मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविकासवाद १३५ भी जड़तत्त्व नियमित क्रमिक विकास करनेमें सर्वथा ही असमर्थ ठहरते हैं। लोकमें विकासकी नियमित योजनाका निर्माण एवं उसका संचालन चेतनद्वारा ही होता है अतः प्राकृतिक विकासके प्रोग्राममें चेतन ईश्वरका हाथ होना अनिवार्य है। अतएव प्रायः संसारका मूल कुछ रहस्यमय या अप्रमेय है। उसका सम्पूर्णरूपसे कोई भी वर्णन नहीं कर सकता, ऐसा विकासवादी भी मानते हैं। इन लोगोंका कहना है 'दिक्, काल, द्रव्य, वृत्ति, शक्ति, चित्त, आत्मा, परमात्मा आदि प्रत्यय हैं। उनका मूल एवं स्वभाव दुर्बोध एवं अनिर्वचनीय है।' अवश्य ही केवल प्रत्यक्ष प्रामाण्यवादीके लिये उक्त वस्तुओंका निर्णय कठिन है, परंतु अनुमान, आगम आदिद्वारा तो कोई भी वस्तु अज्ञेय नहीं है। हर्बर्ट स्पेन्सर तो सभी मतोंका आधार प्रत्यक्ष ही मानता था। इसलिये उसके मतानुसार 'न कोई मत अत्यन्त सत्य है, न अत्यन्त असत्य ही। अतः सभी मतों- का सामान्यांश ग्रहण करना ठीक है।' इसी आधारपर वह उक्त पदार्थोंको 'अज्ञेय' मानता है। उसके मतानुसार विशेष वस्तुओंको सामान्यमें और सामान्य- को पुनः उच्च सामान्यमें ले आना चाहिये। अन्तमें उस परासत्तामें ही स्थिरता होनी चाहिये। जिसका किसीमें अन्तर्भाव नहीं होता, उसे 'अनिर्वचनीय' कहा जाता है। उसके मतानुसार 'ज्ञान सम्बन्ध-ग्रहण-स्वरूप होता है, अतः एक वस्तु- का वस्त्वन्तरसे भेद सादृश्यादिके बिना नहीं हो सकता। अप्रमेयमें भेद-सादृश्य आदिका ग्रहण होना असम्भव है।' स्पेंसरके मतानुसार 'ईश्वरका स्वरूप क्या है यह नहीं जाना जा सकता। किंतु सत्ता मानी जाती है। सम्बन्ध ग्रहण सापेक्ष- बोध ईश्वरमें नहीं पहुँचता, अतः सम्बन्धातीत अप्रमेय कारणशक्ति मान्य होनी चाहिये।' वस्तुतः स्पेंसरके इस तर्कसे तो किसी भी वस्तुका बोध नहीं हो सकता, क्योंकि एक वस्तुसे भिन्न सभी वस्तुओंमें उसका किसी-न-किसी ढङ्गका सम्बन्ध रहता ही है। फिर एक अल्पज्ञ व्यक्तिको सब वस्तुओंका ज्ञान सम्भव नहीं और न सबके साथ उसके सम्बन्धका ही ज्ञान हो सकता है। इस तरह सभी ज्ञान भ्रमात्मक ही ठहरेंगे। अतः 'सप्रकारक, निष्प्रकारक, दोनों ही प्रकारके ज्ञान होते हैं।' यही सिद्धान्त मानना पड़ेगा। भले ही द्रव्यका गुण क्रिया- समन्वितरूपसे ही ग्रहण हो, फिर भी वस्तु-स्वरूपका भी ग्रहण होता ही है। रूप, सम्बन्ध आदि पदार्थोंका स्वरूप-ज्ञान भी होता है। एतावता ईश्वर, काल आदि भी अप्रमेय, अज्ञेय नहीं कहे जा सकते। हाँ, सर्वज्ञाता, सर्वद्रष्टा दृश्य या ज्ञेय नहीं हो सकता; क्योंकि एक ही स्वयं ज्ञाता और ज्ञेय दोनों नहीं हो सकता। ऐसा होनेसे कर्म-कर्तृ-विरोध होता है। वही कर्त्ता अपनी क्रियाका कर्म नहीं बन सकता। द्रष्टाका भी द्रष्टा यदि अन्य माना जाय तो फिर उसका द्रष्टा-