मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविकासवाद १८७ मनुष्यको हुए ८ लाख २० हजार वर्ष हुए। इसी बीच उसने इतनी उन्नति की। पर मि० जॉन टी० रोडको नेवादा में एक ६० लाख वर्षका पुराना जूतेका तला पत्थरकी दशामें मिला, तबसे तो विकासवाद सर्वथा ही धराशायी हो गया। पृथिवीकी आयु अबतक जितने भी प्रकारोंसे सिद्ध की गयी, उनमेंसे कोई भी प्रकार इस जूतेके कारण विकासवादकी सब कड़ियोंको उपपन्न करनेमें समर्थ नहीं है। अमीबासे लेकर मनुष्यतक न जाने कितने कड़ियाँ ह, यदि एक-एक कड़ी करोड़ वर्ष ले, तो ज्यादा-से-ज्यादा पृथ्वी कितनी पुरानी हो सकती है, उसका अंदाजा लगाना भी कठिन है। अभी हालमें यह सिद्धान्त स्थिर हुआ कि 'मनुष्योंका विकास बंदरोंसे नहीं हुआ, प्रत्युत बंदरोंका जन्म मनुष्योंसे हुआ है।' इन वैज्ञानिकोंका कहना है कि 'पूर्वकालके मनुष्योंने ज्ञान- विज्ञानमे बहुत उन्नति की थी; इसलिये उनके सिर कमजोर हो गये थे। कुछ दिनोंके बाद वे असभ्य जंगली हो गये। उनमेंसे कुछ वनमानुष और कुछ बंदर बन गये।' ये नवीन वैज्ञानिक पुराने वैज्ञानिकोसे कहीं अधिक सूक्ष्मदर्शी हैं। इन्होंने अपने तजुर्वेसे पुराने ज्ञानोंमें अधिक वृद्धि की है। अतः परिस्थिति संयोग या इत्तिफाकके अनुसार नहीं, किंतु कमोंके अनुसार ईश्वराज्ञानुसार ही प्रकृति जीवोंके शरीरोंको विकसित करती है। जैसे बीजसे वृक्ष, उसीसे फलका विकास होता है, वैसे ईश्वरीय नियमानुसार ही सब विकास ठीक हैं। विकासवादियोंके मतानुसार—"प्राकृतिक पदार्थोंका मूल कारण 'ईथर' है। उसीकी कल्पना और तरंगावलीसे विद्युत्, प्रकाश, शब्द और गर्मी उत्पन्न होते हैं। उसीके अति सूक्ष्म कणोंको 'इलैक्ट्रोन' कहते हैं। इनके ही संघातसे विद्युत् बनती है। यही शक्तिके रूपसे स्थूल आकारमें 'मैटर' कहलाती है। मैटरकी विरलदशाको 'गैस', तरल दशाको 'लिक्विड' तथा ठोस दशाको 'सॉलिड' कहते हैं। ईथरसे उत्पन्न ये पदार्थ घनीभूत होकर और आकर्षण- विकर्षणके नियमसे चक्राकारगतिमे हो जाते हैं। कुछ समयके बाद वही चक्र सूर्य बन जाता है। सूर्यमें गर्मी तथा गतिके कारण चक्कर पड़ जाते हैं। उसके कुछ अंग अलग होकर दूसरे ग्रह बन जाते हैं। उन ग्रहोंसे उपग्रह बनते हैं। इसी प्रकारके ग्रहोंमेसे हमारी पृथ्वी एक ग्रह है। यह पह्ले गर्म थी, फिर धीरे-धीरे ठंढी हुई। उसीसे भाप, बादल, पानी, समुद्र, भूमि एवं जीव पैदा हुए। वनस्पति एवं जन्तुओंके भी पहले चेतनता उत्पन्न हुई। उसीकी एक शाखा एक कोष्ठधारी 'अमीबा' बन गयी। अमीबा इतने बढे कि उन्हें खाने पीनेकी वस्तुओंकी दिक्कत होने लगी। उन्हींकी वे संतानें, जो शारीरिक प्रयत्न तथा मानसिक अभ्यासमें बलवान् थीं, जीवन संग्राममें बच गयीं। वे फिर बढी और भोजनके लिये सग्राम जारी रहा। योग्य बचे, अयोग्य मारे गये।