भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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विकासवाद १३१ कारण ही विभिन्न जातियोंका प्राकट्य हुआ। यह भिन्न या स्वतन्त्र सृष्टि नहीं।' इस तरह निरीक्षण, अनुमान एव परीक्षणद्वारा डार्विनने विकास सिद्धान्त स्थिर किया। यात्राद्वारा अनेकविध प्राणियोंका निरीक्षण किया एव प्राणि-संख्या-वृद्धिका सिद्धान्त देखकर प्रतिद्वन्द्विता एवं उसमे योग्यतमके ही रक्षणका अनुमान किया। पश्चात् उसने परीक्षा आरम्भ की। उन्होने देखा कि घोडे एव भेड़ पालनेवाले लोग बहुतोंको छाँटकर अपने मतलबके जानवरोका संग्रह कर लेते हैं और उनमें इच्छानुरूप विभिन्नता उत्पन्न करते हैं। इसके अतिरिक्त, पशु-पक्षियोकी बहुत-सी जो जातियाँ नष्ट हो गयी उनका वर्तमान जातियोंसे बहुत कुछ सादृश्य उपलब्ध होता है। भेद इतना ही है कि पहली जातियाँ वर्तमान जातियों-जैसी उत्तमताको प्राप्त- नहीं हुई थी। पृथ्वीकी वर्तमान जातियोंका सादृश्य भी तीसरा प्रमाण है। इससे निश्चय किया जाता है कि किसी समय छोटे जन्तुओकी एक ही जाति रही होगी। उनके ही सूक्ष्म अंडे या बीज जल, वायु आदिके प्रवाहसे समस्त भूमण्डलमें फैले । उन्हींमेंसे विकासक्रमसे वर्तमान जातियाँ निकलीं । विकासका चौथा एक यह भी कारण है कि 'गर्भावस्था मे सभी प्राणी एक से ही देख पडते हैं। अनेक जन्तुओंमें कितनी ही आरम्भिक इन्द्रियाँ गर्भावस्थामें पायी जाती हैं, जिनका पूर्ण विकास नहो होता। इससे भी प्राकृतिक चुनाव एव योग्यतम रक्षाका सिद्धान्त सिद्ध होता है।' फिर भी डार्विनने यह माना कि 'मेरी यह कल्पना तभी सिद्धान्तित होगी, जब चिरकाल बीतनेपर भी वैज्ञानिक परीक्षामे इसके विरुद्ध कोई बात न मिले।' अध्यात्मवादी सिद्धान्तकी दृष्टिसे डार्विनकी इस कल्पनामें कोई अपूर्व बात नहीं। वेदान्तियोका ब्रह्म, साख्योकी प्रकृति अनन्त प्रपञ्चका भण्डार है। उसमें शक्तिरूपसे सभी वस्तुएँ रहती हैं। प्रथम कारणावस्थामे कार्य-शक्तियाँ अव्यक्त रहती हैं, क्रमेण सहकारी सापेक्ष होकर व्यक्त होती हैं। धरतीमें ही अनगिनत बीज रहते हैं। विशिष्ट जल वायुके योगसे अकूरित, पुष्पित, फलित होनेपर उनके भेद दृष्टिगोचर होते हैं। मिट्टीके विभिन्न बर्तनो; सुवर्णके अनेक भूषणोकी कारणावस्था तो एक-सी होती है। सहकारी मिलनेपर कुलाल एवं सुवर्णकारके इच्छानुसार कार्यावस्थामें उनके अनेक रूप व्यक्त होते हैं। सारूप्य- वैरूप्य ही तो जगत्की विचित्रताका रूप है। नैयायिकोंने भी पदार्थोंके साधर्म्य- वैधर्म्यका विश्लेषण किया है । एक-एक अवान्तर कारणावस्था या मूल कारणावस्थासे भिन्न-भिन्न चेतनाचेतन वस्तुओका विकास या प्रादुर्भाव हुआ है। ये सब बाते अध्यात्मवादमें हजम हो जाती हैं। सगर्भ भी प्राणियोंमें दृष्ट ही है। कई लोगोने यह भी दृष्टान्त रखा है कि एक पात्रमें एक सेर किशमिश या मुनक्का रख दे तो कुछ दिनोमे उसमें एक ढगके कीट उत्पन्न हो जाते हैं।