भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 147

१३४ मार्क्सवाद और रामराज्य भी हो रहे हैं। इस न्यायसे पहलेके समान आज भी बंदरोंसे मनुष्योंकी सृष्टि क्यों नहीं हो रही है ? इस तरह मनुष्येतरसे मनुष्योंकी उत्पत्तिका न दिखायी देना, मछली एवं बंदर आदिसे आज भी मछली एवं बंदरोंकी उत्पत्तिका दिखायी देना विकासके विरुद्ध ही है। डार्विनके मतानुसार 'प्रतिद्वन्द्विता एवं संघर्ष ही शाश्वत और सार्वत्रिक है। सहानुभूति, परोपकार, दया आदि भी स्वार्थके लिये ही है। कभी मनुष्य मनुष्यका बर्बर संहारक हो जाता है, कभी बंदर भी अपने मालिकके लिये प्राणतक दे देता है। प्रशंसा-योग्य कर्मोंमें प्राणियोंकी प्रवृत्ति होती है, निन्दित कामोंसे मनुष्यकी निवृत्ति होती है, धीरे धीरे अभ्यास हो जाता है। परार्थ-प्रवृत्ति एवं सहानुभूतिके कार्योंमें प्रवृत्ति होने लगती है। इससे प्रतिद्वन्द्विता सिद्धान्तमें कोई बाधा नहीं पडती।' अध्यात्मवादी ठीक इसके विपरीत कहते हैं कि स्वाभाविक अभिन्नता, समानता एव सहानुभूति है। द्वैत, भेद, कलह, प्रति- द्वन्द्विता, क्षुधा, स्वार्थ आदि ही अविद्या, काम, कर्मके अनुसार आदत पड़ जानेसे स्वाभाविक-से प्रतीत होते हैं। ईश्वरके सम्बन्धमें डार्विनने कुछ नहीं कहा। परंतु लोगोंके दुःख देखकर उसे कभी कभी यह संदेह अवश्य होता था कि 'यदि कोई परमकारुणिक, सर्वज्ञ जगत्‌का निर्माता या शासक है तो उसे अपने उत्कृष्ट ज्ञानद्वारा दुःखरहित ही संसार बनाना चाहिये था।' परंतु ईश्वरवादी तो ईश्वरके समान ही उसके अंश- भूत चेतन जीवो एवं अविद्याको भी अनादि मानते हैं और अविद्यावान् जीवोंके कर्मानुसार ही सृष्टि होती है। अतः सुख-दुःख एव तत्तत्साधनोंसे पूर्ण जगत्‌की विचित्रता मान्य होती है। विवेक, वैराग्य तत्त्वसाक्षात्कारके लिये सुखकी अपेक्षा दुःख अधिक उपकारक है, अतः संसारमे दुःखका भी अस्तित्व ईश्वरको अभीष्ट है। जैसे लौकिक शासक अपराधीकी आत्मशुद्धिके लिये कभी कभी दण्ड-विधान आवश्यक समझते हैं, वैसे ही ईश्वर भी। स्पेंसरकी मीमांसा हर्बर्ट स्पेंसर, हेमिल्टन एवं माइन्सेल आदि विकासानुयायियोंने ईश्वर माननेमें कई आपत्तियाँ उपस्थित की हैं, जैसे यदि 'स्वतन्त्र जगत्-कारण ईश्वर जगत् बाह्य है तो उसका जगत्‌से कोई सम्बन्ध ही नहीं। बिना सम्बन्धके कोई ज्ञान ही होना कठिन है। यदि जगत्‌मे सम्बन्ध हुआ, तो स्वतन्त्रता कैसे रह सकती है।' इत्यादि। परंतु ईश्वरवादियोंकी दृष्टिमें इन तर्कोंका कोई महत्त्व नहीं है। कारण, ईश्वर जगत्‌के भीतर रहता हुआ भी कमल-पत्रवत् निर्लेप रहता है, अतः सबको जानता हुआ भी स्वतन्त्र रहता है। शासक भी कारागारमें जाता है, किंतु दण्ड भोगने नहीं अपितु सुव्यवस्थाके लिये। वस्तुतः सर्वद्रष्टा, सर्वशक्तिमान्, स्वतन्त्र परमेश्वरसे ही नियमित विकास भी बन सकता है। अचेतन प्रकृति या अन्य कोई