मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदिखायी क्यों नहीं देता ? किञ्चिन्मात्र सादृश्यसे अन्यत्र अन्य रूपमें परिणाम नहीं सिद्ध किया जा सकता । कितने ही पौधे समान ढङ्गके होते हुए भी गुणोंमें भिन्न हैं। कोई जहर है तो कोई अमृत है । समान वंशोंमे भी हय, अश्व, अर्वा आदिमें जातिभेद माना जाता है । मनुष्योंमें भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रादि जातिभेद मान्य होता है। वृक्षों, पशुओं तथा जलचर जन्तुओंमें अवान्तर बहुत अधिक समानता होनेपर भी उनमें जाति, गुण आदिका भेद होता है। शुभ-अशुभ कर्मोंके अनुसार ही जातिभेद शास्त्रीय दृष्टिसे मान्य है । जाति, आयु, भोगका आरम्भक कर्म ही प्रारब्धकर्म माना जाता है । कार्यकी विलक्षणता कारणकी विलक्षणतासे ही सम्भव होती है। अतः कर्म-वैचित्र्यसे जाति-वैचित्र्यकी मान्यता संगत है । विभिन्न ढङ्गके बीजोंसे विभिन्न ढङ्गके अङ्कुरोंकी उत्पत्ति होती है । विभिन्न प्राणियोंके सजातीय शुक्र-शोणितसे सजातीय प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है । विजातीय प्राणियोंसे विजातीयोंकी उत्पत्ति अदृष्टचर है । विजातीय शुक्र-शोणितोंसे भी सन्तानोत्पत्तिमे बाधा पड़ती है । फिर इस दृष्ट कार्य-कारणभावको छोड़कर अदृष्टकी कल्पना सर्वथा अपार्थक है । जब भिन्न-भिन्न परम्पराएँ उपलब्ध हैं ही, तब बीजरूपसे तथा शक्तिरूपसे उन्हे स्वतन्त्र ही क्यों न माना जाय ? निम्बसे आम्रकी उत्पत्ति नहीं होती, बालूसे तैल नहीं निकलता तथा अश्वसे महिषकी उत्पत्ति नहीं होती क्योकि निम्ब आदिमें आम्र आदिका शक्तिरूपसे अस्तित्व नहीं है । 'असत्की उत्पत्ति और सत्का विनाश नहीं होता,' यह सिद्धान्त दृढ है । इसीलिये बन्दरोंसे मनुष्योंकी उत्पत्ति दृष्ट नहीं होती । इस तरह एक मूल प्रकृति या कारणब्रह्मसे ही समस्त प्रपञ्चकी उत्पत्ति होती है । सर्वकार्यानुगुण शक्तियाँ कारणमे रहती हैं । राजनीति के सम्बन्धमें भी विकासवादियोंकी ऐसी ही कल्पनाएँ हैं । स्पेंसरका यह भी कहना है कि 'गरीबी एव निर्बलता भी प्राकृतिक है । जो योग्य होता है, वही जीवित रहता है । जो परिस्थितिके अनुकूल अपने-आपको' नहीं बना सकते, ऐसे प्राणी मर जाते हैं । उसी तरह जो व्यक्ति वैज्ञानिक परिवर्तनके साथ अपनेको परिवर्तित नहीं कर सकता और विपरीत परिस्थितिमे नहीं रख सकता, वही गरीब होता है । उसके सुधारमें शासनको हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये ।' इसके मतानुसार 'यदि कोई अध्यापक उष्णता न सह सकनेके कारण मूर्च्छित हो गया हो तो विद्यार्थियोंको उसे वैसे ही मूर्च्छित छोडकर चल देना चाहिये और उसे स्वयं परिस्थितिसे मुकाविला करनेके लिये छोड़ देना चाहिये ।' विज्ञान या साइन्समे भी पर्याप्त मतभेद ह । डार्विन, हेकल आदिके समयके प्राचीन साइन्सने आत्मा, ईश्वर, पुनर्जन्म आदिके सम्बन्धमें बहुत-सी उल्टी मा० रा० १०-