भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 159

१४६ मार्क्सवाद और रामराज्य बातें कही, परंतु सत्यकी खोज करनेवाले वैज्ञानिकोकी खोज निरन्तर चल ही रही है। लगभग अर्धशताब्दीसे तो विज्ञानने ही प्राणिविज्ञान-सिद्धान्तमें पर्याप्त रद्दो-बदल कर दिया । विकासवाद तो वस्तुतः खण्डित ही हो गया, किंतु स्वेच्छाचारियोंके लिये आत्मा, ईश्वर, कर्मफल, पुनर्जन्म आदि जहरके समान कडुए प्रतीत होते हैं । अतः वे लोग अब भी उसी जड़वाद विकासवादकी रट लगा रहे हैं, क्योंकि विकासवादमें ईश्वर; धर्म आदिसे छुट्टी मिल जाती है । अतः जो वस्तु वैज्ञानिकोंकी दृष्टिसे भी गलत सिद्ध हो चुकी, उसी विकासवाद— जड़वादके पीछे उच्छृङ्खल लोग पड़े हुए हैं । ‘साइंस ऐण्ड रिलीजन’ ( धर्म एव विज्ञान ) पुस्तकमें सर ओलिवर जोजेफ लाज एफ० आर० एस० डी० एस-सी०, एल्-एल्० डी०, प्रो० जॉन एम्ब्रोज, प्रो० डब्ल्यू० बी० बाट्मली, प्रो० एडवर्ड हल, जॉन एलन हार्कर, प्रो० जर्मन सिम्स उडहेड तथा प्रो० सिल्वेनिस फिलिप्स थॉम्पसन—इन सात प्रसिद्ध वैज्ञानिकोके मन्तव्योंका उल्लेख है । इस पुस्तकमे ईश्वर, जीव, धर्म एव विकासके सम्बन्धमें डार्विन आदिके मतका खण्डनकर आस्तिक पक्षका समर्थन किया गया है । वर्तमान वैज्ञानिक प्राचीन वैज्ञानिकोको ‘पुराना’ कहकर उनके मतकी उपेक्षा करते हैं। प्रो० बाट्मली कहते हैं कि ‘हेकलका प्राचीन भौतिकवाद वर्तमान युगसे बिल्कुल दूर है। हेकलकी ‘दि रिड्ल आफ युनिवर्स’ का उत्तर ‘रद्दी विचार एवं नूतन उत्तर’ ( दि ओल्ड रिड्ल एण्ड न्यूएस्ट आसर ) पुस्तकमे दिया गया है । उस पुस्तकमें यह भी कहा गया है कि ‘नवीन वैज्ञानिक पहलेकी अधी प्रकृतिके हाथमें न रहकर प्रकृतिको अपने हाथमे रखनेकी शिक्षा देते हैं । विकासको मनमाना नहीं, प्रत्युत नियमबद्ध होकर कार्य करनेवाला बतलाते हैं । विकासके द्वारा परमात्माका दर्शन करते हैं । डार्विन, हक्सले, हेकल आदिके समयका संसार केवल प्राकृतिक था, परंतु अबके वैज्ञानिकोको सर्वज्ञ परमेश्वर भी स्वीकृत है। डार्विनकी प्रकृति भी अब ईश्वरसे नियन्त्रित है। साइकोलाजी ( मनोविज्ञान ), फ्रीनालोजी ( मस्तिष्क.शास्त्र ) और स्पिरिचुअलिज्म ( आधुनिक परलोकवाद ) के पण्डित जीवका अस्तित्व एवं उसका जन्मान्तर भी स्वीकृत करते हैं ।’ इस तरह कर्मोद्वारा जीवोंकी अवस्था बदलती है । मनमानी प्रकृति मक्खीसे चिड़िया और चिड़ियासे साँप नहीं बना सकती । सर ओलिवर लाजका कहना है कि ‘विकास तो कुड्मल ( कलिका ) से पुष्प एव बीजसे अंकुर बनानेवाला निश्चित नियम है। नवीन विज्ञानके अनुसार कई प्राणी ऐसे पाये गये हैं, जिन्होंने अपने आदि जन्मसे लेकर अबतक अपना रूप बिल्कुल नहीं बदला । यही ‘स्थिर शरीरवाले’ कहे जाते हैं । हेकल आदिके अनुसार