मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ मार्क्सवाद और रामराज्य और फिर उसका भी द्रष्टा ढूँढना पड़ेगा। इस तरह अनवस्था-प्रसङ्ग होगा। सर्वद्रष्टा जिससे दृश्य होगा उसका द्रष्टा नहीं हो सकेगा; क्योकि कोई भी दृश्य अपने द्रष्टाका द्रष्टा नहीं हो सकता। ऐसी स्थितिमें उसको सर्वद्रष्टा नहीं कहा जा सकता। अतः प्रमाण व्यापारसे अज्ञाननिवृत्ति तथा स्वप्रकाशरूपसे आत्माका बोध मानना उचित है। इसी तरह प्रत्यक्ष, अनुमान, आगमादि प्रमाणों- के आधारपर काल आदिका भी ज्ञान होता ही है। कुछ भी हो, अज्ञेयरूपसे भी तो विद्यमान वस्तुका एक ज्ञान मानना पड़ता है। इसीलिये स्पेसर आत्मा-अनात्मा, जड-चेतनको शक्तिका ही रूपान्तर मानता है। परंतु विचार करनेपर यह भी सत्य नहीं ठहरता। आत्मा तो मूल पदार्थ है, शक्ति उसका अंश है। जैसे वह्नि- मे दाहिका शक्ति होती है, वैसे ही आत्मामें प्रपञ्चोत्पादिनी शक्ति मान्य होती है। सांख्य-मतानुसार भी आत्मा एक स्वतन्त्र पदार्थ माना जाता है। स्पेसरके मतानुसार 'शक्तिकी सार्वकालिक सत्ता ही मूल परमार्थ है। उसीसे द्रव्यकी अनश्वरता, गतिका सातत्य, शक्तियोके सम्बन्धकी नित्यता अर्थात् नियमोंकी एकरूपता, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, शक्तियोका परिणाम एवं तुल्यपरिवर्त्तिता, गतिका दिङ्नियम अर्थात् उसकी अल्पतमावरोध, रेखानुसारिता, गुरुत्वाकर्षणानुसारिता, इन दोनोका योग और गतिका अविच्छिन्न प्रवाह आदि निकलते हैं। उसी शक्तिके नियम सब प्रमेय पदार्थोंमें लगे हुए हैं। इन नियमोंमें सबसे व्यापी नियम विकासका नियम है। इसके अनुसार द्रव्यका सदा ही आन्तर परिवर्तन होता रहता है। संसारका प्रत्येक अवयव और समस्त संसार सदा ही 'विकास' एव 'विच्छेद' इन दो व्यापारोंमें लगा है। विकासावस्थामें द्रव्यका सङ्घीभाव और विच्छेदावस्थामें शिथिलीभाव होता है।' वस्तुतः यह अंश सांख्योंके मतसे मिलता-जुलता है। वे भी प्रकृतिको ही आत्म- भिन्न सब व्यक्त प्रपञ्चका मूल मानते हैं। 'चलञ्च गुणवृत्तम्' के अनुसार व्यक्त- अव्यक्त सभीको गतिशील मानते हैं— क्षणपरिणामिनो हि भावा ऋते चितिशक्तेः। चितिशक्तिको छोडकर सभी भावोंको वे क्षणपरिणामी मानते हैं। उनके असङ्गचेतन व्यापक पुरुष स्वतन्त्र माने जाते हैं। सांख्यके सद्वादका ही प्रत्यभिज्ञान इस मतमें भी होता है। सांख्यानुसार सत्का विनाश एवं असत्की उत्पत्ति नहीं होती। केवल अवयवोंके सङ्घीभावसे आविर्भाव या विकास होता है एवं अवयव-विच्छेदसे तिरोभाव होनेसे ही नाशका व्यवहार होता है। प्रकृतिके स्वभावका उसके परिणामोंमें अनुवृत्त होना भी उन्हे मान्य है। प्रकृति सुख- दुःख-मोहात्मक है, अचेतन है। इसीलिये उसका परिणाम प्रपञ्च भी सुख-दुःख- मोहात्मक एवं अचेतन है।