछ विकासवाद ही है । अतः विकासवादका सिद्धान्त और उसके समर्थनमें जो तर्क रखे जाते हैं, उनपर भी विचार करना बहुत आवश्यक है । डार्विनका मत चार्ल्स डार्विन विकासवादके ‘प्रवर्तक’ माने जाते हैं । उन्होंने जहाजद्वारा यथासम्भव संसारभरकी यात्रा की । दूर-दूरके टापुओंमें जाकर विविध जातिके जन्तुओंका अवलोकन किया । एक-एक जातिके प्राणियोंमें उन्होंने अगणित भेद पाये । उन्हें इन भेदों, अन्तरोंसे आश्चर्य हुआ । इसीलिये मालथसके प्राणिसंख्या- वृद्धि-विचारको पढकर उन्होंने यह भी देखा कि ‘जीवधारियोंकी संख्या १, २, ४, ८, १६ के हिसाबसे ज्यामितिक रेखागणितके अनुसार बढ़ रही है और खाद्यकी संख्या १, २, ३, ४ के क्रमसे अंकगणितके अनुसार बढ़ती है । लड़ाइयों, बीमारियों तथा अन्य विविध विप्लवोंद्वारा होनेवाले संहारोंसे ही जन-संख्या नियमित है ( आजकल यह मत मान्य नहीं है ) । डार्विनने यह निश्चित किया कि प्रतिद्वन्द्विता एवं संघर्ष स्वाभाविक है । इसमें जो योग्यतम होता है, वही बच सकता है । किसी कारण-विशिष्ट शारीरिक रचना एवं विशिष्ट शक्तिसे ही विशेष प्रदेशोंमें प्राणियोंको प्राण बचानेकी सुविधा होती है । इस तरह जो विशेष निवास-स्थानके योग्य शरीरवाले होते हैं, उन्हींकी संताने भी बढ़ती हैं । औरोंकी जातियाँ या तो नष्ट हो जाती हैं अथवा सुविधाके अनुकूल कही अन्यत्र जाकर उन्हें प्राण बचाना पड़ता है । प्रकृति योग्यतमका चुनावकर उसकी ही रक्षा करती तथा औरोंकी उपेक्षा करती है । अतः वे नष्ट हो जाते हैं । डार्विनके मतानुसार प्रतिद्वन्द्विता प्राकृतिक, शाश्वत एवं सार्वत्रिक नियम है । प्राणियोंकी अभिवृद्धिसे यह स्पष्ट होता है कि यही जीवन-संग्रामका भी मूल है । बलवान् निर्बलोंको नष्ट करके अपनेको सुरक्षित रखते हैं, जिनमें अपने आपको परिस्थितिके अनुसार बना सकनेकी क्षमता होती है, उसीकी संतानवृद्धि भी चलती है । इस जीवन- =घर्षसे विभिन्न गुणों, विभिन्न परिस्थितियोंके अनुसार भेद होते हैं और परम्परानुगत होनेसे वे और भी पुष्ट होते हैं । इसी अवस्थानुरूप परिवर्तनके