मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाथ अविच्छिन्न मिलावट ही जीवनतत्त्व है । जैसे-जैसे वाह्य एवं आन्तरिक सम्बन्धोंका साम्य होता है, वैसे-वैसे इन्द्रिय एवं शरीरसम्बन्धी विकासके क्रममें उच्चता होती है ।' मनस्तत्त्वके सम्बन्धमें उसने कहा है कि 'मनस्तत्त्व विज्ञानगम्य नहीं है । जिन अवस्थाओंमे वह प्रकाशित होता है, केवल उन अवस्थाओंकी अभिव्यक्ति ही विज्ञानाधीन होती है ।' उसके मतानुसार 'स्नायुनिष्ठ आघातसे ही संवित्की अभिव्यक्ति होती है, संवेदन और उसके सम्बन्धोंसे ही चित्त बनता है । संवेदनोंके स्मरण, परस्पर सम्बन्ध और संघीभावसे समस्त संवित्का बनना वह मानता है । इसीलिये चित्तकी भिन्न वृत्तियोंमें परस्पर अत्यन्त भेद नहीं होता । चित्त व्यापारमे प्रतिफलन, स्वाभाविक क्रिया, स्मरण और विवेक ये क्रम हैं । संवित्के जो आकार व्यक्तियोंमें स्वाभाविक और सहज हैं, वे भी जातिमें किसी-न-किसी समय अनुभवसे ही प्राप्त माने जाते हैं । पीछेसे स्नायुजालमें जमकर वे परम्परागत हो जाते हैं ।' स्पेंसरने इसी प्रकार अनुभववाद और सहजज्ञानवादका साम्य स्थापित किया । किंतु यहाँ भी यह प्रश्न बना ही रहता है कि प्रारम्भिक मनुष्योंमें ऐसे ज्ञानकी नींव किस प्रकार पड़ी ? प्रारम्भकालमें अनुभव किस प्रकार स्वतन्त्र हो सकता है ? वस्तुतः स्नायुके आघात अथवा विषयेन्द्रिय-सन्निकर्ष, शब्द-प्रमाण या व्याप्तिज्ञानसे सात्त्विक मनकी ही विषयाकाराकारित वृत्ति उत्पन्न होती है । उसी वृत्तिपर अभिव्यक्त आत्मचैतन्यसे ही वस्तुका प्रकाश होता है । जैसे पार्थिव होने- पर भी सामान्य पाषाणोपर सूर्यका प्रतिबिम्ब नहीं पडता, परंतु स्फटिकपर प्रतिबिम्ब पडता है, वैसे ही सामान्य जड पदार्थोंपर आत्मचैतन्यका प्रतिबिम्ब नहीं पडता, परंतु सात्त्विक अन्तःकरण-परिणामरूप वृत्तियोपर आत्मचैतन्यका प्रतिबिम्ब पड़ता है । मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार आदि एक ही वस्तुके अवस्थाभेद हैं । वेदान्त- सिद्धान्तानुसार अन्त:करण सूक्ष्म पञ्च महाभूतोके समष्टि सात्त्विक अंशका परिणाम है । ग्राह्य ग्राहकभाव सजातीयमें ही दृष्ट है । पार्थिव घ्राणेन्द्रियसे पार्थिव गन्धका ग्रहण होता है । तैजस चक्षुरिन्द्रियसे तैजस रूपका ग्रहण होता है । इसी तरह आकाशीय श्रोत्रेन्द्रियसे आकाशीय शब्दका, वायवीय त्वगिन्द्रियसे वायवीय स्पर्शका और जलीय रसनेन्द्रियसे जलीय रसका ग्रहण होता है । मनसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध — इन पाँचों ही विषयोंका ग्रहण होता है । अतः उसे सूक्ष्म पञ्चमहाभूतोके समष्टि सात्त्विक अंशका परिणाम मानना प्रामाणिक है । छान्दोग्य उपनिषद्में तो स्पष्ट ही अन्वय व्यतिरेकसे मनस्तत्त्वको अन्नमय सिद्ध किया गया है । अन्नके अभावमें मनकी कलाएँ घटती हैं और अन्नके अस्तित्वमें उसकी कलाएँ उपोद्वलित होती हैं— 'अन्नमयं हि सौम्य मनः ।' संकल्प, विकल्प, स्मरण, निश्चय, अभिमान आदि सब इस चित्त या मनके ही परिणाम हैं । अभिव्यक्त