भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 143

तृतीय परिच्छेद विकासवाद प्राणिशास्त्र, शरीर-रचना आजकल धर्म, संस्कृति, राजनीति, भाषाविज्ञान, इतिहास सभी क्षेत्रोंमें विकासवादका सिद्धान्त लागू किया जा रहा है । आधुनिक विज्ञान तथा जड- भौतिकवादका एक प्रकारसे यही मूल हो रहा है । बहुत-से भारतीय विद्वान् भी इसे ही मानकर भारतीय विषयोंकी व्याख्या करते हैं । मार्क्सवादके सिद्धान्तोंका आधार भी बहुत कुछ विकासवाद ही है । अतः विकासवादका सिद्धान्त और उसके समर्थनमें जो तर्क रखे जाते हैं, उनपर भी विचार करना बहुत आवश्यक है । डार्विनका मत चार्ल्स डार्विन विकासवादके ‘प्रवर्तक’ माने जाते हैं । उन्होंने जहाजद्वारा यथासम्भव संसारभरकी यात्रा की । दूर-दूरके टापुओंमें जाकर विविध जातिके जन्तुओंका अवलोकन किया । एक-एक जातिके प्राणियोंमें उन्होंने अगणित भेद पाये । उन्हें इन भेदों, अन्तरोंसे आश्चर्य हुआ । इसीलिये मालथसके प्राणिसंख्या- वृद्धि-विचारको पढकर उन्होंने यह भी देखा कि ‘जीवधारियोंकी संख्या १, २, ४, ८, १६ के हिसाबसे ज्यामितिक रेखागणितके अनुसार बढ़ रही है और खाद्यकी संख्या १, २, ३, ४ के क्रमसे अंकगणितके अनुसार बढ़ती है । लड़ाइयों, बीमारियों तथा अन्य विविध विप्लवोंद्वारा होनेवाले संहारोंसे ही जन-संख्या नियमित है ( आजकल यह मत मान्य नहीं है ) । डार्विनने यह निश्चित किया कि प्रतिद्वन्द्विता एवं संघर्ष स्वाभाविक है । इसमें जो योग्यतम होता है, वही बच सकता है । किसी कारण-विशिष्ट शारीरिक रचना एवं विशिष्ट शक्तिसे ही विशेष प्रदेशोंमें प्राणियोंको प्राण बचानेकी सुविधा होती है । इस तरह जो विशेष निवास-स्थानके योग्य शरीरवाले होते हैं, उन्हींकी संताने भी बढ़ती हैं । औरोंकी जातियाँ या तो नष्ट हो जाती हैं अथवा सुविधाके अनुकूल कही अन्यत्र जाकर उन्हें प्राण बचाना पड़ता है । प्रकृति योग्यतमका चुनावकर उसकी ही रक्षा करती तथा औरोंकी उपेक्षा करती है । अतः वे नष्ट हो जाते हैं । डार्विनके मतानुसार प्रतिद्वन्द्विता प्राकृतिक, शाश्वत एवं सार्वत्रिक नियम है । प्राणियोंकी अभिवृद्धिसे यह स्पष्ट होता है कि यही जीवन-संग्रामका भी मूल है । बलवान् निर्बलोंको नष्ट करके अपनेको सुरक्षित रखते हैं, जिनमें अपने आपको परिस्थितिके अनुसार बना सकनेकी क्षमता होती है, उसीकी संतानवृद्धि भी चलती है । इस जीवन- =घर्षसे विभिन्न गुणों, विभिन्न परिस्थितियोंके अनुसार भेद होते हैं और परम्परानुगत होनेसे वे और भी पुष्ट होते हैं । इसी अवस्थानुरूप परिवर्तनके