मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविकासवाद १३७ स्पेंसर इस विकासकी तीन श्रेणियाँ मानता है-- (१) 'शक्तिका केन्द्रस्थ होना, जैसा कि बादलोंके इकट्ठा होनेमें प्रारम्भिक बदलीका और कीटाणुओंके जीवन-केन्द्रोंमें देखा जाता है। (२) भेदीकरण--मूलका बहिरावेष्टनसे अलग होकर उसमें आन्तरिक भेद होना और (३) स्पष्टीकरण--अर्थात् भेदोंका निश्चितरूप एव आपसमें सम्बन्धित होकर एक सुव्यवस्थित पूर्णरूप धारण करना । विकास और विच्छेदका भेद यही है कि विकासमें भेदके साथ सङ्गठन है और विच्छेदमें सङ्गठनका अभाव है। विकासकी गति अनिश्चित सम्बन्ध और व्यवस्थारहित एकरूपतासे निश्चित सम्बन्ध और व्यवस्थापूर्ण अनेकरूपताकी ओर होती है । उदाहरणार्थ निम्नश्रेणीके जीवोमे विशेष इन्द्रियभेद नहीं होता, कहीं-कहीं लिङ्गभेद भी नहीं होता। एक (स्पर्श) इन्द्रियमे ही सब इन्द्रियोंका कार्य चलता है। परन्तु जैसे-जैसे जन्तु विकासकी श्रेणीमें बढ़ते जाते हैं, वैसे वैसे उनमें इन्द्रियभेद बढ़ता जाता है और साथ ही विभिन्न इन्द्रियोंमे सम्बन्ध भी स्थापित होता जाता है। मनुष्यमें सब इन्द्रियाँ स्पष्ट होती हैं और तभी अपने-अपने सम्बन्धमे मनुष्य-शरीरकी रक्षा एव वृद्धिमें योग देती हैं।' स्पेंसरके मतानुसार 'विकासका यह नियम सभी विषयोंमें लगता है।' साख्यानुसार कारणगत प्रकाश, हलचल एव अवष्टम्भ आदि गुणोंके अङ्गाङ्गीभावरूप वैषम्यके अनन्तर ही तिरोधायक आवरणसे बहिर्भूत होकर कार्यकी स्पष्टता होती है। बीज और मृत्पिण्डके विघटनपूर्वक अङ्कुर एवं घटादिके आविर्भावानुकूल संघटनक्रियासे ही अङ्कुर एवं घटकी अभिव्यक्ति होती है । अनेकता एवं व्यवस्था भी साङ्ख्यानुसार घटके समान अभिव्यक्त ही होती है । अपूर्वकी उत्पत्ति नहीं होती । चेतना एव इन्द्रियाँ भी विद्यमान ही थीं, केवल उनकी अभिव्यक्ति ही होती है। अभिव्यक्तिमें ही क्रम मान्य हे । अत्यन्त अविद्यमानका बालूसे तेलके समान कभी भी आविर्भाव नहीं होता । उसी तरह सत्का नाश भी नहीं होता । विकासमें 'भूतपदार्थका एकीकरण और गतिका वितरण होता है विच्छेदमें गतिका तिरोभाव और भूत पदार्थका अनेकीकरण या वितरण होता है। यह विकास और विच्छेदका नियम विश्वके लिये एक साथ ही प्रयुक्त नहीं होता, किंतु एक भागमें विकास तो दूसरे भागमें विच्छेदका आरम्भ होता है। सांख्यमतानुसार 'गति तो हर समय ही रहती है, किंतु एक कारणमें अनेक कार्य युगपत् नहीं हो सकते । अतः कार्यान्तरके आविर्भावके लिये प्रथम कार्यका तिरोभाव आवश्यक होता है, जैसा कि घटके आविर्भावके लिये पिण्डावस्थाका तिरोभाव अपेक्षित होता है।' इसीलिये विकास-विच्छेदका क्रम भी सङ्गत हो जाता है । स्पेंसरने जीवशास्त्रका तत्त्व बतलाते हुए कहा है कि 'आन्तर सम्बन्धोंके